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Monday, August 19, 2013

समय के आईने में आरसी : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

मेरी दृष्टि में आरसी प्रसाद सिंह ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। आरसी की जन्मतिथि ((19 अगस्त) पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए, प्रस्तुत है यह लेख  - त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

किसे ख़बर थी कि छायावाद के तृतीय उत्थान के कवियों में विशेष स्थान रखने वाले रचनाकार के साथ समय ऐसा (निर्मम) न्याय करेगा। एक ऐसा कवि, जिसे ‘जीवन-जोश-जवानी’ और ‘आस्था-अर्पण-अध्यात्म’ का कवि कहा जाता है। एक ऐसा कथाकार, जिसकी कहानियों में वक़्त की महीन बुनावट का बेहतर नमूना मिलता है। एक ऐसा एकांकीकार, जिसके एकांकी नाटकों में सामाजिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वरूप झलकता है। जिसके ख़िला़फ युवावस्था में ही तत्कालीन पत्रिका ‘युवक’ (सम्पादक : रामवृक्ष बेनीपुरी) में प्रकाशित रचनाओं में क्रांतिकारी शब्दों का प्रयोग करने पर अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ़्तारी का वारंट जारी कर दिया। जिसने न सिर्फ़ हिंदी भाषा, बल्कि मैथिली भाषा के साहित्य को भी समृद्ध किया। जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मानों से नवाज़ा गया। जो देश-प्रदेश की अनेक संस्थाओं एवं सरकार द्वारा समय-समय पर सम्मानित और पुरस्कृत होता रहा। मैं बात कर रहा हूँ उस शख़्सियत की, जो एक साथ उपमा और उपमेय दोनों है। मैं बात कर रहा हूँ महान चिंतक, विशिष्ट साधक और युगाराध्य कवि आरसी प्रसाद सिंह की।
यह बात किसी अचरज से कम नहीं कि 74 वर्षों तक (किसी भी कवि के जीवन में सबसे लम्बा रचनाकाल) लगातार लिखने के बावजूद ‘आरसी और उनके साहित्य’ का विवेचन एक व्यापक दृष्टि के तहत नहीं किया गया। आलोचक यह कह कर अपना पल्ला झाड़ते रहे हैं कि आरसी के लेखन में कोई केंद्रीय भाव नहीं है। उनकी कोई तय विचारधारा या लेखन क्षेत्र नहीं है। एक आलोचक व्यक्तिवादी गीति कविता-धारा (जिसमें आरसी भी शामिल हैं) के बारे में लिखते हैं, “इनके पास जीवन-दृष्टि नहीं थी—न तो पुरानी आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि और न नवीन समाजवादी दृष्टि। ये कवि अपने अनुभवों से परिचालित हो रहे थे, उनके अनुभव भावुक हृदय के अनुभव थे। उनकी दृष्टि रोमानी थी, अत: वे व्यक्ति को न तो सामाजिक शक्ति से जोड़ सके न आध्यात्मिक आदर्शों से। जीवन-दृष्टि के अभाव में यह व्यक्तिवादी अनुभव निराशा, मृत्यु की छाया और नियति बोध से ग्रस्त हैं।” मैं इनकी बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। ठीक है कि आरसी (और उस समय के कवियों) के पास जीवन-दृष्टि नहीं थी। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि जिनके पास जीवन-दृष्टि होती है, उनके पास जीवन नहीं होता। यह बात स्वंय साबित हो जाती है कि आरसी के पास जीवन-दृष्टि न सही, जीवन था। इसीलिए तो हम उन्हें जीवन और यौवन का कवि कहते हैं।
दूसरी बात, क्या बिना किसी दृष्टि के कविता सम्भव है? हाँ, आरसी की दृष्टि समय के साथ बदलती रही है, जिसे मैं सकारात्मक पक्ष समझता हूँ। आलोचक शायद इस बात से सहमत होंगे कि नदी तभी तक ज़िंदा मानी जाती है, जब तक उसमें प्रवाह है। अपनी रचनाओं में विविधता संजोने वाले आरसी ने गुणात्मक रूप से प्रयोग किए हैं। मुझे लगता है यही विविधता आरसी की सबसे बड़ी ख़ूबी है और सच्चा-सार्थक कवि होने का सबसे बड़ा प्रमाण भी। तीसरी बात, मैं नहीं मानता कि कविता का काम कोई आदर्श स्थापित करना नहीं है। न तो सामाजिक और न आध्यात्मिक। कविता तो सभी आदर्शों-अनादर्शों के पार ले जाती है। जहाँ से कवि की पुकार उठती है। यही पुकार आरसी को ‘उमर ख़य्याम’ की परम्परा से जोड़ती हुई आगे लेकर भी जाती है। जब आरसी कहते हैं : तेरा पथ जाता उधर जहाँ बहती निशिबासर मद-धारा / मेरे हित शूली, दमन, दंड मेरा विश्राम भवन कारा। / करबद्ध सदैव मनाता तू, मेरी मधुशाला रहे अचल। / मैं कहता, मानव की जय हो निर्भय हो जगतीतल सारा। (कलापी)
इसी सिलसिले में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का कथन उचित मालूम पड़ता हैं, “आरसी का काव्य मर्म-मूल से प्रलम्ब डालियों और पल्लव-पत्र-पुष्पों तक जैसा प्राण-रस संचारित करता रहा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। किसी एक विषय, स्वर या कल्पना के कवि वह नहीं हैं। उनकी सम्वेदना जितनी विषयों से जुड़ी हुई है, उनकी अनुभूति जितनी वस्तुओं की छुअन से रोमांचित है, उनका स्वर जितने आरोहों, अवरोहों में अपना आलोक निखारता है, कम ही कवि उतने स्वरों से अपनी प्रतिभा के प्रसार के दावेदार हो सकते हैं।” आरसी ने अपने जीवन काल में जब-जब जो-जो भोगा, लिखा। अडिग चट्टान बनकर उम्र के विभिन्न पड़ावों पर आने वाली बाधाओं का डटकर मुकाबला किया। उम्र भर नियंत्रण के ख़िलाफ आक्रोश ज़ाहिर करते रहे। जीवन को ‘निर्झर’ की तरह जिया। आरसी का साहित्य सच्चे अनुभवों की आग में पकी हुई फसल है। यह बात और है कि उनकी मस्ती से भरी रचनाएँ पाठकों को अधिक प्रिय हैं। आरसी ‘नई दिशा’ शीर्षक कविता में लिखते हैं : तुम मेरी मस्ती को देखो / इतनी मस्ती, इतनी मस्ती / मैं बहका-बहका जाता हूँ। / कुछ का कुछ हूँ सुन लेता मैं / कुछ का कुछ कह जाता हूँ। / जब आती है मौज किसी की / मैं तस्वीर सजा लेता हूँ। / जब उमंग उठती है / मैं ज़ंजीर बजा लेता हूँ।
इस मस्ती की एक वजह और भी है। कवि को मालूम है कि जीवन एक यात्रा है और जन्म-मरण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। इस सच से जिसका साक्षात्कार हो चुका हो वही लिख सकता है : सुंदरता अभिशाप विश्व का / सुंदरता वरदान प्रिये / इस क्षणभंगुर सुंदरता पर मत करना अभिमान प्रिये / यौवन के इस प्रखर तरणि को एक दिवस ढल जाना है / मृत्यु ताप लगते ही हिम की / इस छवि को गल जाना है। (कलापी) प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने आरसी की कृति ‘नन्ददास’ के बारे में लिखा है, “रोमांटिक कवियों में कुछ कवि आगे चलकर अध्यात्मवाद की ओर मुड़ गए और आरसी भी उनमें से एक हैं। निराला ने ‘तुलसीदास’ की जीवन कथा के माध्यम से देशकाल के शर से विंधकर ‘जागे हुए अशेष छविधर’ छायावादी कवि की छवि देखलाकर परम्परा का विकास किया तो कवि आरसी ने ‘नन्ददास’ के माध्यम से परम्परा का पुनरालेखन किया है।”  
आरसी की कहानियों को पढ़ते हुए अक्सर जयशंकर प्रसाद का स्मरण हो उठता है। क्योंकि प्रसाद की कहानियों (उदाहरण के लिए ‘पुरस्कार’) में कई जगहों पर प्रेम और बलिदान का द्वंद्व दिखाई देता है। इस बात की पुष्टि हरीश जायसवाल के एक कथन से होती है। हरीश लिखते हैं, “आरसी बाबू की कहानियों में जहाँ प्रेम अपनी ऊँचाई पर दीख पड़ता है वहाँ बलिदान भी अपनी चरम सीमा पर स्थित मालूम होता है। सस्ते रोमांस की कमी उनकी कहानियों को और अधिक निखारने में बहुत हद तक कामयाब हुई है। प्रेम के नाम पर आधुनिक नीचता से कहानी अछूती मालूम होती है जो शुभ है।” सच तो यह है कि आरसी की कहानियों में एक विशेष प्रकार का मनोरंजक तत्व है। इसमें न सिर्फ़ भावना, कल्पना तथा यथार्थ का अद्भुत समन्वय है, बल्कि जीवन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है।
जब हम एकांकी की बात करते हैं, तो इसमें भी भारतीय समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। उदाहरण के लिए ‘पुनर्मिलन’ और ‘वैतरणों के तीर पर’। इसके अलावा, ‘जब दुनिया अबोध थी’ एकांकी में एक अजीब तरह की ‘फैंटेसी’ देखने को मिलती है। यह ‘फैंटेसी’ आरसी के विशाल कल्पना लोक का एक हिस्सा भर है। डॉ. रामचरण महेंद्र आरसी की एकांकियों का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं, “आरसी प्रसाद सिंह एकांकियों में भी चिंतन-प्रधान गम्भीर साहित्य की सृष्टि कर सके हैं। इनमें समाज, धर्म, राजनीति, सामाजिक घटनाओं, भौतिकवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद का विवेचन हुआ है।”  
आज के दौर में जहाँ साहित्यकार बच्चों के लिए कम लिख रहे हैं, वहीं आरसी के यहाँ बच्चों के लिए विशेष सामग्री मौजूद है। बच्चों के मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ रखने वाले आरसी के बारे में समालोचक प्रताप साहित्यालंकार का कहना है, “आरसी शिशुओं और बालकों की अपेक्षा किशोरों के कवि हैं। कवि की अधिकांश कविताओं की रचना 12 से 16 वर्ष की उम्र के कोमल और सुकुमार मति वाले किशोरों के लिए हुई है। यद्यपि कवि ने शिशुओं के उपयुक्त काव्य का भी निर्माण किया है, तथापि उसका हृदय किशोरों के मनोरंजन के लिए ही अधिक उन्मुख है। उसे प्रकृति की ओर से बालसुलभ हृदय उपहार में मिला है, तभी वह तथ्यों को सरल और सरस बनाने की कला में निपुण है।” बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तकों में चंदामामा, चित्रों में लोरियाँ, ओनामासी, रामकथा, जादू की वंशी, सोने का झरना, काग़ज़ की नाव, बाल गोपाल, हीरा-मोती, कथामाला, क़लम और बंदूक, जगमग आदि प्रमुख हैं।
कहते हैं कि एक रचनाकार अपनी रचनाओं में ज़िंदा रहता है। लेकिन उनके क़रीबी और ग्रामीण श्री जीवछ प्रसाद सिंह का कहना है, “आरसी बाबू की जितनी रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रकाशित हैं।” पता नहीं कारण क्या है? कहा तो यह भी जाता है कि पांच दर्जन से अधिक पांडुलिपियां अब भी अप्रकाशित हैं। बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग ने उनकी पांडुलिपियां जमा करवाईं, जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकीं। आरसी के प्रकाशित कविता संग्रह हैं : आजकल, कलापी, संचयिता, आरसी, जीवन और यौवन, नई दिशा, पांचजन्य, आरण्यक, द्वन्द्व समास, युद्ध अवश्यंभावी है, मैं किस देश में हूँ, चाणक्य शिखा, बदल रही है हवा, आस्था का अग्निकुण्ड, भारत सावित्री और पाती राम के नाम। गीतों का एकमात्र संकलन है ‘प्रेम गीत’। नंददास, संजीवनी, कुँवर सिंह, रजनीगंधा और पूर्णोदय इनके लिखे प्रबंध काव्य हैं। पंचपल्ल्व, खोटा सिक्का, काल-रात्रि, एक प्याला चाय, आँधी के पत्ते, वे तुतलाते थे और ठंडी छाया कहानी संग्रह हैं। इसके अलावा, मैथिली कविता संग्रह के नाम हैं : माटिक दीप, पूजाक फूल, मेघदूत, और सूर्यमुखी।
‘आरसी और उनके साहित्य’ पर समग्र विचार करना अब भी शेष है। मेरी दृष्टि में आरसी ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। बागमती नदी के किनारे बसे गाँव एरौत की पावन धरती पर 19 अगस्त 1911 को जन्मे आरसी प्रसाद सिंह 15 नवम्बर 1996 को दुनिया से चले गए। उनकी सुलगती हुई साँसें अपने आप में सिमट कर बुझ गईं और चाहने वालों के ज़ेहन में कतराती हुई कतरनें फूटती रहीं। जब भी मुझे आरसी का ख़याल उभरता है, मेरी आँखों का कुँवारापन टूट जाता है और नींदें धज्जी-धज्जी हो जाती हैं।

Monday, February 20, 2012

अध्यात्म और मीडिया


इस लेख के जरिए मैंने बहुत पहले अध्यात्म और मीडिया के बीच के सम्बंध को समझने और समझाने का प्रयास किया था। उस वक़्त एक अख़बार में इसका एक अंश प्रकाशित हुआ था। आज प्रस्तुत है पूरा लेख : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

अध्यात्म और मीडिया
ऐसे शब्द हैं जिसका अर्थ समझना और कहना दोनों मुश्किल मगर नामुमकिन नहीं है। मुमकिन इसलिए कि मैं आज, इस वक़्त आपसे मुख़ातिब हूँ और आप मुझसे। दरअसल, ये दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। वर्तमान में इनका सम्बंध और भी गहरा हो गया है। अध्यात्म और मीडिया में एक बात कॉमन है। इंसान की ज़िंदगी पर सीधा असर होता है। क्योंकि दोनों की वजह से इंसान की ज़िंदगी में क्रांति मुमकिन है। एक आध्यात्मिक व्यक्ति हर तरह से आज़ाद होता है। अगर हम हर तरह से आज़ाद हो जायें तो आध्यात्मिक हो सकते हैं। और इस यात्रा में मीडिया बहुत बड़ा मददगार साबित हो सकता है। मुझे मीडिया से बहुत उम्मीदें हैं। हमारा देश बहुत सालों तक ग़ुलाम रहा। आज हम आज़ाद तो हैं मगर यह सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी है। हम आज भी मानसिक रूप से ग़ुलाम हैं। हम आज भी पूरी तरह से आज़ाद नहीं हैं। जो लोग कहते हैं कि मैं आज़ाद हूँ, उन्हें शायद आज़ादी का अर्थ मालूम नहीं है। मैं इस पर थोड़ी-सी रौशनी डालना चाहुँगा।

आज़ादी का अर्थ जानने के लिए सबसे पहले ग़ुलामी का मतलब समझना बहुत ज़रूरी है। हम ग़ुलाम सिर्फ़ तभी नहीं होते जब हमें जेल या जंज़ीर में क़ैद कर दिया जाता है। हम ग़ुलाम तब भी होते हैं जब किसी नाम
, धर्म, जाति, पार्टी, समाज, सम्प्रदाय, सीमा, सरहद, शादी या ऐसी किसी भी चीज़ से बंध जाते हैं। अगर कोई कहता है कि मैं आस्तिक हूँ तो वह भगवान से बंध जाता है। कोई कहता है कि मैं नास्तिक हूँ तब भी वह भगवान के न होने से जुड़ जाता है। बेहतर ये होगा कि हम किसी चीज़ के होने और न होने की उलझन से बचें। ये हक़ीक़त है कि जब कोई परेशानी या तकलीफ़ हमें गले से लगाती है तो हम बेचैन हो जाते हैं और घबराकर किसी दामन को थामना चाहते हैं। उस वक़्त एक उंगली अगर हमारी तरफ बढ़ती है तो हम पकड़ना चाहते हैं। यह नहीं सोचते कि हम बंध रहे हैं। हम ग़ुलाम हो रहे हैं।

हम सुख और शांति पाने के लिए अध्यात्म का रास्ता इख़्तियार करते हैं। उम्र भर प्यार की जूस्तज़ू करते हैं। हमेशा अपने से बाहर तलाशते हैं। कभी ख़ुद की जानिब मुड़ कर नहीं देखते। कभी अपनी रूह को नहीं टटोलते। क्या आपने कभी ख़ुद को पहचानने की कोशिश की है। एक बार दिल में झाँक कर
, उतर कर देखें। कितना सकून हासिल होगा, इस बात का अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते। अध्यात्म हमें ख़ुद से मुलाक़ात का एक मौक़ा देता है। अगर बाहर भटकना छोड़ कर हम अपने में डूबने की कोशिश करें। प्यार में डूबने की कोशिश करें तो मुमकिन है कि हम इंसानियत को हासिल कर सकेंगे। इसके लिए हमें कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है। हम जहाँ हैं वहीं रह कर इसे हासिल किया जा सकता है। हिमालय की गुफ़ाओं या किसी घने जंगल में जा कर शांति की तलाश करना, अपने फ़र्ज़ से मुकर जाना है।

मैं शुक्रगुज़ार हूँ उन तमाम चैनलों का जिस पर आध्यात्मिक प्रोग्राम दिखाये जाते हैं। आज बहुत से अख़बार हैं
जिसमें आध्यात्म या ज़िंदगी से जुड़ी हुई बातों को बड़ी गम्भीरता से लिखा जाता है। मगर यहाँ पर थोड़ी-सी कमी रह गई है। आज तथा-कथित आध्यात्मिक गुरू अपनी सस्ती लोकप्रियता के लिए मीडिया का सहारा लेते हैं। यह सब प्री-पेड और प्री-प्लान्ड होता है। एक तथा-कथित बाबा अपनी पत्नी की जन्मतिथि का उत्सव मनाने के लिए एक आयोजन करता है। एक दुर्घटना होती है। वहाँ पर सैकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। बाबा मुस्कुराते हुए कहता है – उन लोगों को उनकी मौत यहाँ तक खींच लाई थी। एक दूसरा तथा-कथित बाबा बग़ैर प्रशासन की इजाज़त के अपना हेलीकॉप्टर कहीं भी उतरवा लेता है। और माला पहनाने के लिए घंटों से इंतज़ार कर रही महिला को धक्का दे कर आगे बढ़ जाता है। फिर मंच पर हाथ में माइक लिए हुए आध्यात्म की बात करता है। यह कहाँ तक लाज़िमी है। यह फैसला आप पर छोड़ता हूँ। मैं मुबारक़वाद देता हूँ उन तमाम मीडिया हाउस को जिन्होंने अपने को भगवान बताने वाले तथा-कथित बाबाओं के काले कारनामों का पर्दाफ़ाश किया है। अध्यात्म की आड़ में सेक्स रैकेट चलाने वालों की कमी नहीं है। वक़्त-वक़्त पर इसका ख़ुलासा भी होता रहा है। अगर मीडिया नहीं होता तो यह सब मुमकिन नहीं था। मीडिया के माध्यम से सच सामने आ रहा है। यह एक अच्छी बात है।

एक बात और। आध्यात्मिक होने का मतलब किसी धर्म विशेष के प्रति लगाव या कट्टरपन का भाव अपने अंदर पैदा कर लेना नहीं है। बल्कि तमाम धर्मों के मूल मंत्र को
, उसके आधार को जानकर सबको को बतलाना है। कभी कभी कुछ ख़ास चैनल पर देखने को मिल जाता है कि कोई कवि, लेखक या चित्रकार ज़िंदगी की खुबसूरती को बयान कर रहा है। कभी-कभी किसी ऐसे व्यक्ति की तस्वीर या रचना भी किसी अख़बार की सुर्ख़ी हो जाती है। मीडिया को इसे ही प्राथमिकता देनी चाहिए न कि बलात्कार, हत्या, चोरी, राजनीति बग़ैरह को। मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि प्रेस के मालिक इस तरह की चीज़ों को बढ़ावा दे कर अपना नुकसान कर लेंगे। लेकिन क्या अपने फ़ायदे के लिए इंसानियत को मिट्टी में मिलाना ठीक है? महज चंद रूपयों के लिए इंसानियत को धोक़ा देना, ख़ुद से फ़रेब करना लाज़िमी है? क्या इंसान होने के नाते हमारा इंसानियत और समाज के प्रति कोई फर्ज़ नहीं बनता है? पैसे कमाने के और भी तरीक़े हैं। मुझे लगता है पत्रकारिता के दामन पर यह धब्बा लगाना ग़लत है। अगर हम अच्छी ख़बर न दे सकें तो कम से कम ऐसी ख़बर देने से ज़रूर बचना चाहिए जिससे इंसानियत को शर्मिंदा होना पड़े। आज के दौर में हमारे पास मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिसकी मदद से ज़िंदगी को खुबसूरत बनाया जा सकता है। शर्त ये है कि इसका सही इस्तेमाल किया जाये।

इस बाबत ग्रेज़ुएशन के दौरान अपने रूम पार्टनर के मनोविज्ञान का मुझे थोड़ा-सा तज़ुर्बा है। उसे रेसलिंग मैच देखना बहुत पसंद था। मैंने नोटिस किया कि जिस दिन वह रेसलिंग मैच देखा करता था। उसके व्यवहार में थोड़ी-सी तब्दीली होती थी। वह और दिन की तरह नॉर्मल नहीं होता था। तब मुझे पता चला कि हम जिस तरह की चीज़ों को देखते हैं
, उसका असर हमारे उपर होता है। आज मीडिया जिस तरह की ख़बरें पेश करता है, मुमकिन है कि दर्शक या पाठक की संख्या में इज़ाफ़ा हो मगर यह इंसान के लिए बेहतर नहीं है। दिल्ली में रहने की वजह से मेरा अकसर मेट्रो से सफ़र करना होता है। आज तक किसी भी चेहरे पर मुस्कुराहट मुझे नज़र नहीं आई। सब परेशान-से लगे। मीडिया भी उस मुस्कान की मौत का ज़िम्मेदार हैएक लड़का और एक लड़की भी अगर साथ हैं तो एक ख़ौफ़ उनकी पलकों पर तड़प रहा होता है कि पता नहीं अगले लम्हे में क्या होगा? शायद कोई फ़तवा ज़ारी हो जाये। शायद कोई खाप पंचायत उनके मुस्तक़बिल का फ़ैसला कर दे। शायद कोई भाई उनकी मौत का सबब बन जाये। या फिर वो ख़ुद ही ख़ुदकशी कर लें। कुछ भी नहीं कहा जा सकता। एक कहानी याद आती है। एक सड़े हुए सेब की वजह से टोकरी में रखे सारे सेब ख़राब हो गये। मीडिया को अपना फ़र्ज़ समझना चाहिए।

एक दफ़ा एक बरिष्ठ मीडियाकर्मी से बातचीत करते हुए
, उन्होंने कहा कि लोग जो चाहते हैं हम वही परोसते हैं। यह बाज़ार की माँग है। यह लोगों की ज़रूरत है। आख़िर लोगों की ज़रूरत इतनी बुरी क्यों है। उदाहरण के तौर पर हम सेक्स को ले सकते हैं। सेक्स हर इंसान की ज़रूरत है। हम इससे मुँह नहीं मोड़ सकते। मुझे याद है जब मैं हॉस्टल में था। आठवीं या नौवीं कक्षा की बात है। मेरे सहपाठी अपनी किताबों में अश्लील तस्वीर रख कर देखा करते थे, सहेज कर रखते थे। क्लास की लड़कियों पर कमेंट्स पास किया करते थे। इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं थी। वह सब सेक्स को छुपाने का नतीज़ा था। आज मीडिया के हर माध्यम का इस्तेमाल सेक्स परोसने के लिए किया जा रहा है। चाहे वह प्रिंट हो, टेलीविज़न हो, इंटरनेट हो, मोबाइल हो। हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते की आज के दौर में ज़रूरतें पैदा की जाती हैं। आज विज्ञापन का ज़माना है। बाज़ार में उत्पाद उतरने से पहले ही विज्ञापन नज़र आने लगता है। हम इंतज़ार करने लगते हैं। और किसी वजह से लेट हो गया तो हमारा सब्र खोने लगता है। उदाहरण के लिए नैनो कार। कहीं कोई विज्ञापन नहीं। मगर राजनीति का सहारा लेकर इसे से लोकप्रिय बनाया गया। अभी कार बाज़ार में आई भी न थी और लाखों की संख्या में अग्रिम बुकिंग हो गई।

हमारे पास दोनों चीज़ें हैं। अच्छी ख़बर भी और बुरी ख़बर भी। फूल भी
, ख़ार भी। यह हमारे उपर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं? क्या देना चाहते हैं? समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? ख़ासकर एक पत्रकार को इस बात की पूरी ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए कि वह जो कुछ कर रहा है इंसानियत के लिए कितना फ़ायदेमंद है? मगर ऐसा नहीं हो रहा है। हाल ही में मैंने एक न्यूज़ चैनल ज्वाइन किया। मैंने पाया कि हत्या, मौत या बालात्कार की ख़बर को ज़्यादा प्राथमिकता दी जाती है। कोई किसी लड़की के साथ एक बार शारीरिक बालात्कार करता है मगर पैकेज बनाते समय और ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर चैनल पर प्रसारित करते समय उस लड़की के साथ कई दफ़ा मानसिक बालात्कार किया जाता है। अगर यही ख़बर अख़बार में छपती है तो जितने लोग इस ख़बर को पढ़ते हैं उतनी दफ़ा बालात्कार होता है। यह ग़लत है। क्यों न ऐसी व्यवस्था बनाई जाये कि बालात्कार करने जैसी भावना ही पैदा न हो। किसी के मन में हत्या करने का विचार भी पैदा न हो। ऐसा हो सकता है।

अगर मीडिया ज़िंदगी की सच्चाई को सबके सामने लाने की कोशिश करे। एक रहनुमा बन कर। एक आध्यात्मिक गुरू बन कर। तो ज़िंदगी जन्नत हो सकती है। मीडिया के कुछ माध्यमों के द्वारा ऐसा किया भी जा रहा है। मुझे उस वक़्त बहुत अजीब लगा जब एक ऑटो ड्राईवर ने एक सफर में मुझसे कहा कि मैं किसी का ख़ून कर के अपना नाम और तस्वीर अख़बार में और अपने आप को टेलीविज़न पर देखना चाहता हूँ। एक लम्हे के लिए तो मुझे लगा कहीं वह मैं तो नहीं जिसे वो ख़ून कर देना चाहेगा। मैं बहुत दिनों तक सोचता रहा कि उसने ऐसा क्यों कहा
? शायद अब भी सोच रहा हूँ। सच तो यह है कि मीडिया समाज में ज़हर फैला रहा है। यह बात हर एक चैनल या अख़बार पर लागू नहीं होता। लेकिन मीडिया जिस रूप में आज हमारे सामने है वह बहुत ही ख़तरनाक है, इंसानियत के ख़िलाफ़ है। इसकी भी एक वजह है। मीडिया हमारी ज़मीन की पैदाईश नहीं है। हम जिस मीडिया की बात करते हैं, हमारी संस्कृति की उपज नहीं है। यह महज पश्चिम की नकल है। ठीक वैसे ही है जैसे काग़ज़ का फूल।

आज मीडिया की वजह से अध्यात्म के क्षेत्र में विस्तार हुआ है। बहुत से लोग पश्चिम से हमारे देश में आध्यात्मिकता के नाम पर खीचे चले आते हैं। क्या हम उन्हें सच्चे अध्यात्म का सबक़ पढ़ा रहे हैं। हमें अपने घरों में
, अपनी ज़मीन में मीडिया के पौधे लगाने की ज़रूरत है। पूरी तरह से एक हिन्दुस्तानी मीडिया। एक आध्यात्मिक मीडिया। जिसकी जड़ें भी हमारी हों, तना भी हमारा हो, फूल भी और फल भी सब हमारे इख़्तियार में हों। मीडिया में आध्यात्म का प्रवेश होते ही बहुत सी ख़राब चीज़ें अपने आप ख़त्म हो जायेंगी। पत्रकारिता के कोर्स में आध्यात्म के पाठ पढ़ायें जाने चाहिए। ताकि सेहतमंद पत्रकार पैदा हो और सेहतमंद पत्रकारिता की बुनियाद रखी जा सके। जिस रोज़ यह मुमकिन हो सकेगा। उस रोज़ इंसान की ज़िंदगी के इतिहास में एक बहुत बड़ी तब्दीली होगी। हर एक चेहरा मुस्कुरायेगा। हर एक आँखों में नूर नाच उठेगा। हर एक फूल महकेगा। हर तरफ प्यार ही प्यार होगा।

Saturday, January 07, 2012

इंडिया गेट पर रोमांस !

इंडिया गेट पर कई प्रेमी युगल एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले यही दुआ माँग रहे हैं...ये धुआं धुआं-सा रहने दो हल्की बरसात में शीशे जैसी बूँद और धूँध जैसे रूहों में एक नई आंच फूंक रही हो इस आंच पर आँख पिघलती है और कई खूबसूरत मंज़र उभरने लगते हैं दिल्ली में एक ओर जहाँ कोहरे की वजह से कई दिक्क्तें पैदा होती हैं, वहीं दूसरी ओर कई प्रेमी युगलों की यह तमन्ना है कि धुंध की चादर में खुद को लपेट लें और कहीं खो जाएँ। दरअसल, इस तमन्ना की सारी वजह है 'प्रेम'  प्रेम, जिसे सबलोग अपनी तरह से परिभाषित करते हैं मगर सच तो यह है कि प्रेम किसी परिभाषा के दायरे में नहीं रह सकता है। इसकी कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। इसके विषय में कुछ कहना बहुत मुश्किल है। दरअसल, इसे जीया जा सकता हैकहा नहीं जा सकता। ठीक वैसे हीजैसे आकाश में उड़ती हुई किसी चिड़िया से पूछा जाए कि आकाश क्या हैतो वह कहेगी - ये जो मेरे चारों है वही आकाश है। ठीक उसी वक़्त यदि उससे आकाश की परिभाषा पूछा जाए तो वह मुश्किल में पड़ सकती है। प्रेम एक ऐसा शब्द हैजो हमारी सोच की सतह पर अलग-अलग मानी के साथउम्र की मुख्तलिफ परतों में जमता है। पिघलता हैनिखरता है और सबके दिल में आकार लेता है  प्रेम तो मनुष्य का स्वाभाव होता है। यह हमारा गुण नहीं। यदि हम यह सोचें कि हम दुखी हैं या सुखी तो पक्का हम अपने जीवन में दुःख भर लेंगे। हमें सिर्फ जीना है, अपना काम करना है। सुख और दुःख दोनों को अपनाने की ज़रुरत है। ज़रा-सा दूर रहकर देखना है। दोनों आते हैं और चले जाते हैं। ये दोनों एक सिक्का के दो पहलू की तरह हैं। जहाँ भी होंगे... दोनों मौजूद होंगे।  इसे अलग नहीं किया जा सकता।  जब हम यह सोचना बंद कर देंगे कि हम सुखी हैं या दुखी, तभी एक नई क्रांति हमारे जीवन में घटित हो जाएगी सारा जीवन आनंद से भर जाएगा हम प्रेममय हो जाएँगे हम प्रेम हो जायेंगे तो क्यूँ न परमात्मा को शुक्रिया कहते हुए, इस कोहरे को एक मौक़ा की तरह इसेमाल करें। इंडिया गेट पर रोमांस की दुआ माँगे। 

Tuesday, December 27, 2011

मिर्ज़ा 'ग़ालिब' के घर मुशायरा !


नींद ने पलकों पर कदम रखा ही था कि ख़ामोशी काँच की तरह टूट कर कमरे में बिखर गई। उसमें एक मेरी आवाज़ भी शामिल थी, जो चुभ गई। नींद के तलवों से लहू निकल आया। किसी ने कहा
“हैलो!”

जी, फरमाइए।
ग़ालिब बोल रहा हूँ।
अस्सलाम-वालेकुम।
कैसे हो बेटा?”
बस आपकी दुआ है।
मेरी हवेली पर एक मुशायरा है, तुम्हें कल आना है।
जी ज़रूर, आपकी खिदमत में हाज़िर रहुंगा।

...और अचानक मैं अपने आपको ग़ालिब की हवेली में मौजूद पाता हूँ। यह हवेली ईंटों से बनी अर्द्धवृताकार मेहराबे, तराशे हुए दिल्ली के नियमित कटे क्वार्ज़ाइट पत्थरों से बने चौकोर खंभों पर टिकी है। विभाजन तथा बाद के जोड़तोड़ से इमारत ने अपनी मौलिकता को खो दिया है। इस महान शायर को श्रद्धांजलि स्वरूप दिल्ली सरकार ने इसे एक यादगार के रूप में पुर्नजीवित किया है। सरकार के द्वारा इस हवेली पर 2 दिसम्बर 1999 को कब्जा कर लिया गया तथा 27 दिसम्बर 2000 को इसका उदघाटन करने के साथ ही इसे जनता के लिये खोल दिया गया। यह हवेली कासिम जान की इमारतों में से एक है जो रिहायशी और कारोबारी निर्माण की वजह से अभी तक अपना प्राचीन स्वरूप बनाए हुए है। सन 1860 ई. में ग़ालिब इस हवेली में आये और अपने अंतिम समय तक रहे।

मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू शायरी के एक मशहूर शायर हैं जिन्होंने आधुनिक उर्दू गध को भी अपनी लेखन-क्षमता से गीला रखा। वे उर्दू एवं फारसी भाषा की कविता के लिए बहुत प्रसिद्ध हुए। उन्होंने अरब देश (पश्चिम एशिया एंव अफ्रीका) में भी लोकप्रियता हासिल की। ग़ालिब का जन्म 27 दिसम्बर 1797 में आगरा (उत्तर प्रदेश) के एक सामान्य तुर्की-मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके पिता असदुल्लाह बेग खान राज्यसेना में एक सिपाही थे। उनकी माता इज़्ज़्त-उन-निसा बेगम एक घरेलू औरत थी। ग़ालिब का असली नाम मिर्ज़ा (मोहम्म्द) असादुल्लाह बेग़ खान था।

1802 ई. में जब ग़ालिब पाँच साल के थे तो रियासत अलवर (राजस्थान) में लड़ाई के दौरान उनके पिता मारे गये। तब वे अपने चाचा नसरउल्लाह बेग खान के साथ रहने लगे जिनकी मृत्यु पॉच साल बाद गई। तब उनका जीवन-यापन परिवार के पेंशन से चलने लगा तथा साथ में उनके भाई मिर्ज़ा युसूफ भी रहते थे। 19 अगस्त 1810 को 13 वर्ष की उम्र में उनका निकाह दिल्ली के इलाही वख़्श खान मारूफकी बेटी उमराव बेगम के साथ कर दी गई। 1812-13 में वह आगरा छोड़कर हमेशा के लिए दिल्ली आ गए। वह पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान मोहल्ले के एक छोटे-से घर में रहने लगे।

ग़ालिब के सात बच्चे हुए पर एक भी जिन्दा न रह सका। उन्होंने अपनी पत्नी के भतीजे को गोद लिया मगर वह भी मर गया। दत्तक पुत्र की मौत के बाद ग़ालिब ने एक नज़्म लिखी जो उनकी संग्रह में है। 1807-08 ई. में शायरी का आग़ाज हुआ और असदके नाम से लिखने लगे। फिर 1816 ई. में गालिबतख़ल्लुस (उपनाम) रखा। 6 अप्रैल 1833 ई. में दीवान संपादित हुआ पर पहला संस्करण अक्टूबर 1841 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने 1826-27 में बकायदा फारसी शायरी का आग़ाज किया। फारसी का दीवान 29 अप्रैल, 1835 ई. में सम्पादित हुआ और पहला संस्करण 1845 में प्रकाशित हुआ।

ग़ालिब बहुत बड़े शायर और फारसी के विद्वान थे। उर्दू शायरी की वजह से वे ज्यादा चमके और इस मुकाम को पाया। प्रारम्भ में उनके स्टाइल को समझना मुश्किल था इसलिए लोगों को समझने में दिक्कत हुई। उसके बाद उन्होंने लिखने के ढंग में परिवर्तन किया और लोगों के दिल में बस गए। ग़ालिब कविता/शायरी और गद्य के अलावे ख़त भी लिखते थे। उनके ख़त लिखने का अंदाज अद्वितीय था। वह आधुनिक, साधारण और सीधा लिखते थे। इसलिए उन्हें आधुनिक गद्य का पिताभी कहा जाता है। उनका गद्य देश के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को दर्शाता था। उनके कार्यों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया है।

मिर्ज़ा ग़ालिब ने मुग़ल सलतनत में 1847 ई. में प्रवेश किया। 4 जुलाई, 1850 ई. को तैमूरी खानदान का इतिहास लिखने पर नियुक्त हुए। इसी वर्ष नज़्म-उद-दौला’, ‘दबीर-उल-मुल्कऔर निज़ाम-जंगके खिताब से बहादुर शाह जफर ने नवाज़ा। 1854 ई. में वह मुगल राजकुमारों के शिक्षक के रूप में चुने गए जिसके बदले उन्हें सलाना वेतन मिलता था। इसी वर्ष ग़ालिबदरबार कवि के रूप में भी कार्यरत हुए। ग़ालिब ने एक सुख सम्पन्न जीवन जीया। जीवन के अंतिम दिनों में उनकी आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय हो गई। 72 वर्ष की आयु में ग़ालिब का इंतकाल 15 फरवरी, 1869 को दिल्ली में हो गया। बस्ती निज़ामुद्दीन में लीहारु खानदान की हड़वाड़ में दफ़्न हुए।

...अचानक मुशायरे की आवाज़ सुनकर मेरे क़दम हवेली के दूसरे कमरे में दाखिल हुए जहाँ ग़ालिबअपनी ग़ज़ल पढ़ रहे थे
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता
हुए हम जो मर के रूस्वा हुए क्यों न गर्के-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता 

Friday, December 02, 2011

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है



बीइंग पोएट का पहला पोस्ट...। आँख एक ऐसा विषय है जिसके बारे में बहुत से लोग बहुत सी बातें करते हैं। ख़ासकर साहित्य और सिनेमा में आँखों के ऊपर बहुत कुछ लिखा और कहा गया  है। इन्हीं पहलुओं को समेटते हुए यह लेख : त्रिपुरारि कुमार शर्मा 


नीली आँखें कहती हैंमुझे प्यार करो, नहीं तो मर जाऊँगी। काली आँखें कहती हैंमुझे प्यार करो, नहीं तो मार दूँगी। यह एक स्पेनिश कहावत है। अक्सर हमें कहावतों में बुनियादी रंग नज़र आता है। कहावतें हमारी सोच की उपज होती हैं। मैं इसे साहित्य और समाज से परे नहीं मानता, बल्कि इनके बीच का मानता हूँ। ऐसे में बात जब आँख की हो या आँख के सम्बंध में कुछ कहने की हो तो हमारे साहित्यकार और रसिक जन कैसे पीछे रह सकते हैं। तमाम भाषाओं में आँख और आँख की खूबसूरती को बयान करने की कोशिश की गई है। पर कहते हैं कि जो बात कह दी जाए या बयान हो सके वो झूठी हो जाती है क्योंकि सच हमेशा अनकहा, अनछुआ, अनगढ़ और कुदरती रूप में होता है फिर भी साहित्य में आँख को लेकर क्या कुछ नहीं लिखा गया है। 

जर्मन लेखक और कवि राइनर मारिया रिल्के की एक कविता है जिसका अनुवाद रामधारी सिंह दिनकर ने किया है। कविता कुछ इस प्रकार हैकाढ़ लो दोनों नयन मेरे, तुम्हारी ओर अपलक देखना तब भी छोड़ूँगा यहाँ प्रेम अपनी पराकाष्ठा की हद को छू लेता है। आँख होने के बावजूद भी लगातार देखे जाने की बात वही इंसान कर सकता है, जिसकी अंतर्दृष्टि खुल चुकी हो। जो मात्र बाहरी आँख के भरोसे ज़िंदा हो। सच तो यह है कि प्रेम ही एकमात्र आँख है इस दुनिया में। अब मैं उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की लिखी एक नज़्म का ज़िक़्र करना चाहूँगा। इस नज़्म में अपने जिसमें वो महबूब की खूबसूरती के पुल बाँधते हुए फ़ैज़ कहते हैं तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है हालाँकि यह नज़्म रुमान और इंक़लाब के दर्मियान बनते-बदलते रिश्ते के मंज़र को अपने नग्न रूप में पेश करती है मगर ये एक अशआर आज तक दुनिया में प्यार करने वालों की ज़ुबान पर रेंगता है। ये बात और है कि कुछ चाहने वाले अपने महबूब को चाहते हुए भी ये पंक्ति समर्पित कर देते हैं। आँख लफ़्ज़ का इस्तेमाल अलग-अलग रचनाकारों ने अपनी सोच की गहराई के अनुसार मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में किया है।

बात
अगर मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब की हो तो मैं आपको पहले ही बताता चलूँ कि ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि ग़ालिब ऊँचे दर्ज़े के शायर थे। मैं ये बात कहने की ज़रूरत भी महसूस नहीं करता कि ग़ालिब की शायरी में अनायास ही फिलॉसफी का पुट हो जाता है। जब ग़ालिब कहते हैं - रगों में दौड़ते रहने के हम नहीं क़ायल, जब आँख से ही टपका तो फिर लहू क्या है अब यहाँ लहू का आँख से टपकना एक अजीब-सी बात मालूम पड़ती है जो इस बात का भी सबूत है कि ग़ालिब के दामन--दर्द किस क़दर गीले थे। किस क़दर तकलीफ़ के तकिए पर सर रख कर उम्र भर सोते रहे गालिब और सोच किस आँच पर पकती रही। ग़ालिब का ही एक शेर हैआँख की तस्वीर सरनामे पे खींची है कि ता, तुझ पे खुल जाए कि उसको हसरत--दीदार है इस शेर में कहा गया है कि लिफ़ाफ़े पर आँख तस्वीर बनाई है ताकि यह पता चले कि तुम्हें देखना चाहते हैं।  

अपनी
शायरी में सियासत की स्याही सहित मुहब्बत की सादगी समोने वाले अहमद फ़राज़ कहते हैंसुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं, सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं  यहाँ आँख भर के देखना मुहावरा का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से किया गया है। महबूब को देखने की आरज़ू में फ़राज़ उसके शहर में कुछ दिन ठहरना चाहते हैं। बहुत ही साधारण ढंग से कही गई बात अपने में एक गहरा रहस्य छुपाए हुए है। फ़राज़ का ही एक शेर हैतू भी दिल को इक लहू की बूँद समझा है फ़राज़’, आँख गर होती तो क़तरे में समंदर देखता मुझे नहीं लगता कि कहने की ज़रूरत है कि क़तरे में समंदर देखने के लिए जिस मासूम आँख की आवश्यकता पड़ती है वो सब के पास नहीं होती। दरअसल किसी भी चीज़ या बात को कई डायमेंशन्स से देखा जा सकता है। जिस तरह बीज में दरख़्त की सम्भावना छुपी होती है और उसी बीज में फल, फूल, खुशबू आदि सबकुछ मौजूद होता है। उसी तरह क़तरे में समंदर देखने के लिए हमें आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होगी। कुछ लोगों का ऐसा मानना है यह दृष्टि, यह नज़रिया हमें हासिल करना होता है। मैं बता दूँ कि यह दृष्टि हमें प्राप्त ही है। हमारे पास यह आँख मौजूद ही है। कुदरत ने हमें इतना सम्पन्न बनाया है कि हममें सबकुछ मौजूद है। बस एक दफ़ा अपनी ही ओर देखने मात्र की आवश्यकता है। अगर हम अपनी रूह की मानंद झाँक कर पलट कर देखें तो पता चलता है कि हम खुद इस दृष्टि के मालिक हैं। बस बेहोशी की धूल हमारी आँख पर बिखरी हुई है। उस धूल के हटते ही सबकुछ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता है।

साहित्य
में आँख की उपमा कई चीज़ों से दी गई है। कभी आँखों से पीने-पीलाने की बात की जाती है तो कभी आँखों को प्याला और मयक़दा क़रार दिया जाता है। मोहम्मद अल्लामा इक़बाल समझना चाहते हैंकोई समझाए क्या रंग है मयखाने का, आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का" इस मिसरे में दिलों में दौड़ती हुई मस्ती का सबब पैमाने को ठहराया जा रहा है मगर इस बात से शायर वाक़िफ़ है कि यह सबकुछ साक़ी की आँख की बदौलत हो रहा है। आँखों में कई ख़ुशनुमा मंज़र उलझ कर रह जाते हैं। पुरानी याद या फिर कोई मिलने-बिछुड़ने का मंज़र आँख के साथ इस तरह चस्पां हो जाता है कि उसके बीच शब्दों की दीवार खड़ी करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन-सा मालूम होता है। कुछ इसी तरह के एहसास को महसूसती हैं श्रद्धा जैन फिर लिखती हैं – “कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं, कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी अक्सर जब किसी रूह पर प्यार की मेहर बरसती है तो एक लम्हा ऐसा आता है जब आँख जो कुछ देखती है होंठ बयान करने में सक्षम नहीं होता। जब होंठ कुछ कहना चाहते हैं तो शब्द की कमी पड़ जाती है। श्रद्धा जैन के ही शब्दों में - ‘‘आँख जो कुछ देखती है लब पे सकता नहीं, महव--हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जायेगी

आँख
से आँसू का मरासिम किसी से छुपा नहीं है। गुलज़ार बहुत ही बारीक़ लहज़े और साधारण शब्दों में कहते हैं – “शाम से आँख में नमी-सी है, आज फिर आप की कमी-सी है आँख और आँसू के दर्मियान अनकहे और दिलकश रिश्ते को पेश करते हुए एक नज़्म जो ज़िंदगी के एक ठंडे पड़ाव पर किसी खूबसूरत लम्हे में मैंने एक नज़्म लिखी थी 

तुम्हारी
स्याह-सी आँखों में
सफ़ेद नूर का सूखा हुआ टुकड़ा
जैसे नून के दामन में हल्का-सा नुक़्ता
और जब खुलती हैं पलकें
उस चिपके हुए धब्बे की जानिब
नज़र ज़ख़्मी हो जाती है बारहा मेरी
तुम रोने से बचती हो मेरे सामने अकसर
मगर अश्क़ की खुशबू पहचानता हूँ मैं
तुमसे कहीं ज़्यादा तुमको जानता हूँ मैं
कुछ और तो नहीं बस एक बात का हक़ है
उदास आँखों में पानी अजीब लगता है। 

वैसे
तो आँखों से फूल झरना, आँख का खुलना जैसे फूलों का खिलना, पलकों का आँखों में आँसू जैसे मोती का जड़ा होना आदि कई बातें कही गई हैं। धीरे-धीरे वक़्त के साथ हालात में भी तब्दीली आई है। ज़ाहिर है कि आँख की तुलना भी अन्य शब्दों, अन्य चीज़ों से दी जाने लगी। मधुरिमा सिंह लिखती हैं – “धुआँ-धुआँ है शहर आग-आग आँखें हैं, वो एक शख़्स तो हँसता दिखाई देता है  


हिंदी फ़िल्मों में भी आँखों पर जमकर लिखा गया है। आँखों पर कुछ मशहूर पंक्तियांआँखों ही आँखों में इशारा हो गया...’, सुरमई अँखियों में...’, आँखों के रस्ते दिल में उतर के...’, अंखियों के झरोखों से... वग़ैरह। हिंदी फिल्मों के एक मशहूर गीतकार जाँ निसार अख़्तर का एक शेर है – “मैं सो भी जाऊँ तो क्या मेरी बंद आँखों में, तमाम रात कोई झांकता लगे है मुझे इस शेर में बंद आँखों में झांकना एक ऐसा ख़्वाब है जो कभी मुक़्क़मल नहीं हो सकता। अपने प्रसिद्ध नाटक ऑथेलो में भी शेक्सपियर ने लिखा है कि हरी आँख वाले से होशियार रहें इसी तरह से इंसान की सोच की सतह पर जाने कितने रंगों में आँख उतरती है और साहित्य का कोना-कोना रौशन रहता है। कहने के लिए तो आँख महज कुछ रासायनिक तत्वों का योग है मगर वो जो एहसास है, वो कुदरत की देन है ताकि हम सभी प्रेम को उपलब्ध हो सकें परमात्मा में विलीन हो सकें।