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| विपिन चौधरी |
1.
बारिश,
का स्वाद
सबसे पहले मिट्टी ही चखती है
ऊन,
अपने जिस्म पर सालईयों की छूअन से जागती है
आत्मा की त्वचा पर
पहले प्रेम के दाग़ छूटाए नहीं छूटते
शुरुआत सदा शुरुआत जैसी ही रहती है
खामोश और गुनगुनी
का स्वाद
सबसे पहले मिट्टी ही चखती है
ऊन,
अपने जिस्म पर सालईयों की छूअन से जागती है
आत्मा की त्वचा पर
पहले प्रेम के दाग़ छूटाए नहीं छूटते
शुरुआत सदा शुरुआत जैसी ही रहती है
खामोश और गुनगुनी
2.
समय रहते
एक-एक अस्थियाँ शिथिल हो मृत्यु की तरफ सरकती जाती हैं
मुझे भी समय रहते
जीवन जीने के बहानों की निशानदेही कर ही लेनी चहिए
एक-एक अस्थियाँ शिथिल हो मृत्यु की तरफ सरकती जाती हैं
मुझे भी समय रहते
जीवन जीने के बहानों की निशानदेही कर ही लेनी चहिए
3.
पतझड़ के झरते पत्तों की
मानिंद
मन के भीतर यादों की कोशिकाएँ रोज़ झरती हैं
दुनिया की दिशा में जाने वाली गली की राह
इन्हीं पहाड़ों की चोटी पर से उतरने-चढ़ने पर ही
खुलती है!
मन के भीतर यादों की कोशिकाएँ रोज़ झरती हैं
दुनिया की दिशा में जाने वाली गली की राह
इन्हीं पहाड़ों की चोटी पर से उतरने-चढ़ने पर ही
खुलती है!
4.
अपने आँगन में उतरती हुई
सांझ को झट से पहचान लेती है
मेरी उदासी
उसकी पहली पदचाप सुनते ही बालकनी में रखी
फोल्डिंग कुर्सी खुल जाती है
फिर सांझ वही चीज़े मांगती है
उसे जिसकी लत लग चुकी है
गर्म चाय,
पाँव टिकाने के लिए एक छोटा मेज
और पीछे मुड़ कर देखने के लिए पिछला जीवन
सांझ को झट से पहचान लेती है
मेरी उदासी
उसकी पहली पदचाप सुनते ही बालकनी में रखी
फोल्डिंग कुर्सी खुल जाती है
फिर सांझ वही चीज़े मांगती है
उसे जिसकी लत लग चुकी है
गर्म चाय,
पाँव टिकाने के लिए एक छोटा मेज
और पीछे मुड़ कर देखने के लिए पिछला जीवन
5.
मेजपोश पर चाय
जीवन का सबसे सुलझा हुआ सिद्धांत है
जिसे सबसे पहले कप से उठती हुई भाप ने पकड़ा
हम सबकी ओढी हुई दार्शनिकता को चाय
पहली चुस्की में ही समझ लेती है
उसके बाद चाय
हमको पीने लगती है
जैसे आप पहले अपनी पसंद को चुनते है
फिर उसका मोल चुकाने लगते हैं
जीवन का सबसे सुलझा हुआ सिद्धांत है
जिसे सबसे पहले कप से उठती हुई भाप ने पकड़ा
हम सबकी ओढी हुई दार्शनिकता को चाय
पहली चुस्की में ही समझ लेती है
उसके बाद चाय
हमको पीने लगती है
जैसे आप पहले अपनी पसंद को चुनते है
फिर उसका मोल चुकाने लगते हैं
6.
मैं तुम्हे प्रेम करता हूँ
देखो मैंने कह दिया इसे
अब मैं अच्छी नींद सोऊंगा
—लड़के ने कहा।
देखो मैंने कह दिया इसे
अब मैं अच्छी नींद सोऊंगा
—लड़के ने कहा।
लड़की ने सुना और दिल में
कई लहरों ने एक साथ अंगड़ाइयां ली
मन पहले से भी मुलायम हो गया मगर
अब मेरी जिन्दगी पहली-सी आसान नहीं रही
लड़की ने थोडा उदास होते हुए कहा!
मन पहले से भी मुलायम हो गया मगर
अब मेरी जिन्दगी पहली-सी आसान नहीं रही
लड़की ने थोडा उदास होते हुए कहा!
7.
मेरे मौन में तुम्हारी
आवाज़
एक लम्बी रस्सी के सहारे से उतरती है
मेरी आत्मा का मीठा जल ले कर लौट जाती है
तुम्हारे पास
जहां तुम अपने भरे-पूरे संसार में
गुम हो
तुम्हारे पास की गर्म ज़मीन पर इस जल से छिड़काव के बाद
वातावरण में नरमी उतर आती है
इधर मेरा मौन
फिर से अपनी ऊर्जा को समेटता है
तुम्हारी ही किसी ख़ुशी में खर्च होने के लिए
एक लम्बी रस्सी के सहारे से उतरती है
मेरी आत्मा का मीठा जल ले कर लौट जाती है
तुम्हारे पास
जहां तुम अपने भरे-पूरे संसार में
गुम हो
तुम्हारे पास की गर्म ज़मीन पर इस जल से छिड़काव के बाद
वातावरण में नरमी उतर आती है
इधर मेरा मौन
फिर से अपनी ऊर्जा को समेटता है
तुम्हारी ही किसी ख़ुशी में खर्च होने के लिए
8.
‘जैसे’
का अर्थ समझाओ
—लड़की ने कहा!
का अर्थ समझाओ
—लड़की ने कहा!
जैसे मेरा प्रेम,
ये दूर तक फैले पर्वत,
ये शतुरमुर्ग के गर्दन-सी ऊँची प्यास
—लड़के ने समझाया!
ये दूर तक फैले पर्वत,
ये शतुरमुर्ग के गर्दन-सी ऊँची प्यास
—लड़के ने समझाया!
प्यास,
जो किनारों पर ठहर जाती है
पर्वत,
जो अकड़ कर जीना सीख गए हैं
और प्रेम उसे ही कहते हैं न!
जिसमें तुम दुनियादारी में खो जाओगे और
मैं तुम्हारी बाट जोहती रह जाऊँगी
—लड़की का कहा।
इतना सच था कि उसका कोई तैयार जवाब नहीं था लड़के के पास!
जो किनारों पर ठहर जाती है
पर्वत,
जो अकड़ कर जीना सीख गए हैं
और प्रेम उसे ही कहते हैं न!
जिसमें तुम दुनियादारी में खो जाओगे और
मैं तुम्हारी बाट जोहती रह जाऊँगी
—लड़की का कहा।
इतना सच था कि उसका कोई तैयार जवाब नहीं था लड़के के पास!
9.
आईना हमारे जीवन में
इसीलिए नहीं था कि हम जवानी में हंसे
और बुढापे की झुरियों में छुप कर रोए
इसीलिए नहीं था कि हम जवानी में हंसे
और बुढापे की झुरियों में छुप कर रोए
इसलिए भी नहीं
हमारी कमीनीगीरों को छुपा
सफेदपोश बन कर
उसके सामने अपना लिपा पुता चेहरा ले कर आए
हमारी कमीनीगीरों को छुपा
सफेदपोश बन कर
उसके सामने अपना लिपा पुता चेहरा ले कर आए
आईना इसलिए था
कि जिसे हम कबूल ना करना चाहते हों
उसे जबरन कबूलवाएँ
कि जिसे हम कबूल ना करना चाहते हों
उसे जबरन कबूलवाएँ
अपनी इस आत्मस्वीकृत पहचान
के बाद
आईना हर रोज़ एक नया राज़ मेरे सामने रख रहा है
और मैं आजकल अपने लगातार छोटे हुए जा रहे क़द से
परेशान होती जा रही हूँ।
आईना हर रोज़ एक नया राज़ मेरे सामने रख रहा है
और मैं आजकल अपने लगातार छोटे हुए जा रहे क़द से
परेशान होती जा रही हूँ।
10.
बारिश से पहले
मुझे बादल बनना पड़ा
रोशनी से पहले
गति
जीवन से पहले
अणु
मुझे बादल बनना पड़ा
रोशनी से पहले
गति
जीवन से पहले
अणु
प्रेम से पहले लाज़िम था
मेरा मनुष्य होना
मेरा मनुष्य होना
मामला इस मोड़ पर आकर
मेरे हाथ से फिसल गया
मेरे हाथ से फिसल गया
आकाश के गर्भ से उत्पन्न
बूँद
धरती पर आ खिलखिलाई
धरती पर आ खिलखिलाई
एकदम ताज़ा टटकी बूँद की चमड़ी
परत-भर भी नहीं छिली
परत-भर भी नहीं छिली
इधर दुनिया की नदी पार
करते हुए
मनुष्यता की चमड़ी छिलती चली गई
मनुष्यता की चमड़ी छिलती चली गई
और मैं प्रेम के पहले
मनुष्य नहीं बन सकी
मनुष्य नहीं बन सकी

विपिन की कविताएं लगातार अधिक सघन होती गई हैं.... अपनी कविता में वे न खुद किसी उलझन में रहती हैं, न पाठक को उलझाती हैं- सीधी साफ़ कहन उनका अन्दाज़ है जबकि इधर उलझने और उलझाने को युवा कविता में फैशन की तरह अपनाया जा रहा है। भई मैं तो हमेशा इस्तक़बाल करता रहूंगा ऐसी कविताओं का।
ReplyDeleteek nayi urja se bhari kayitaye..aabhar
ReplyDeletebadhiya kavitaen...
ReplyDeleteअच्छी लगी ,.सुन्दर है शुक्रिया ।
ReplyDeleteबेहतरीन कविताएं , जन्मदिन की बधाई
ReplyDeleteहर रचना बेजोड …………शाश्वत प्रेम की प्यास का सच ………एक करवट बदलती सभ्यता का संवाद हो कोई जैसे ………विपिन जी को कई बार सुना है गहरी बातें कह जाती हैं गागर मे सागर भर कर ।
ReplyDeletemain pehli baar Vipin jee ki rachnaon se roobru huaa hoon,bahut hee damdaar rachnaen hain,badhai.
ReplyDeleteAapka kavitai andaj bhagaya hai. ....Behtreen Kavya - rachav ke liye hardik badhai..
ReplyDelete-Meethesh Nirmohi,Rajasthan.
बेहतरीन ,लाजवाब कवितायेँ विपिन जी
ReplyDeleteबेहतरीन ,लाजवाब कवितायेँ हैं विपिन जी
ReplyDeleteकविता अपने गंभीर विषय के साथ उपस्थित हैं |
ReplyDeletehttp://srishtiekkalpana.blogspot.in