Sunday, August 19, 2012

आरसी प्रसाद सिंह की 101 वीं जन्मतिथि !

आरसी प्रसाद सिंह
आज हिन्दी और मैथिली भाषा के प्रमुख हस्ताक्षर आरसी प्रसाद सिंह की 101 वीं जन्मतिथि है। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि, कथाकार और एकांकीकार आरसी बाबू (19 अगस्त 1911 - 15 नवम्बर 1996) ने कविता, कहानी, एकांकी, संस्मरण, समीक्षा के साथ-साथ बाल साहित्य भी खूब लिखा। इस पावन अवसर पर हम उनको श्रद्धा के फूल समर्पित करते हैं। प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
नई दिशा
तुम मेरी मस्ती को देखो!
इतनी मस्ती
, इतनी मस्ती
मैं बहका-बहका जाता हूँ।
कुछ का कुछ हूँ सुन लेता मैं
कुछ का कुछ कह जाता हूँ।
जब आती है मौज
, किसी की
मैं तस्वीर सजा लेता हूँ।
जब उमंग उठती है
अपनी ही ज़ंजीर बजा लेता हूँ।   
वर्षा गीत
वर्षा की रिमझिम में मेरी सुध आए, तो
बूंदों की सरगम पर कोई धुन गा लेना।
डोले जब पुरवैया मानस के मधुवन में,
बोले जब भौरों की पग-पायल आंगन में
,
यमुना की धरा में नैया बह जाए तो
लहरों की वंशी से मन को बहला लेना।
संझवाती-बेला में नैना जब आयें भर,
सपनों के दीपक से जगमग हो जाए घर
,
बादल के घूँघट में चंदा शरमाए
, तो
पलकों की छांहों में पलभर बिरमा लेना।
गीतों के पनघट पर आंचल जब लहराए,
प्राणों का पंछी परदेसी जब अकुलाए
,
नयनों के काजल में बदरा गदराए
, तो
दर्पण को आगे कर क्षण भर मुसका लेना।
नागिन-सी लटकी लट बांहों पर उलझी हो,
आशा की भाषा कुछ बिखरी
, कुछ सुलझी हो,
हाथों में मेंहदी की लाली ललचाए
, तो
माथे की बिंदिया को चुपके से समझा देना।
उंगली की पोरों पर गिनते जो दिन बीते,
आँखों की खिड़की से झाँके जो मनचीते
,
मंदिर में पफूलों की माला मुरझाए
, तो
पूजा का कोई स्वर मन में दुहरा लेना।
वर्षा की रिमझिम में मेरी सुध आए, तो
बूंदों की सरगम पर कोई धुन गा लेना।
आस्था का अग्नि-कुण्ड पुस्तक से
1.
बढ़ाया किसी ने अगर हाथ, तो फिर,
उसे थाम लेना बुरा तो नहीं है!
दिया मौसमी धड़कनों ने निमंत्रण,
पकड़ जाम लेना बुरा तो नहीं है!
ख़बर क्या? किसी साँस की ख़ुशबुओं से,
तुम्हें पी गया, बेख़बर हो गए हैं।
मुखरता नहीं कुछ स्वयं शब्द में है ;
तुम्हें पा गया तो मुखर हो गए हैं।
2.
गगन पर गगन एक उठता गया है।
कि प्रतिक्षण जगत एक बनता गया है।
अगर मुक्ति मिल ही गई शोक-दुख से
,
रहा क्या किसी का मधुर प्रेम-बंधन
? 
सुलझ ही गई यदि समस्या जगत की,
कहाँ तो रहा विश्व? संसार? जीवन?
3.
ओ पराजित वीर तूने फेंक दी तलवार क्या?
और फिर अपना परभव कर लिया स्वीकार क्या
?
जब कहीं टकरा गई तलवार से तलवार है
एक टूटी एक पहुंची मर्म के उस पार है
जब कहीं दो सिंह मिलते
, गूँजती हुंकार है
एक पाता विजयश्री
, एक जाता हार है
और उस दिन हार ही यदि तू गया तो क्या हुआ
मर्म का अपमान कर शर छू गया तो क्या हुआ
रुक सकी है लक्ष्य तक पहुंचे बिना जल ज्वार क्या
ओ पराजित वीर तूने फेंक दी तलवार क्या
?
 ‘चाणक्य शिखा पुस्तक से
1.
हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई, सुनने में अति प्यारा है
किंतु, जहाँ व्यवहार पक्ष है, एक व्यर्थ का नारा है
2.
यह मेरा दीवानापन है या तुम्हारी नसमझी?
कौन गाँठ खोलेगा इसकी? सभी समस्याएँ हैं उलझी।
जहाँ कुएँ में भंग पड़ी, है वहाँ होश वाला पागल।
लाखों गीदड़ मिलकर लेंगे एक सिंह का भी क्या बल।
3.
भारत तो स्वाधीन हुआ, पर केवल कुछ कहलाने को।
अज़ादी की और लड़ाई और अभी है आने को।
सच पूछो तो अंग्रेज़ों ने भारत को चलते-चलते।
राज दिया अपने ही दत्तक पुत्रों को पलते-पलते।
4.
नाल ठुकाकर सरपट दौड़ा सड़कों पर ज्यों ही घोड़ा,
मेढक बोला जल से, मुझको नाल ठोक दो तुम थोड़ा।
यही हाल है भारत का भी प्रजातंत्र की घाटी में
खड़ा हुआ सहसा आ उन्नत देशों की परिपाटी में।
5.
आज अहिंसा बलहीनों के कायरपन की ढाल हुई।
सिर देने की नहीं
, बचाने की बचकानी चाल हुई।
जैन-बौद्ध की वणिक-वृत्ति, यह वैदिक क्षत्रिय धर्म नहीं।
शुद्ध सनातन संस्कृति धारा में हिंसा अपकर्म नहीं।
6.
मन में कोई बात छिपाए, मुह से कोई और कहे।
राजनीति में यही दुरंगी चाल महान सफलता है।
पर, साहित्य-जगत में दिल की बात उमड़ती बाहर में।
राजनीति का कूट नहीं साहित्य-जगत में चलता है।
7.
समता, सुख, संतुलन छीन कर भ्रष्ट व्यवस्था ढोते हैं।
वे सामाजिक न्याय दिलाने वाले कैसे होते हैं?
इसका एक तमाशा देखो राज्य-सभा के सदनों में।
कैसी भद्दी उठा-पटक होती है गद्दी लदनों में।
शर्म-हया से शर्म-हया की गर्दन भी झुक जाती है?
और उन्हीं की चाल देश की क्या संस्कृति कहलाती है।
हड्डी के टुकड़े पर लड़ते पशु की याद दिलाते हैं।
ख़ून नहीं करते, तो पैने क्यों नाखून बढ़ाते हैं?
आज भेड़िया आया? दौड़ो स्वयं भेड़िया ही कहता।
भौंचक-सा भेड़ों की टोली में गड़ेरिया भी रहता।
भारतीय संस्कृति के ये ही ठेकेदार कहाते हैं।
कुर्सी-मेज तोड़ते
, लाठी घूसा लात चलाते हैं।
शांति मंत्र का जाप सही जनता दल को सिखलाते हैं।
जिन्हें शांति के दो अक्षर भी नहीं समझ में आते हैं।
जीवन
चलता है, तो चल आँधी-सा ; बढता जा आगे तू!
जलना है, तो जल फूसों-सा ; जीवन में करता धू-धू!
क्षणभर ही आँधी रहती है ; आग फूस की भी क्षणभर!
किन्तु उसी क्षण में हो जाता जीवन-मय भू से अम्बर!
मलयानिल-सा मंद-मंद मृदु चलना भी क्या चलना है?
ओदी लकड़ी-सा तिल-तिल कर जलना भी क्या जलना है?
नए जीवन का गीत
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
चकाचौंध से भरी चमक का जादू तड़ित-समान दे दिया।
मेरे नयन सहेंगे कैसे यह अमिताभा, ऐसी ज्वाला?
मरुमाया की यह मरीचिका? तुहिनपर्व की यह वरमाला?
हुई यामिनी शेष न मधु की, तूने नया विहान दे दिया।
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
अपने मन के दर्पण में मैं किस सुन्दर का रूप निहारूँ?
नव-नव गीतों की यह रचना किसके इंगित पर बलिहारूँ
?
मानस का मोती लेगी वह कौन अगोचर राजमराली
?
किस वनमाली के चरणों में अर्पित होगी पूजा-थाली
?
एक पुष्प के लोभी मधुकर को वसन्त-उद्यान दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी
, तूने तो दिनमान दे दिया।
मलयानिल होता, तो मेरे प्राण सुमन-से फूले होते।
पल्लव-पल्लव की डालों पर हौले-हौले झूले होते।
एक चाँद होता, तो सारी रात चकोर बना रह जाता।
किन्तु, निबाहे कैसे कोई लाख-लाख तारों से नाता?
लघु प्रतिमा के एक पुजारी को अतुलित पाषाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
ओ अनन्त करुणा के सागर, ओ निर्बन्ध मुक्ति के दानी।
तेरी अपराजिता शक्ति का हो न सकूँगा मैं अभिमानी।
कैसे घट में सिन्धु समाए
? कैसे रज से मिले धराधर।
एक बूँद के प्यासे चातक के अधरों पर उमड़ा सागर।
देवालय की ज्योति बनाकर दीपक को निर्वाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी
, तूने तो दिनमान दे दिया।
मुँहमांगा वर देकर तूने मेरा मंगल चाहा होगा।
शायद मैंने भी याचक बन अपना भाग्य सराहा होगा।
इसीलिए, तूने गुलाब को क्या काँटों की सेज सुलाया?
रत्नाकर के अन्तस्तल में दारुण बड़वानल सुलगाया?
अपनी अन्ध वन्दना को क्यों मेरा मर्मस्थान दे दिया?
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।