Thursday, July 04, 2013

सुशील कृष्नेत की कविताएँ


प्रेम कविताएँ लिखना किसी भी कवि का पहला और स्वाभाविक आकर्षण होता है। हमारे युवा कवि सुशील कृष्नेत भी नहीं बच सके। गाँव और शहर के बीच पढ़ाई से लेकर प्रेम तक की यात्रा करने के बाद कवि को पता चलता है कि वह ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ से कोई भी रास्ता किसी भी ओर नहीं जाता। यानि वह जिस जगह है, न तो उसे छोड़ने की जल्दी है और न उसके मन में पकड़े रखने का आग्रह। इस सादेपन का प्रति-उत्तर एक लम्बी चुप्पी के सिवा कुछ नहीं हो सकता। इसीलिए कवि होंठों पर चुप की मुहर लगा कर सृजन में जुट जाता है और हवा हर पल प्रेयसी होने का भ्रम उत्पन्न करती है। फोटोग्राफी में गहरी दिलचस्पी रखने वाले सुशील फिलहाल दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे हैं। आज उनके जन्मदिन के बहाने आईए पढ़ते हैं सुशील कृष्नेत की कविताएँ - त्रिपुरारि

बीता सावन
कुछ साल पहले
कुछ ऐसे ही मेहरबान हुआ था मौसम
कुछ ऐसे ही बरसी थीं बूंदें
जिनसे तर हो कर
फूटे थे कुछ सपनों के अंखुए
पहली बार थामी थी हथेलियाँ परस्पर
सायास
बढ़ी धड़कनों और सूखते गले के बीच
फिर उनमें साथ साथ रोपी थीं कुछ बारिश की बूंदें
उछाला था उन्हें ऊपर
फिर
वही मोती बन कर
बरस पड़ीं तुम पर
कुछ क़तरे अटक गए तुम्हारी पलकों पर
उन मोतियों के बहाने चूमा था तुम्हारी पलकें
उम्र की एक लंबी जेठ के बाद
आया था मेरे जीवन मे वह सावन
और फिर...
आज सुलग रहा हूँ एक वैसी ही बारिश में
अंखुओं से फूटे सपने
झाड़ बन गए हैं अब
सोचा है इस बार पूस की रातों में
उन सपनों का अलाव तापूंगा...
होना उतना नहीं होता
होना उतना नहीं होता
जितना तुम्हारा न होना, 

जब घर में होती हो तब एक बारगी; एक जगह होती हो...
किचेन में गोल-गोल रोटियाँ सेंकते, 
कलाई में गोल-गोल चूड़ियाँ खनकाते, 
मुन्ने की ठुड्ढी पकड़ बाल संवारते 
और कभी-कभी गृह-मंत्रालय का बजट समझाते॥ 
ऐसे ही कई फ्रेमों में बंटी-छंटी-थकी और ....पस्त !
पर आज जब नहीं हो
तो एक साथ सब जगह हो घर में 
सर्वव्यापी। 
दरवाजे की उस पहली दरार 
जो खुलने से पहले दिखाती है तुम्हारी झलक
...से लेकर
झाड़ू की मूठ पर पड़े तुम्हारी उँगलियों के निशान तक। 
कहाँ नहीं हो? 
बिस्तर पर फिंके गीले तौलिये पर चिपका है तुम्हारा ताना-
"कोई और होती न तब पता चलता ..." 
फर्श के पोंछे का वह कपडे का टुकड़ा , जो भीगा है तुम्हारे आदेश से-
"चप्पलें बाहर..." 
आईने पर वो पुरानी बिंदियाँ जो चिपकीं हैं तुम्हारे सौन्दर्याभिमान के गोंद से-
"अभी भी ऐसी दिखती हूँ कि..." 
तकिया फूली है तुम्हारे जिद के फाहे से 
जो बन जाती थी हमारे बीच का बाघा बार्डर 
शर्ट की कालर से उलझा है तुम्हारा इक बाल
जो वक्तेरुखसत की आखिरी निशानी है। 
सच कहूं मेरी परिणीता! 
तुम्हारा होना उतना नहीं होता 
जितना तुम्हारा न होना...
गेट वे ऑफ़ इंडिया
गहरे समन्दर के किनारे
खड़ी एक इमारत,
जिसने देखी है...
एक हुकूमत की दोपहरी और सांझ,
पनाह दी है...
लथपथ कबूतरों को
93...26 /11 के नम्बरों के साथ,
शामिल है...
पहली मुलाक़ात की तस्वीरों में,
लौटते देखा है...
खाली हाथों को,
दिखाया है...
दूर से ख्वाबों का ऐसगाह,
साबित हुआ है...
पास से सपनों की कब्रगाह,
......और भी बहुत कुछ
जो समंदर के उस पार छिपा है
भविष्य के धुधलके में,
जिसका आना;
किनारे लगना;
अभी बाकी है
चाँद और रक़ीब
मैंने कहा तुम चाँद हो;
कोयल हो;
बारिश की फुहार हो;
और भी बहुत कुछ...
तुम्हारी उनीदीं आखें सिकुडीं;
कुन्मुनायीं;
भौहें तनीं;
लबों से गुस्सा फूटा
मुझे ये सब नहीं पसंद,
'मैं' बस 'मैं' हूँ
तुम्हारी 'मन' और कुछ भी नहीं.
मैं मर गया तुम्हारे पे
तुम्हारे गुस्से पे.
और पूछा
'जब मैं नहीं रहूँगा तब?'
तुमने रख दीं अपनी हथेली मेरे होंठ पे.
और बोली
'हम दोनों तारे बन जायेंगे'
एक दिन सच में मैं नहीं रहा.
तुम्हे तारा पसंद था और मैं बन गया इक तारा
ताकता रहा तुम्हे छत पे कई रातें.
इक रात देखा मैंने
तुम किसी के साथ थी शायद 'रकीब';
तुम्हारी फरमाईश पे वो इक गीत गुनगुना रहा था.
तुम्हें चाँद कह रहा था;
तुम्हें कोयल कह रहा था;
तुम्हें बारिश की बूँद कह रहा था;
और भी बहुत कुछ.
तुम मुस्कुरा रही थी.
इतने में ('मैं' ) इक तारा टूट के गिरा
तुम्हारे पास से गुजरा.
तुम छुप गयी (रकीब) के सीने में
ये कहती मुझे तारे नहीं पसंद.
उसने कहा
'हाँ, जनता हूँ 'मन''.
यार गुलज़ार
तुम जो कह दो तो 
चाँद आज की क्या?
किसी भी रात नहीं डूबेगा;
जागेगा सारी रात तुम्हारी निम्मी -निम्मी नज्मों जैसा।
बेसुवादी रतियों में भी 
तुम दिखा जो देते हो चाँद के अक्स में 
रोटी, कभी चिकना साबुन,
कभी माँ ;कभी महबूबा।
तुम्हारा कुछ न कुछ सामान पड़ा है उनके पास 
जो पस्मीनें की रातों में 
प्यार के कुछ लम्हें फिलहाल जी लेना चाहतें हैं।
तुम्हारे प्यार के पत्ते झर भी जाएँ 
पर उनकी खुशबू कभी चुप नहीं होती।
कभी तो खुद रांझा बन जाती है;
पर्सनल से सवाल करती है;
इश्क का नमक बन जाती है;
कभी नीम तो कभी शहद बन जाती है।
उम्र भले ही पक के सुफैद हो गयी हो 
पर महसूसने पे तो यही लगता है 
दिल तो बच्चा है जी!
जगजीत सिंह के नाम
तुझसे बावस्ता हैं 
कितनी ही रातें मेरी
तूने पोछे हैं 
कितने ही आँसू मेरे
जब कभी टूट के चाहा है रोना मैंने 
तूने थामा है कंधे पे सर को मेरे
कितनी बातों की गवाही हैं तेरी गज़लें
कितने ही चाक जिगर सिली हैं तेरी नज़्में 
मेरे हमदम;
मेरे हमराज़;
तुझे माफ नहीं कर सकता
आज तू लौट गया 
और बताया भी नहीं
श्रेया घोषाल
बहुत लाज़िम है कि
तुम बुलंदी कि मीनारें हर रोज फतह कर लो।
बहुत लाजिम है कि
तुम्हारी आवाज़ का जादू जमीं से आसमां तलक़ गूंजे।
बहुत लाजिम है कि
तुम्हारी नज्मों से हर दिल की धड़कनें बढ़ जाएँ।
बहुत लाजिम है कि
तुम्हारे साए को छूने को हर ज़वां आशिक़ तरस जाए।
बहुत लाजिम है कि
मुल्क़ के हर कमरे की दीवारों पर तेरी तस्वीर लग जाए।
ज़ब इतना हो चुका हो या की फिर हो रहा हो तो...
पलट कर देख लेना भीड़ की उस आखिर आखों को...
ज़रा सा गौर कर सुन लेना उसकी तेज़ साँसों को।
बहुत लाजिम है कि
तब इतने से ही वो तसल्ली से मर पाए...
बहुत लाजिम है कि
उसकी बेचैन रूह ख़ामोश हो जाए...!