Monday, August 20, 2012

कवि त्रिलोचन की जन्मतिथि !

त्रिलोचन
आज हिंदी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख कवि त्रिलोचन (20 अगस्त 1917 - 09 दिसंबर 2007) की जन्मतिथि है। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
एक लहर फैली अनन्त की
सीधी है भाषा बसन्त की
कभी आँख ने समझी
कभी कान ने पाई
कभी रोम-रोम से
प्राणों में भर आई
और है कहानी दिगन्त की
नीले आकाश में
नई ज्योति छा गई
कब से प्रतीक्षा थी
वही बात आ गई
एक लहर फैली अनन्त की।
लहरों में साथ रहे कोई
बाँह गहे कोई
अपरिचय के
सागर में
दृष्टि को पकड़ कर
कुछ बात कहे कोई।
लहरें ये
लहरें वे
इनमें ठहराव कहाँ
पल
दो पल
लहरों के साथ रहे कोई।
त्रिलोचन चलता रहा
मंडी हाउस पर नोएडा जाने वाली चार्टर्ड बस में त्रिलोचन
त्रिलोचन को देखा
पकी दाढ़ी
गहरी आंखें
चेहरे पर ताप
हाथ में झोला
चुपचाप खड़े थे बस के दरवाजे पर
ऐ ताऊ
पैसे दे
ऐ ताऊ
पीछे बढ़ जा
, सीट है बैठ जा
जैसे प्रगतिशील कवियों की ऩई लिस्ट निकली थी
और उसमें त्रिलोचन का नाम नहीं था
उसी तरह इस कंडक्टर की बस में
उनकी सीट नहीं थी
सफर कटता रहा
त्रिलोचन चलता रहा
संघर्ष के तमाम निशान
अपनी बांहों में समेटे
बिना बैठे
त्रिलोचन चलता रहा
दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें
दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें
चारों ओर खड़ी हैं। तुम चुपचार खड़े हो
हाथ धरे छाती पर, मानो वहीं गड़े हो।
मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्‍के मारें
और ढ़हा दें। उद्यम करते कभी न हारें
ऐसे वैसे आघातों से। स्‍तब्‍ध पड़े हो
किस दुविधा में। हिचक छोड़ दो। जरा कड़े हो।
आओ, अलगाने वाले अवरोध निवारें।
बहार सारा विश्‍व खुला है, वह अगवानी
करने को तैयार खड़ा है पर यह कारा
तुमको रोक रही है। क्‍या तुम रूक जाओगे।
नहीं करोगे ऊंची क्‍या गरदन अभिमानी।
बांधोगे गंगोत्री में गंगा की धारा।
क्‍या इन दीवारों के आगे झुक जाओगे।
उनका हो जाता हूँ
चोट जभी लगती है
तभी हँस देता हूँ
देखने वालों की आँखें
उस हालत में
देखा ही करती हैं
आँसू नहीं लाती हैं
और 
जब पीड़ा बढ़ जाती है
बेहिसाब
तब
जाने-अनजाने लोगों में
जाता हूँ
उनका हो जाता हूँ
हँसता हँसाता हूँ
अगर चांद मर जाता
अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?
खोजते सौन्दर्य नया?
देखते क्या दुनिया को?
रहते क्या, रहते हैं
जैसे मनुष्य सब?
क्या करते कविगण तब?
प्रेमियों का नया मान
उनका तन-मन होता
अथवा टकराते रहते वे सदा
चाँद से, तारों से, चातक से, चकोर से
कमल से, सागर से, सरिता से
सबसे
क्या करते कविगण तब?
आँसुओं में बूड़-बूड़
साँसों में उड़-उड़कर
मनमानी कर- धर के
क्या करते कविगण तब
अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?
आछी के फूल
मग्घू चुपचाप सगरा के तीर
बैठा था बैलों की सानी पानी कर
चुका था मैंने बैठा देखकर
पूछा, बैठे हो, काम कौन करेगा
मग्घू ने कहा, काम कर चुका हूं
नहीं तो यहां बैठता कैसे,
मग्घू ने मुझसे कहा,
लंबी लंबी सांस लो,
सांस ले ले कर मैंने कहा,सांस भी
ले ली,
बात क्या है,
आछी में फूल आ रहे हैं, मग्घू ने कहा, अब
ध्यान दो,सांस लो,
कैसी महक है
मग्घू से मैंने कहा,बड़ी प्यारी मंहक है
मग्घू ने पूछा ,पेड़ मैं दिखा दूंगा,फूल भी
दिखा दूंगा.आछी के पेड़ पर जच्छ रहा करते हैं
जो इसके पास रात होने पर जाता है,उसको
लग जाते हैं,सताते हैं,वह किसी काम का
नहीं रहता
इसीलिये इससे बचने के लिये हमलोग
इससे दूर दूर रहते हैं