Wednesday, October 24, 2012

बहादुर शाह 'ज़फ़र' की जन्मतिथि !

बहादुर शाह 'ज़फ़र'
आज उर्दू के शायर और हिन्दुस्तान के आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह 'ज़फ़र' (24 अक्तूबर 1775 - 07 नवम्बर 1862) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी
चश्म-ए-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी
उन की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी
अक्स-ए-रुख़-ए-यार ने किस से है तुझे चमकाया
ताब तुझ में माह-ए-कामिल कभी ऐसी तो न थी
क्या सबब तू जो बिगड़ता है ज़फ़र से हर बार
ख़ू तेरी हूर-ए-शमाइल कभी ऐसी तो न थी
2.
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापाएदार में
बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले बहार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में
इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में
उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इन्तज़ार में
दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में
कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
3.
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ
मेरा रंग-रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ
पढ़े फ़ातेहा कोई आये क्यूँ कोई चार फूल चढाये क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँफ़िशाँ मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुख की पुकार हूँ
4.
कीजे न दस में बैठ कर आपस की बातचीत
पहुँचेगी दस हज़ार जगह दस की बातचीत
कब तक रहें ख़मोश के ज़ाहिर से आप की
हम ने बहुत सुनी कस-ओ-नाकस की बातचीत
मुद्दत के बाद हज़रत-ए-नासेह करम किया
फ़र्माइये मिज़ाज-ए-मुक़द्दस की बातचीत
पर तर्क-ए-इश्क़ के लिये इज़हार कुछ न हो
मैं क्या करूँ नहीं ये मेरे बस की बातचीत
क्या याद आ गया है ज़फ़र पंजा-ए-निगार
कुछ हो रही है बन्द-ओ-मुख़म्मस की बातचीत
5.
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर
मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वो
आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर
बेदर्द तू सुने न सुने लेकिन ये दर्द-ए-दिल
रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर
तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ
ज़फ़र है मुक़द्दर कहे बग़ैर
6.
तुम न आये एक दिन का वादा कर दो दिन तलक
हम पड़े तड़पा किये दो-दो पहर दो दिन तलक
दर्द-ए-दिल अपना सुनाता हूँ कभी जो एक दिन
रहता है उस नाज़नीं को दर्द-ए-सर दो दिन तलक
देखते हैं ख़्वाब में जिस दिन किसू की चश्म-ए-मस्त
रहते हैं हम दो जहाँ से बेख़बर दो दिन तलक
गर यक़ीं हो ये हमें आयेगा तू दो दिन के बाद
तो जियें हम और इस उम्मीद पर दो दिन तलक
क्या सबब क्या वास्ता क्या काम था बतलाइये
घर से जो निकले न अपने तुम "ज़फ़र" दो दिन तलक
7.
दिल की मेरी बेक़रारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
शब की मेरी आह-ओ-ज़ारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
बार-ए-ग़म से मुझ पे रोज़-ए-हिज्र में इक-इक घड़ी
क्या कहूँ है कैसी भारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
मेरी सूरत ही से बस मालूम कर लो हम-दमो
तुम हक़ीक़त मेरी सारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
शाम से ता-सुबह जो बिस्तर पे तुम बिन रात को
मैंने की अख़्तर-शुमारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
ज़फ़र जो हाल है मेरा करूँगा गर बयाँ
होगी उन की शर्म-सारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
8.
रात भर मुझको गम-ए-यार ने सोने न दिया
सुबह को खौफे शबे तार न सोने न दिया
शम्अ की तरह मुझे रात कटी सूली पर
चैन से यादे कदे यार ने सोने न दिया
यह कराहा दर्द के साथ तेरा बीमार-ए-अलम
किसी हमसायें को बीमार ने सोने न दिया
ए दिल-ए-जार तु सोया किया आराम से रात
मुझे पल भर भी दिल-ए-जार सोने न दिया
सोऊं मैं क्या कि मेरे पांव को भी जिन्दां में
आरजू-ए-खलिश-ए-यार ने सोने न दिया
यासो-गम रंजो-ताअब मेरे हुए दुश्मने-जां
ज़फ़र’, शब इन्हीं दो-चार ने सोने ना दिया
9.
रविश-ए-गुल है कहां यार हंसाने वाले
हमको शबनम की तरह सब है रूलाने वाले
सोजिशे-दिल का नहीं अश्क बुझाने वाले
बल्कि हैं और भी यह आग लगाने वाले
मुंह पे सब जर्दी-ए-रूख़सार कहे देती है
क्या करें राज मुहब्बत के छिपाने वाले
देखिए दाग़ जिगर पर हों हमारे कितने
वह तो इक गुल हैं नया रोज खिलाने वाले
दिल को करते है बुतां, थोड़े से मतलब पे खराब
ईंट के वास्ते
, मस्जिद हैं ये ढाने वाले
नाले हर शब को जगाते हैं ये हमसायों को
बख्त-ख्वाबीदा को हों काश
, जगाने वाले
खत मेरा पढ़ के जो करता है वो पुर्जे-पुर्जे
ज़फ़र’, कुछ तो पढ़ाते हैं पढ़ाने वाले
10.
ऐश से गुजरी कि गम के साथ, अच्छी निभ गई
निभ गई जो उस सनम के साथ
, अच्छी निभ गई
दोस्ती उस दुश्मने-जां ने निबाही तो सही
जो निभी जुल्मो-सितम के साथ
, अच्छी निभ गई
खूब गुजरी गरचे औरों की निशातो-ऐश में
अपनी भी रंजो-अलम के साथ
, अच्छी निभ गई
हमको था मंजूर अपनी खाकसारी का निबाह
बारे उस खाके-कदम के साथ
, अच्छी निभ गई
जो जुबां पर उसकी आया, लब पे नक्श उसने किया
लोह की सोहबत कलम के साथ अच्छी निभ गई
बू-ए-गूल क्या रह के करती, गुल ने रहकर क्या किया
वह नसीमे-सुबह-दम के साथ
, अच्छी निभ गई
शुक्र-सद-शुक्र अपने मुंह से जो निकाली मैंने बात
ज़फ़र’, उसके करम के साथ, अच्छी निभ गई