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| राजकमल चौधरी |
आज राजकमल चौधरी की जन्मतिथि है। राजकमल मैथिली, हिंदी और बंगला के प्रसिद्ध कवि, कथाकार,
उपन्यासकार, आलोचक और विचारक थे। बिहार के
सहरसा जिला के महिषी गाँव (जहाँ आठवीं सदी में महान दार्शनिक मंडन मिश्र पैदा हुए) में
इनका जन्म 13 दिसम्बर 1929 में हुआ और 19 जून 1967 तक हमारे बीच रह कर निरंतर
साहित्य सृजन करते रहे। आज, उनकी जन्मतिथि पर प्रस्तुत है उनकी मैथिली
कविताओं का हिंदी अनुवाद : बीइंग पोएट
अथतंत्र का चक्रव्यूह
सब पुरूष शिखण्डी
सब स्त्री रास की राधा
सब के मन में धनुष तान कर बैठा
रक्त का प्यासा व्याधा
कहाँ जाऊँ ? क्या करूँ ?
रावण बन कर किसकी सीता को हरूँ ?
सब पुरूष शिखण्डी
सब के मन में धनुष तान कर बैठा
रक्त का प्यासा व्याधा
कहाँ जाऊँ ? क्या करूँ ?
रावण बन कर किसकी सीता को हरूँ ?
सब पुरूष शिखण्डी
सब स्त्री रास की विकल राधा
कहाँ जाऊँ ? क्या करूँ ?
चक्रव्यूह में किसी का भरोसा नहीं करिये
रे अभिमन्यु-मन,
छोड़ देश यह चलो वन
सब पुरूष शिखण्डी
कहाँ जाऊँ ? क्या करूँ ?
चक्रव्यूह में किसी का भरोसा नहीं करिये
रे अभिमन्यु-मन,
छोड़ देश यह चलो वन
सब पुरूष शिखण्डी
सब स्त्री रास की राधा
सब के मन में धनुष तान कर बैठा
रक्त का प्यासा व्याधा
पति-पत्नी कथा
सब के मन में धनुष तान कर बैठा
रक्त का प्यासा व्याधा
पति-पत्नी कथा
स्त्री अपने सखा-संतान, भानस-वासन
सुख, ईच्छा,
पीठ का हरा-पीला दर्द और उधार-लहना की
कथा
कहती है,
कहती रह जाती है सुबह से साँझ तक
बाड़ी के कोना से
आँगन के माँझ तक
कहती रह जाती है सुबह से साँझ तक
पुरूष,
पीठ का हरा-पीला दर्द और उधार-लहना की
कथा
कहती है,
कहती रह जाती है सुबह से साँझ तक
बाड़ी के कोना से
आँगन के माँझ तक
कहती रह जाती है सुबह से साँझ तक
पुरूष,
उस स्त्री और उस स्त्री के सखा-संतान
भानस-वासन, सुख, ईच्छा, पीठ का
हरा-पीला दर्द और उधार-लहना की
कथा
सुनता है
सुनता रह जाता है साँझ से सुबह तक
होंठों के मंद-मंद मुस्कान से
आँख के आँसू तक
सुनता रह जाता है सुबह तक
(अनुवाद : त्रिपुरारि कुमार शर्मा)
भानस-वासन, सुख, ईच्छा, पीठ का
हरा-पीला दर्द और उधार-लहना की
कथा
सुनता है
सुनता रह जाता है साँझ से सुबह तक
होंठों के मंद-मंद मुस्कान से
आँख के आँसू तक
सुनता रह जाता है सुबह तक
(अनुवाद : त्रिपुरारि कुमार शर्मा)

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