Sunday, July 14, 2013

उपेंद्रनाथ अश्क की कविता

तुम्हारी आँखों में 
उमड़ आई इन दो नदियों ने 
मुझे अपने ऐसे डुबो लिया है 
जैसे गर्मियों की तपती दोपहरी में 
मेरे नगर की नदियाँ अपने संग में मुझे डुबो लेती हैं 
गंगा जमुना ही नहीं 
लोग कहते हैं कि मेरे नगर में 
एक तीसरी नदी भी बहती है ‘सरस्वती’
जो कभी दिखाई नहीं देती   
जो कभी दिखाई नहीं देती वह व्यथा है 
जो दिल-ब-दिल बहती है 
और चेहरों पर जिसका कोई आभास नहीं होता 
तुम्हारी इन डबडबाई आँखों की 
उसी तीसरी नदी ने मुझे डुबो लिया है 
क्या कहा? 
तुम्हारी वो तीसरी अदृश्य नदी मैं हूँ 
तो फिर इन आँखों को चुपचाप पोंछ डालो
और मुझे पहले की तरह अदृश्य बहने दो।