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Monday, August 19, 2013

समय के आईने में आरसी : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

मेरी दृष्टि में आरसी प्रसाद सिंह ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। आरसी की जन्मतिथि ((19 अगस्त) पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए, प्रस्तुत है यह लेख  - त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

किसे ख़बर थी कि छायावाद के तृतीय उत्थान के कवियों में विशेष स्थान रखने वाले रचनाकार के साथ समय ऐसा (निर्मम) न्याय करेगा। एक ऐसा कवि, जिसे ‘जीवन-जोश-जवानी’ और ‘आस्था-अर्पण-अध्यात्म’ का कवि कहा जाता है। एक ऐसा कथाकार, जिसकी कहानियों में वक़्त की महीन बुनावट का बेहतर नमूना मिलता है। एक ऐसा एकांकीकार, जिसके एकांकी नाटकों में सामाजिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वरूप झलकता है। जिसके ख़िला़फ युवावस्था में ही तत्कालीन पत्रिका ‘युवक’ (सम्पादक : रामवृक्ष बेनीपुरी) में प्रकाशित रचनाओं में क्रांतिकारी शब्दों का प्रयोग करने पर अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ़्तारी का वारंट जारी कर दिया। जिसने न सिर्फ़ हिंदी भाषा, बल्कि मैथिली भाषा के साहित्य को भी समृद्ध किया। जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मानों से नवाज़ा गया। जो देश-प्रदेश की अनेक संस्थाओं एवं सरकार द्वारा समय-समय पर सम्मानित और पुरस्कृत होता रहा। मैं बात कर रहा हूँ उस शख़्सियत की, जो एक साथ उपमा और उपमेय दोनों है। मैं बात कर रहा हूँ महान चिंतक, विशिष्ट साधक और युगाराध्य कवि आरसी प्रसाद सिंह की।
यह बात किसी अचरज से कम नहीं कि 74 वर्षों तक (किसी भी कवि के जीवन में सबसे लम्बा रचनाकाल) लगातार लिखने के बावजूद ‘आरसी और उनके साहित्य’ का विवेचन एक व्यापक दृष्टि के तहत नहीं किया गया। आलोचक यह कह कर अपना पल्ला झाड़ते रहे हैं कि आरसी के लेखन में कोई केंद्रीय भाव नहीं है। उनकी कोई तय विचारधारा या लेखन क्षेत्र नहीं है। एक आलोचक व्यक्तिवादी गीति कविता-धारा (जिसमें आरसी भी शामिल हैं) के बारे में लिखते हैं, “इनके पास जीवन-दृष्टि नहीं थी—न तो पुरानी आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि और न नवीन समाजवादी दृष्टि। ये कवि अपने अनुभवों से परिचालित हो रहे थे, उनके अनुभव भावुक हृदय के अनुभव थे। उनकी दृष्टि रोमानी थी, अत: वे व्यक्ति को न तो सामाजिक शक्ति से जोड़ सके न आध्यात्मिक आदर्शों से। जीवन-दृष्टि के अभाव में यह व्यक्तिवादी अनुभव निराशा, मृत्यु की छाया और नियति बोध से ग्रस्त हैं।” मैं इनकी बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। ठीक है कि आरसी (और उस समय के कवियों) के पास जीवन-दृष्टि नहीं थी। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि जिनके पास जीवन-दृष्टि होती है, उनके पास जीवन नहीं होता। यह बात स्वंय साबित हो जाती है कि आरसी के पास जीवन-दृष्टि न सही, जीवन था। इसीलिए तो हम उन्हें जीवन और यौवन का कवि कहते हैं।
दूसरी बात, क्या बिना किसी दृष्टि के कविता सम्भव है? हाँ, आरसी की दृष्टि समय के साथ बदलती रही है, जिसे मैं सकारात्मक पक्ष समझता हूँ। आलोचक शायद इस बात से सहमत होंगे कि नदी तभी तक ज़िंदा मानी जाती है, जब तक उसमें प्रवाह है। अपनी रचनाओं में विविधता संजोने वाले आरसी ने गुणात्मक रूप से प्रयोग किए हैं। मुझे लगता है यही विविधता आरसी की सबसे बड़ी ख़ूबी है और सच्चा-सार्थक कवि होने का सबसे बड़ा प्रमाण भी। तीसरी बात, मैं नहीं मानता कि कविता का काम कोई आदर्श स्थापित करना नहीं है। न तो सामाजिक और न आध्यात्मिक। कविता तो सभी आदर्शों-अनादर्शों के पार ले जाती है। जहाँ से कवि की पुकार उठती है। यही पुकार आरसी को ‘उमर ख़य्याम’ की परम्परा से जोड़ती हुई आगे लेकर भी जाती है। जब आरसी कहते हैं : तेरा पथ जाता उधर जहाँ बहती निशिबासर मद-धारा / मेरे हित शूली, दमन, दंड मेरा विश्राम भवन कारा। / करबद्ध सदैव मनाता तू, मेरी मधुशाला रहे अचल। / मैं कहता, मानव की जय हो निर्भय हो जगतीतल सारा। (कलापी)
इसी सिलसिले में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का कथन उचित मालूम पड़ता हैं, “आरसी का काव्य मर्म-मूल से प्रलम्ब डालियों और पल्लव-पत्र-पुष्पों तक जैसा प्राण-रस संचारित करता रहा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। किसी एक विषय, स्वर या कल्पना के कवि वह नहीं हैं। उनकी सम्वेदना जितनी विषयों से जुड़ी हुई है, उनकी अनुभूति जितनी वस्तुओं की छुअन से रोमांचित है, उनका स्वर जितने आरोहों, अवरोहों में अपना आलोक निखारता है, कम ही कवि उतने स्वरों से अपनी प्रतिभा के प्रसार के दावेदार हो सकते हैं।” आरसी ने अपने जीवन काल में जब-जब जो-जो भोगा, लिखा। अडिग चट्टान बनकर उम्र के विभिन्न पड़ावों पर आने वाली बाधाओं का डटकर मुकाबला किया। उम्र भर नियंत्रण के ख़िलाफ आक्रोश ज़ाहिर करते रहे। जीवन को ‘निर्झर’ की तरह जिया। आरसी का साहित्य सच्चे अनुभवों की आग में पकी हुई फसल है। यह बात और है कि उनकी मस्ती से भरी रचनाएँ पाठकों को अधिक प्रिय हैं। आरसी ‘नई दिशा’ शीर्षक कविता में लिखते हैं : तुम मेरी मस्ती को देखो / इतनी मस्ती, इतनी मस्ती / मैं बहका-बहका जाता हूँ। / कुछ का कुछ हूँ सुन लेता मैं / कुछ का कुछ कह जाता हूँ। / जब आती है मौज किसी की / मैं तस्वीर सजा लेता हूँ। / जब उमंग उठती है / मैं ज़ंजीर बजा लेता हूँ।
इस मस्ती की एक वजह और भी है। कवि को मालूम है कि जीवन एक यात्रा है और जन्म-मरण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। इस सच से जिसका साक्षात्कार हो चुका हो वही लिख सकता है : सुंदरता अभिशाप विश्व का / सुंदरता वरदान प्रिये / इस क्षणभंगुर सुंदरता पर मत करना अभिमान प्रिये / यौवन के इस प्रखर तरणि को एक दिवस ढल जाना है / मृत्यु ताप लगते ही हिम की / इस छवि को गल जाना है। (कलापी) प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने आरसी की कृति ‘नन्ददास’ के बारे में लिखा है, “रोमांटिक कवियों में कुछ कवि आगे चलकर अध्यात्मवाद की ओर मुड़ गए और आरसी भी उनमें से एक हैं। निराला ने ‘तुलसीदास’ की जीवन कथा के माध्यम से देशकाल के शर से विंधकर ‘जागे हुए अशेष छविधर’ छायावादी कवि की छवि देखलाकर परम्परा का विकास किया तो कवि आरसी ने ‘नन्ददास’ के माध्यम से परम्परा का पुनरालेखन किया है।”  
आरसी की कहानियों को पढ़ते हुए अक्सर जयशंकर प्रसाद का स्मरण हो उठता है। क्योंकि प्रसाद की कहानियों (उदाहरण के लिए ‘पुरस्कार’) में कई जगहों पर प्रेम और बलिदान का द्वंद्व दिखाई देता है। इस बात की पुष्टि हरीश जायसवाल के एक कथन से होती है। हरीश लिखते हैं, “आरसी बाबू की कहानियों में जहाँ प्रेम अपनी ऊँचाई पर दीख पड़ता है वहाँ बलिदान भी अपनी चरम सीमा पर स्थित मालूम होता है। सस्ते रोमांस की कमी उनकी कहानियों को और अधिक निखारने में बहुत हद तक कामयाब हुई है। प्रेम के नाम पर आधुनिक नीचता से कहानी अछूती मालूम होती है जो शुभ है।” सच तो यह है कि आरसी की कहानियों में एक विशेष प्रकार का मनोरंजक तत्व है। इसमें न सिर्फ़ भावना, कल्पना तथा यथार्थ का अद्भुत समन्वय है, बल्कि जीवन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है।
जब हम एकांकी की बात करते हैं, तो इसमें भी भारतीय समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। उदाहरण के लिए ‘पुनर्मिलन’ और ‘वैतरणों के तीर पर’। इसके अलावा, ‘जब दुनिया अबोध थी’ एकांकी में एक अजीब तरह की ‘फैंटेसी’ देखने को मिलती है। यह ‘फैंटेसी’ आरसी के विशाल कल्पना लोक का एक हिस्सा भर है। डॉ. रामचरण महेंद्र आरसी की एकांकियों का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं, “आरसी प्रसाद सिंह एकांकियों में भी चिंतन-प्रधान गम्भीर साहित्य की सृष्टि कर सके हैं। इनमें समाज, धर्म, राजनीति, सामाजिक घटनाओं, भौतिकवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद का विवेचन हुआ है।”  
आज के दौर में जहाँ साहित्यकार बच्चों के लिए कम लिख रहे हैं, वहीं आरसी के यहाँ बच्चों के लिए विशेष सामग्री मौजूद है। बच्चों के मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ रखने वाले आरसी के बारे में समालोचक प्रताप साहित्यालंकार का कहना है, “आरसी शिशुओं और बालकों की अपेक्षा किशोरों के कवि हैं। कवि की अधिकांश कविताओं की रचना 12 से 16 वर्ष की उम्र के कोमल और सुकुमार मति वाले किशोरों के लिए हुई है। यद्यपि कवि ने शिशुओं के उपयुक्त काव्य का भी निर्माण किया है, तथापि उसका हृदय किशोरों के मनोरंजन के लिए ही अधिक उन्मुख है। उसे प्रकृति की ओर से बालसुलभ हृदय उपहार में मिला है, तभी वह तथ्यों को सरल और सरस बनाने की कला में निपुण है।” बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तकों में चंदामामा, चित्रों में लोरियाँ, ओनामासी, रामकथा, जादू की वंशी, सोने का झरना, काग़ज़ की नाव, बाल गोपाल, हीरा-मोती, कथामाला, क़लम और बंदूक, जगमग आदि प्रमुख हैं।
कहते हैं कि एक रचनाकार अपनी रचनाओं में ज़िंदा रहता है। लेकिन उनके क़रीबी और ग्रामीण श्री जीवछ प्रसाद सिंह का कहना है, “आरसी बाबू की जितनी रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रकाशित हैं।” पता नहीं कारण क्या है? कहा तो यह भी जाता है कि पांच दर्जन से अधिक पांडुलिपियां अब भी अप्रकाशित हैं। बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग ने उनकी पांडुलिपियां जमा करवाईं, जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकीं। आरसी के प्रकाशित कविता संग्रह हैं : आजकल, कलापी, संचयिता, आरसी, जीवन और यौवन, नई दिशा, पांचजन्य, आरण्यक, द्वन्द्व समास, युद्ध अवश्यंभावी है, मैं किस देश में हूँ, चाणक्य शिखा, बदल रही है हवा, आस्था का अग्निकुण्ड, भारत सावित्री और पाती राम के नाम। गीतों का एकमात्र संकलन है ‘प्रेम गीत’। नंददास, संजीवनी, कुँवर सिंह, रजनीगंधा और पूर्णोदय इनके लिखे प्रबंध काव्य हैं। पंचपल्ल्व, खोटा सिक्का, काल-रात्रि, एक प्याला चाय, आँधी के पत्ते, वे तुतलाते थे और ठंडी छाया कहानी संग्रह हैं। इसके अलावा, मैथिली कविता संग्रह के नाम हैं : माटिक दीप, पूजाक फूल, मेघदूत, और सूर्यमुखी।
‘आरसी और उनके साहित्य’ पर समग्र विचार करना अब भी शेष है। मेरी दृष्टि में आरसी ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। बागमती नदी के किनारे बसे गाँव एरौत की पावन धरती पर 19 अगस्त 1911 को जन्मे आरसी प्रसाद सिंह 15 नवम्बर 1996 को दुनिया से चले गए। उनकी सुलगती हुई साँसें अपने आप में सिमट कर बुझ गईं और चाहने वालों के ज़ेहन में कतराती हुई कतरनें फूटती रहीं। जब भी मुझे आरसी का ख़याल उभरता है, मेरी आँखों का कुँवारापन टूट जाता है और नींदें धज्जी-धज्जी हो जाती हैं।

Sunday, August 19, 2012

आरसी प्रसाद सिंह की 101 वीं जन्मतिथि !

आरसी प्रसाद सिंह
आज हिन्दी और मैथिली भाषा के प्रमुख हस्ताक्षर आरसी प्रसाद सिंह की 101 वीं जन्मतिथि है। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि, कथाकार और एकांकीकार आरसी बाबू (19 अगस्त 1911 - 15 नवम्बर 1996) ने कविता, कहानी, एकांकी, संस्मरण, समीक्षा के साथ-साथ बाल साहित्य भी खूब लिखा। इस पावन अवसर पर हम उनको श्रद्धा के फूल समर्पित करते हैं। प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
नई दिशा
तुम मेरी मस्ती को देखो!
इतनी मस्ती
, इतनी मस्ती
मैं बहका-बहका जाता हूँ।
कुछ का कुछ हूँ सुन लेता मैं
कुछ का कुछ कह जाता हूँ।
जब आती है मौज
, किसी की
मैं तस्वीर सजा लेता हूँ।
जब उमंग उठती है
अपनी ही ज़ंजीर बजा लेता हूँ।   
वर्षा गीत
वर्षा की रिमझिम में मेरी सुध आए, तो
बूंदों की सरगम पर कोई धुन गा लेना।
डोले जब पुरवैया मानस के मधुवन में,
बोले जब भौरों की पग-पायल आंगन में
,
यमुना की धरा में नैया बह जाए तो
लहरों की वंशी से मन को बहला लेना।
संझवाती-बेला में नैना जब आयें भर,
सपनों के दीपक से जगमग हो जाए घर
,
बादल के घूँघट में चंदा शरमाए
, तो
पलकों की छांहों में पलभर बिरमा लेना।
गीतों के पनघट पर आंचल जब लहराए,
प्राणों का पंछी परदेसी जब अकुलाए
,
नयनों के काजल में बदरा गदराए
, तो
दर्पण को आगे कर क्षण भर मुसका लेना।
नागिन-सी लटकी लट बांहों पर उलझी हो,
आशा की भाषा कुछ बिखरी
, कुछ सुलझी हो,
हाथों में मेंहदी की लाली ललचाए
, तो
माथे की बिंदिया को चुपके से समझा देना।
उंगली की पोरों पर गिनते जो दिन बीते,
आँखों की खिड़की से झाँके जो मनचीते
,
मंदिर में पफूलों की माला मुरझाए
, तो
पूजा का कोई स्वर मन में दुहरा लेना।
वर्षा की रिमझिम में मेरी सुध आए, तो
बूंदों की सरगम पर कोई धुन गा लेना।
आस्था का अग्नि-कुण्ड पुस्तक से
1.
बढ़ाया किसी ने अगर हाथ, तो फिर,
उसे थाम लेना बुरा तो नहीं है!
दिया मौसमी धड़कनों ने निमंत्रण,
पकड़ जाम लेना बुरा तो नहीं है!
ख़बर क्या? किसी साँस की ख़ुशबुओं से,
तुम्हें पी गया, बेख़बर हो गए हैं।
मुखरता नहीं कुछ स्वयं शब्द में है ;
तुम्हें पा गया तो मुखर हो गए हैं।
2.
गगन पर गगन एक उठता गया है।
कि प्रतिक्षण जगत एक बनता गया है।
अगर मुक्ति मिल ही गई शोक-दुख से
,
रहा क्या किसी का मधुर प्रेम-बंधन
? 
सुलझ ही गई यदि समस्या जगत की,
कहाँ तो रहा विश्व? संसार? जीवन?
3.
ओ पराजित वीर तूने फेंक दी तलवार क्या?
और फिर अपना परभव कर लिया स्वीकार क्या
?
जब कहीं टकरा गई तलवार से तलवार है
एक टूटी एक पहुंची मर्म के उस पार है
जब कहीं दो सिंह मिलते
, गूँजती हुंकार है
एक पाता विजयश्री
, एक जाता हार है
और उस दिन हार ही यदि तू गया तो क्या हुआ
मर्म का अपमान कर शर छू गया तो क्या हुआ
रुक सकी है लक्ष्य तक पहुंचे बिना जल ज्वार क्या
ओ पराजित वीर तूने फेंक दी तलवार क्या
?
 ‘चाणक्य शिखा पुस्तक से
1.
हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई, सुनने में अति प्यारा है
किंतु, जहाँ व्यवहार पक्ष है, एक व्यर्थ का नारा है
2.
यह मेरा दीवानापन है या तुम्हारी नसमझी?
कौन गाँठ खोलेगा इसकी? सभी समस्याएँ हैं उलझी।
जहाँ कुएँ में भंग पड़ी, है वहाँ होश वाला पागल।
लाखों गीदड़ मिलकर लेंगे एक सिंह का भी क्या बल।
3.
भारत तो स्वाधीन हुआ, पर केवल कुछ कहलाने को।
अज़ादी की और लड़ाई और अभी है आने को।
सच पूछो तो अंग्रेज़ों ने भारत को चलते-चलते।
राज दिया अपने ही दत्तक पुत्रों को पलते-पलते।
4.
नाल ठुकाकर सरपट दौड़ा सड़कों पर ज्यों ही घोड़ा,
मेढक बोला जल से, मुझको नाल ठोक दो तुम थोड़ा।
यही हाल है भारत का भी प्रजातंत्र की घाटी में
खड़ा हुआ सहसा आ उन्नत देशों की परिपाटी में।
5.
आज अहिंसा बलहीनों के कायरपन की ढाल हुई।
सिर देने की नहीं
, बचाने की बचकानी चाल हुई।
जैन-बौद्ध की वणिक-वृत्ति, यह वैदिक क्षत्रिय धर्म नहीं।
शुद्ध सनातन संस्कृति धारा में हिंसा अपकर्म नहीं।
6.
मन में कोई बात छिपाए, मुह से कोई और कहे।
राजनीति में यही दुरंगी चाल महान सफलता है।
पर, साहित्य-जगत में दिल की बात उमड़ती बाहर में।
राजनीति का कूट नहीं साहित्य-जगत में चलता है।
7.
समता, सुख, संतुलन छीन कर भ्रष्ट व्यवस्था ढोते हैं।
वे सामाजिक न्याय दिलाने वाले कैसे होते हैं?
इसका एक तमाशा देखो राज्य-सभा के सदनों में।
कैसी भद्दी उठा-पटक होती है गद्दी लदनों में।
शर्म-हया से शर्म-हया की गर्दन भी झुक जाती है?
और उन्हीं की चाल देश की क्या संस्कृति कहलाती है।
हड्डी के टुकड़े पर लड़ते पशु की याद दिलाते हैं।
ख़ून नहीं करते, तो पैने क्यों नाखून बढ़ाते हैं?
आज भेड़िया आया? दौड़ो स्वयं भेड़िया ही कहता।
भौंचक-सा भेड़ों की टोली में गड़ेरिया भी रहता।
भारतीय संस्कृति के ये ही ठेकेदार कहाते हैं।
कुर्सी-मेज तोड़ते
, लाठी घूसा लात चलाते हैं।
शांति मंत्र का जाप सही जनता दल को सिखलाते हैं।
जिन्हें शांति के दो अक्षर भी नहीं समझ में आते हैं।
जीवन
चलता है, तो चल आँधी-सा ; बढता जा आगे तू!
जलना है, तो जल फूसों-सा ; जीवन में करता धू-धू!
क्षणभर ही आँधी रहती है ; आग फूस की भी क्षणभर!
किन्तु उसी क्षण में हो जाता जीवन-मय भू से अम्बर!
मलयानिल-सा मंद-मंद मृदु चलना भी क्या चलना है?
ओदी लकड़ी-सा तिल-तिल कर जलना भी क्या जलना है?
नए जीवन का गीत
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
चकाचौंध से भरी चमक का जादू तड़ित-समान दे दिया।
मेरे नयन सहेंगे कैसे यह अमिताभा, ऐसी ज्वाला?
मरुमाया की यह मरीचिका? तुहिनपर्व की यह वरमाला?
हुई यामिनी शेष न मधु की, तूने नया विहान दे दिया।
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
अपने मन के दर्पण में मैं किस सुन्दर का रूप निहारूँ?
नव-नव गीतों की यह रचना किसके इंगित पर बलिहारूँ
?
मानस का मोती लेगी वह कौन अगोचर राजमराली
?
किस वनमाली के चरणों में अर्पित होगी पूजा-थाली
?
एक पुष्प के लोभी मधुकर को वसन्त-उद्यान दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी
, तूने तो दिनमान दे दिया।
मलयानिल होता, तो मेरे प्राण सुमन-से फूले होते।
पल्लव-पल्लव की डालों पर हौले-हौले झूले होते।
एक चाँद होता, तो सारी रात चकोर बना रह जाता।
किन्तु, निबाहे कैसे कोई लाख-लाख तारों से नाता?
लघु प्रतिमा के एक पुजारी को अतुलित पाषाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
ओ अनन्त करुणा के सागर, ओ निर्बन्ध मुक्ति के दानी।
तेरी अपराजिता शक्ति का हो न सकूँगा मैं अभिमानी।
कैसे घट में सिन्धु समाए
? कैसे रज से मिले धराधर।
एक बूँद के प्यासे चातक के अधरों पर उमड़ा सागर।
देवालय की ज्योति बनाकर दीपक को निर्वाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी
, तूने तो दिनमान दे दिया।
मुँहमांगा वर देकर तूने मेरा मंगल चाहा होगा।
शायद मैंने भी याचक बन अपना भाग्य सराहा होगा।
इसीलिए, तूने गुलाब को क्या काँटों की सेज सुलाया?
रत्नाकर के अन्तस्तल में दारुण बड़वानल सुलगाया?
अपनी अन्ध वन्दना को क्यों मेरा मर्मस्थान दे दिया?
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

Saturday, December 03, 2011

जब पानी सर से बहता है

आरसी प्रसाद सिंह
छायावाद के तृतीय उत्थान के कवियों में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आरसी प्रसाद सिंह को 'जीवन और यौवन' का कवि कहा जाता है। आज पेश है उनकी दो कविताएँ : बीइंग पोएट 

जब पानी सर से बहता है

तब कौन मौन हो रहता है? 
जब पानी सर से बहता है।

चुप रहना नहीं सुहाता है, 
कुछ कहना ही पड़ जाता है।

व्यंग्यों के चुभते बाणों को 
कब तक कोई भी सहता है? 
जब पानी सर से बहता है।

अपना हम जिन्हें समझते हैं। 
जब वही मदांध उलझते हैं,

फिर तो कहना पड़ जाता ही, 
जो बात नहीं यों कहता है।
जब पानी सर से बहता है।

दुख कौन हमारा बाँटेगा 
हर कोई उल्टे डाँटेगा।

अनचाहा संग निभाने में 
किसका न मनोरथ ढहता है?
जब पानी सर से बहता है। 

निर्वचन

चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।
अब न झंझावात है वह अब न वह विद्रोह मेरा।

भूल जाने दो उन्हें, जो भूल जाते हैं किसी को।
भूलने वाले भला कब याद आते हैं किसी को?
टूटते हैं स्वप्न सारे, जा रहा व्यामोह मेरा।
चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।

ग्रीष्म के संताप में जो प्राण झुलसे लू-लपट से,
बाण जो चुभते हृदय में थे किसी के छल-कपट से!
अब उन्हीं चिनगारियों पर बादलों ने राग छेड़ा।
चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।

जो धधकती थी किसी दिन, शांत वह ज्वालामुखी है।
प्रेम का पीयूष पी कर हो गया जीवन सुखी है।
कालिमा बदली किरण में ; गत निशा, आया सवेरा।
चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।