Monday, October 07, 2013

छोटा बाबू : एक कहानी


दोस्तों आज "छोटा बाबू" पढ़िए। यह कहानी मैंने 2010 में लिखी थी। दैनिक अख़बार नेशनल दुनिया में 4 अगस्त 2013 को प्रकाशित हो चुकी है।

एक ठहरी हुई-सी नदी है। पानी अपनी रफ़्तार से बह रहा है। एक छोटी-सी मछली पानी की सतह पर कभी डूबती है, कभी उभरती है। अचानक एक चिड़िया आती है और मछली को अपनी चोंच में दबा कर उड़ जाती है। वह चुपचाप इस दृश्य को देख रहा है। एक आँख समझती है कि चिड़िया ने नदी के माथे को चूमा है। दूसरी आँख कहती है कि नदी अपनी अंगुलियों से चिड़िया को छूते-छूते रह गई। जैसे हाथ से तितली फिसल जाती है। मगर उसका स्पर्श हथेलियों में साँस लेता है। परों का रंग अंगुलियों से सारे बदन में उतर कर लहू के साथ-साथ बहने लगता है। मगर हाथ में तितली नहीं होती है। कुछ इसी तरह से उसके बाबूजी उसकी ज़िंदगी से चले गए और वह अपने लहू में उन्हें महसूस करता रहा। उसका नाम छोटा बाबू नहीं है, पर बाबूजी उसे इसी नाम से बुलाया करते थे। बाबूजी के बाद घरवाले भी कभी-कभार इसी नाम से पुकार लेते हैं। ...प्यार से...तल्ख़ी से...पता नहीं।
उसे लगा कि वह जो कुछ भी कर रहा है, ठीक है। बारह-तेरह साल की उम्र बहुत नाज़ुक होती है। उसके दोस्त ने सिगरेट सुलगाई और वह पीने लगा। उसने पहली बार सिगरेट चखी। एक छोटा-सा कमरा है, जिसे कमरा कहना लाजिमी नहीं होगा। मकान अंडर कन्सट्रक्शन है। एक आवाज़ का टुकड़ा कान पर आ कर गिरता है
“डीएम आ रहा है।”
“किधर से?
“पीछे की सीढ़ियों से।”
“भागो...।”
सभी स्टूडेंट्स अपने-अपने बिस्तर पर लेटे हुए हैं। किसी की पलकें आधी खुली हुई हैं। किसी के हाथों में उलटी किताब। कोई कुछ खोज रहा है। कोई कुछ भी नहीं। दरवाज़ा खुलता है। डीएम कमरे में दाखिल होते हैं। सभी को देख कर खुश होते हैं। पर गुस्सा अंदर से है। एक बिस्तर है, जो अब भी ख़ाली है। आँख उसी ख़ाली बिस्तर की तरफ मुड़ती है। आँखों की लाली बातों में उतर आती है।
ये कहाँ गया?”
सभी अपने-अपने काम में मसरूफ़ हैं।
“मैने पूछा ये कहाँ गया?”
आचार्य जी हम यहाँ हैं, बाथरूम गए थे, पेट में दर्द हो रहा है।
“दवा क्यों नहीं ली?”
“अभी-अभी तो पता चला है।
“मेरे साथ आओ, दवा देता हूँ।
“जी।”
डीएम के मुड़ते ही वह अपने दोस्तों की तरफ देख, मुस्कुरा कर आँख मारता है। दोनों के जाते ही सभी आपस में बात करने लग जाते हैं। ये डीएम बहुत ख़तरनाक है। हमें तो मस्ती भी नहीं करने देता।
“डीएम मतलब?” – एक ने पूछा।
“अरे दिनेश महतो।”
“हॉस्टल इंचार्ज़?
“और कौन तेरा बाप?”
“साले, तेरी तो...।
...दवा लेकर वह सीधे बाथरूम जाता है। जहाँ सिगरेट का अधजला टुकड़ा इंतज़ार कर रहा है। उसे बाथरूम जाने की लत लग गई है। जब-तब वह बाथरूम जाने लगा है। क्योंकि यही एक महफ़ूज़ जगह है, जहाँ वह आराम से सिगरेट पी सकता है। हॉस्टल में सिगरेट पीने की इज़ाजत नहीं है। इसीलिए यह नेक काम बाथरूम में सालों तक किया जाता रहा। इस दौरान उसने कई प्रयोग भी किए। मसलन एक बार में दो-चार या आठ सिगरेट पीना। आँखों से धुआं निकालना। नाक से सिगरेट पीना। कई बार वह कामयाब भी हुआ। नाकामी भी हाथ लगी। इस आदत ने उसे अपना ग़ुलाम बना लिया था। पता नहीं वह क्यों पीता था? 
यह उसका पाँचवां पैग था। सिगरेट अब अकेली नहीं रही। शराब के साथ अपना दुख बाँटा करती है। दुनिया के रंजो-ग़म से तकलीफ जब भी परेशान हो जाती है, तो वह उसकी पनाह में आती है। ख़ुदा जाने यहाँ आकर उसे क्या मिलता है? चंद क़रार के कतरे। या कुछ बासी लम्हे, जिसे देखना, छूना, सहलाना उसे अच्छा लगता है। इस वक़्त वह जहाँ पर है। सर के उपर एक सफ़ेद छत है। जो बार-बार उसे अपनी तरफ खींच रही है। न चाहते हुए भी वह छत की तरफ देखता है। कितनी ख़ूबसूरत है। छत से टंगा पंखा घूमता ही जा रहा है। वह सोचने लगता है। जब पंखा बंद होता है, तो उसके तीन डायने होते हैं। चलते वक़्त क्यों नहीं दिखाई पड़ते? पंखे की वजह से सिगरेट जल्दी ख़त्म हो जाती है। वह उठता है और पंखे का स्वीच ऑफ कर देता है।
उसने दूसरी सिगरेट जलाई। गिलास में थोड़ी-सी और शराब डाली। वह कुछ अजीब-सा महसूस कर रहा है। कुर्सी की गोद से उठ कर वह बिस्तर की बाहों में लेट जाता है। सामने कई ट्रॉफियाँ चमक रही हैं। एक-एक कर के सभी ट्रॉफियों को देखने लगता है। हिंदू कॉलेज, खालसा कॉलेज, ज़ाकिर हुसैन कॉलेज, भीम राव अम्बेदकर कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज, जीसस एण्ड मेरी कॉलेज, माता सुंदरी कॉलेज...। धीरे-धीरे पूरी दिल्ली यूनिवर्सिटी कमरे में ज़िंदा हो उठती है। यह सबसे बड़ी वाली ट्रॉफी, जिस प्रतियोगिता में उसे फर्स्ट प्राइज़ के रूप में मिली है, कितने विद्यार्थियों ने भाग लिया था उस में? सौ से भी ज़्यादा रहे होंगे। अलग-अलग कॉलेजों के ही नहीं, अलग-अलग यूनिवर्सिटियों के भी। अलग-अलग भाषाओं की कविताएं। धीरे धीरे कई चेहरे उभरने लगते हैं। ये धुंधला-सा चेहरा किसका है?
“मैं निशा हूँ।
“फ़लक कहते हैं मुझे।
“अंदाज़ अच्छा है।
“शुक्रिया।
“आपकी कविताओं में बहुत आकर्षण है।
“पता नहीं।”
“...मगर एक उदासी भी है।
“...”
क्या उसे उदासी की वजह वाकई नहीं पता है? यही सोचते हुए उसने जवाब तलाशती आँखों को अलविदा कहा। फिर दूसरी तरफ मुड़ गया। कुछ दूर चलने पर बेचैनी उसके कदमों से लिपट गई। उसने चाहा कि वह लौट आए और बताए कि उदासी की वजह क्या है? फ़लक की सोच के साँचे में किस रंग की मिट्टी प्रतिमा बनने को तैयार है? एक सफ़ेद-ओ-स्याह पल उसकी पलकों को छू कर ज़मीन पर गिर जाता है।
“बेटा, तुम मुझसे दूर जा रहे हो। तुम्हारे बग़ैर मैं कैसे रह पाऊंगी?” – माँ ने कहा।
फ़लक ने सिर्फ़ इतना कहा – “कहो तो पढ़ना छोड़ दूँ।”
माँ की आँखों में एक सफ़ेद लकीर-सी खिंच गई। वह रोना तो बहुत चाहती थी, मगर आँसू की बूँदों को पलकों के भीतर पुतलियों में बंद कर दिया। बातचीत का लहज़ा उसकी समझ के बाहर था। देखते-देखते उसका बेटा उसकी नज़रों से ओझल हो गया। वह चाह कर भी रोक न सकी। शायद वह रोकना ही नहीं चाहती थी। क्योंकि न रोकने में ही उसके बेटे के सुनहरे भविष्य की भलाई शामिल थी।
छोटी-सी उम्र को सिर्फ़ दस तक की गिनती आती है। फ़लक पढ़ने के लिए घर से दूर जा रहा है। स्कूटर की पिछली सीट पर बैठे-बैठे वह दोनों तरफ देख रहा है। कभी खुश हो कर मुस्कुरा देता, तो कभी चुप रह कर ही हवाओं की सलामी स्वीकार कर लेता। उसे किसी चीज़ की फ़िक्र नहीं है। वह जानता है कि इस वक़्त स्कूटर ड्राइव कर रहे उसके बाबूजी उसकी ज़िंदगी के रहनुमा हैं। जब रहनुमा साथ हो, तो फ़िक्र क्या करना?
उसके बाबूजी उसकी ज़िंदगी में बहुत अहम हैं। माँ, उससे जितनी मुहब्बत करती है। उससे कहीं ज़्यादा प्यार वह अपने बाबूजी से करता है। बाबूजी के प्रति जो समर्पण है, लगाव है, झुकाव है, आकर्षण है, किसी और के लिए नहीं हो सकता। होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि इसी सबकुछ की झलक बाबूजी के मन में अपने लिए देख पाता है, जो शायद उसे माँ के लिए भी नहीं दिखाई देती। माँ को इस बात की तक़लीफ़ भी है, मगर यह सच है। कभी-कभी व्यक्ति किसी की चाहत में इतना डूब जाता है कि किसी के होने और न होने के बीच का बारीक फ़र्क भी ख़त्म हो जाता है। ऐसे लोगों को ही दीवाना कहा जाता है। अपनी हद के उस पार जा कर प्यार करते हैं। सच! वह अपने बाबूजी का दीवाना है। हर काम की श्शुरुआत उनका नाम लेकर। हर साँस की आहट, जैसे उनको आवाज़ दे रही हो। हर धड़कन, जैसे उनका सज़दा कर रही हो। आँखों में उनके सिवा कोई और नहीं। क्या इसे पागलपन नहीं कहा जाएगा? इस बात की परवाह उसे कभी नहीं रही। शायद पागल ही है। बाबूजी तो अब रहे नहीं, मगर उनके होने का भ्रम पाले बैठा है। कोई कुछ भी कहे। वह मानता है कि उसके बाबूजी आज भी उससे रू-ब-रू होते हैं।
एक दफ़ा कुछ ऐसा हुआ। सुबह की अलसाई आँखें सूरज की दस्तक को सहला रही थी। अचानक रोने की रोशनी सारे घर में फैल गई। सारा घर महकने लगा। घर के सारे लोग एक जगह एकत्रित हो गए। देखा कि फ़लक अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा रो रहा है। तकिए का कुछ हिस्सा भीग गया है। सबने उसे जगाया और आँसुओं का कारण पूछा। थोड़ी देर बाद जब उसने रोना बंद किया तो कहा- बाबूजी। और कुछ भी न कह सका। बाबूजी उसके सपने से निकल कर सामने सोफे पर बैठे थे। वह उन्हें देखता रहा। अंदर ही अंदर ख़ुद को भरता रहा। मुस्कुराता रहा। धीरे-धीरे सब लोग वहाँ से चले गए। जैसे चाँद के उपर से सारा स्याह बादल छट गया हो। जैसे चाँद निखर कर और भी चमक उठा हो। वाकई फ़लक पहले से ज़्यादा शांत और लबालब लग रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी। वही चमक उसकी आँखों में अकसर देखने को मिल जाती है। सपना तो महज एक जरिया है, अपने बाबूजी से मुलाक़ात करने और बातचीत करने का।
छोटा बाबू! अचानक किसी ने आवाज़ दी। उसने देखा, तो आसपास कोई भी न था। कमरा बिल्कुल सूनसान था। उसे किसी जाते हुए कदमों की आहट सुनाई पड़ी। उसने दरवाज़े की तरफ हाथ बढ़ा कर रोकना चाहा। मगर रोक न सका। जैसे उसका किसी चीज़ पर इख़्तियार न रह गया हो। वह बहुत देर तक ख़ामोश, ख़िड़की के बाहर, कहीं ख़लाओं में एकटक देखता रहा। शायद तितली उड़ चुकी थी। सिर्फ़ परों का रंग और लम्स हथेलियों से चिपका रह गया था। शायद चिड़िया मछली को अपनी चोंच में दबा कर जा चुकी थी। नदी में बहते हुए पानी की सतह पर अब भी थोड़ी-सी, न के बराबर हलचल मौजूद थी।