Monday, July 01, 2013

पीयूष मिश्रा की नज़्में

पीयूष मिश्रा की नज़्मों में को पढ़ते हुए ऐसी ख़ुशी का एहसास होता है—जैसे कोई मासूम-सा बच्चा नदी के बहते हुए पानी को अपनी ओक में भरकर ख़ुश हो जाता है—जैसे उसने नदी को मुट्ठी में बंद कर लिया हो। पीयूष की नज़्में ऐसे उफ़क़ का दरवाज़ा खोलती हैं, जो हिंदी और उर्दू से बना है। जहाँ ये दो ज़बान आपस में घुल-मिल जाती हैं और एक तीसरी दुनिया की तरफ़ रुख़ करती हैं। पेश हैं पीयूष मिश्रा की नज़्में - त्रिपुरारि कुमार शर्मा

ख़त
रात-रात भर
जाग-जाग कर
नज़्मों की शक्लों में तुमको
कितने ही ख़त लिखता था
कितना अरसा गुज़र गया अब
नज़्में कहना भूल गया हूँ
ख़त लिखना अब छोड़ दिया है
पता तुम्हारा बदल गया है!
ख़ामोशी
बातें करते हुए अक्सर
तुम चुप हो जाती हो
और मुझ तक बस तुम्हारी
आती-जाती साँसों की
आवाज़ आती है-
नि-रे-ग-रे-नि-रे-सा-
राग यमन के
आरोह-अवरोह की तरह-
तुम्हारी ख़ामोशी भी कितनी सुरीली है!
शहर और नदी
कितने ही लोग हैं
शहर में मेरे
मिलने किससे मगर मैं कहाँ जाऊँ?
किसी को तो मैं जानता नहीं हूँ
(पहचानता मुझे भी कोई कहाँ है?)
वो एक नदी थी
उत्तर दिशा में शहर के 
घाट पर जिसके, बचपन मैं में
बैठा रहता था घंटों
वो मेरे पैरों को गुदगुदाती थी,
खेलती थी, बहती रहती थी
मगर अब वहाँ भी शहर है
जो मुझसे बात नहीं करता
(वो मुझको जानता नहीं ना)
सुनता हूँ नदी है अब भी वहीँ पर
जानता हूँ वो होगी कहीं पर-
उत्तर दिशा में शहर के
(नाला शहर का आखिर जाता कहाँ है?)
मैं दुनिया से ऊब चुका हूँ
हँसना-रोना, पाना-खोना
पा कर खोना, खो कर पाना
सीधे रस्ते, ठोकर खाना
इन बातों का क्या मतलब है
इन बातों को भूल चुका हूँ
वीरानो में, सन्नाटो में
दर्द की अंधेरी रातों में
अपनी ज़ात को छोड़ आया हूँ
हर ज़र्रा मुझमें शामिल है
मैं ज़र्रों में डूब चुका हूँ
मैं शहरों में, मैं जंगल में
पर्वत-पर्वत, सहराओं में
अपनी ही धुन में रहता हूँ
दुनिया मुझको देख रही है
मैं दुनिया से ऊब चुका हूँ