Saturday, January 07, 2012

इंडिया गेट पर रोमांस !

इंडिया गेट पर कई प्रेमी युगल एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले यही दुआ माँग रहे हैं...ये धुआं धुआं-सा रहने दो हल्की बरसात में शीशे जैसी बूँद और धूँध जैसे रूहों में एक नई आंच फूंक रही हो इस आंच पर आँख पिघलती है और कई खूबसूरत मंज़र उभरने लगते हैं दिल्ली में एक ओर जहाँ कोहरे की वजह से कई दिक्क्तें पैदा होती हैं, वहीं दूसरी ओर कई प्रेमी युगलों की यह तमन्ना है कि धुंध की चादर में खुद को लपेट लें और कहीं खो जाएँ। दरअसल, इस तमन्ना की सारी वजह है 'प्रेम'  प्रेम, जिसे सबलोग अपनी तरह से परिभाषित करते हैं मगर सच तो यह है कि प्रेम किसी परिभाषा के दायरे में नहीं रह सकता है। इसकी कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। इसके विषय में कुछ कहना बहुत मुश्किल है। दरअसल, इसे जीया जा सकता हैकहा नहीं जा सकता। ठीक वैसे हीजैसे आकाश में उड़ती हुई किसी चिड़िया से पूछा जाए कि आकाश क्या हैतो वह कहेगी - ये जो मेरे चारों है वही आकाश है। ठीक उसी वक़्त यदि उससे आकाश की परिभाषा पूछा जाए तो वह मुश्किल में पड़ सकती है। प्रेम एक ऐसा शब्द हैजो हमारी सोच की सतह पर अलग-अलग मानी के साथउम्र की मुख्तलिफ परतों में जमता है। पिघलता हैनिखरता है और सबके दिल में आकार लेता है  प्रेम तो मनुष्य का स्वाभाव होता है। यह हमारा गुण नहीं। यदि हम यह सोचें कि हम दुखी हैं या सुखी तो पक्का हम अपने जीवन में दुःख भर लेंगे। हमें सिर्फ जीना है, अपना काम करना है। सुख और दुःख दोनों को अपनाने की ज़रुरत है। ज़रा-सा दूर रहकर देखना है। दोनों आते हैं और चले जाते हैं। ये दोनों एक सिक्का के दो पहलू की तरह हैं। जहाँ भी होंगे... दोनों मौजूद होंगे।  इसे अलग नहीं किया जा सकता।  जब हम यह सोचना बंद कर देंगे कि हम सुखी हैं या दुखी, तभी एक नई क्रांति हमारे जीवन में घटित हो जाएगी सारा जीवन आनंद से भर जाएगा हम प्रेममय हो जाएँगे हम प्रेम हो जायेंगे तो क्यूँ न परमात्मा को शुक्रिया कहते हुए, इस कोहरे को एक मौक़ा की तरह इसेमाल करें। इंडिया गेट पर रोमांस की दुआ माँगे।