हाल में वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह का नया कविता-संग्रह आया है—स्वप्न समय। इसकी समीक्षा की है कवि-लेखक-संपादक कुमार मुकुल ने। यह समीक्षा आगरा से प्रकाशित ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ में छपी है, वहीं से साभार।
गुस्ताव जैनुक की पुस्तक 'काफ्का के संस्मरण' में एक जगह काफ्का कहते हैं, 'सपने दूसरे किस्म का पलायन हैं, जिसके अंत में हमकें घूम-फिर कर अपने तात्कालिक सच में उतरना पड़ता है। स्टीवेंसन को अपने 'ट्रेजर आइलैंड' में और मुझे...
आगे जैनुक इसे पूरा करते हैं, 'आपको...यहां दफ्तर, या अल्साडेटर रिंग में स्थित मकान में'।
सविता सिंह के तीसरे कविता संकलन का नाम है 'स्वप्न समय'। क्या शीर्षक में समय के इस पलायनवादी स्वरूप की ओर इशारा करना चाहती हैं सविता। 'अप्रत्याशित' कविता में वे लिखती हैं–
'इस स्वप्न समय में
गिरती हैं कैसी वे इच्छाएं
अधूरी रहीं जो
वे नग्नताएं आत्मा की
तडपती रहीं जो वस्त्र के लिए
गिरती हैं कैसी वे इच्छाएं
अधूरी रहीं जो
वे नग्नताएं आत्मा की
तडपती रहीं जो वस्त्र के लिए
गिरती हैं कैसे वे मीनारें हीरों-मोतियों से जड़ीं...लगती थीं वे बनाई गई थीं अमर होने के लिए—
वे सच्चाईयां थी कितनी पस्त
किसी घायल पक्षी की तरह आ गिरती हैं
हमारे इस समय में...
किसी घायल पक्षी की तरह आ गिरती हैं
हमारे इस समय में...
एक काल-खण्ड सिमट रहा है
शुरू होने के लिए नये सिरे से
स्वप्न में देख रही हैं आंखें एक अप्रत्याशित दृश्य'।
शुरू होने के लिए नये सिरे से
स्वप्न में देख रही हैं आंखें एक अप्रत्याशित दृश्य'।
'इस स्वप्न समय में' सविता अपूर्ण इच्छाओं को गिरता देखती हैं तो हीरे-मोतियों जड़ी मीनारों को भी गिरता देखती हैं। यहां वे इस स्वप्न यानी पलायनवादी समय के यथार्थ को अगर गिरता-बिखरता देखती हैं, तो सिमटते काल-खण्ड के नये सिरे से शुरू होने का स्वप्न भी देखती हैं।
काफ्का लिखते हैं कि यथार्थ यथास्थिति को बदलता है और सविता का स्वप्न उसी बदलाव का स्वप्न है। एक तरह से कह सकते हैं कि भविष्य का नया यथार्थ इस पलायनवादी समय में सविता के स्वप्नों के माध्यम से अपनी जमीन पाना चाहता है, नये सिरे से शुरू होना चाहता है।
'स्वप्न' और 'रात' शब्द का प्रयोग सविता की कविताओं में बारहा होता है। ये दोनों ही शब्द स्त्री के पर्याय हैं सविता के लिए। एक जगह वे लिखती हैं –
'क्या स्त्री सचमुच रात है जैसा मैं जानती हूँ
या रात में स्वप्न है वह'।
उनके भीतर एक सवाल भी है–
या रात में स्वप्न है वह'।
उनके भीतर एक सवाल भी है–
'क्या स्वप्न और स्त्री एक ही हैं'।
सविता की कविताएँ रात और स्वप्न की इस धुरी के आस-पास घूमती रहती हैं। रात और उसका रहस्य स्त्री को अस्तित्ववान करते हैं। अपने अंधेरों में ही बचाकर विकसित करती हैं वे भविष्य के जीवन को, सुबहों को। इस रहस्य की रक्षा के लिए नींद जरूरी है। सविता सिंह के एक संकलन का नाम ही है 'नींद थी और रात थी'। नींद और रात के इस रहस्य के नष्ट होते जाने को लेकर चिंतित हैं सविता। वे देखती हैं कि वर्तमान व्यवस्था का हमला सृष्टि के इस आदिम रचनात्मक रहस्य पर बढ़ता जा रहा है। उस आदिम रहस्य को उसकी समग्रता में जानने वाले आदिवासियों को और अन्य दलितों को यह व्यवस्था नष्ट कर देना चाहती है। 'अनिद्रा में' कविता में वे लिखती हैं –
‘कितने थोड़े भरे पेटों के लिए
जंगल के जंगल कारतूस और बंदूकों से लैस अ ब
रात भर जगे रहते हैं पेड
कुछ बच नहीं पा रहा।
ना मर्द, ना औरतें, ना बच्चे
ना रात न उसका रहस्य'।
जंगल के जंगल कारतूस और बंदूकों से लैस अ ब
रात भर जगे रहते हैं पेड
कुछ बच नहीं पा रहा।
ना मर्द, ना औरतें, ना बच्चे
ना रात न उसका रहस्य'।
वे चिंतित हैं कि यह व्यवस्था भाविष्यप्रसूता अंधकार को ही नष्ट कर रही है। यहाँ 'स्वप्न बुलेट-सी बिंधी आंख' बन गए हैं और अनिद्रा और रहस्यहीनता में एक नया ही देश तैयार हो रहा है जिसमें मर्द-औरत-बच्चे-रात कुछ भी नहीं बचे पा रहे। वहां तथाकथित विकास की अंधा करती चौंधियाहट शेष रह जाती है।
इस नए देश के नागरिक चुप्पा किस्म के लोग हैं, जो बचे रहने को अपनी पथरीली अभिव्यक्ति से पाटते जा रहे भाषा को। यह पथराती भाषा अब कवयित्री का लिखना असंभव कर रही है। उसे लगता है कि—
'अब लिखना संभव नही
अब शामिल होना होगा किसी गति में
कुछ बदल रहा है
किन्हीं जंगलों में चले जाना होगा
जहां जीवन टकरा रहा है मृत्यु से।'
अब शामिल होना होगा किसी गति में
कुछ बदल रहा है
किन्हीं जंगलों में चले जाना होगा
जहां जीवन टकरा रहा है मृत्यु से।'
यहां वर्तमान की विडंबनाओं से पार पाने को कवयित्री खुद को जीवन की उस गति में शामिल करना चाहती है जो मृत्यु से टकरा रही है। क्योंकि ये विडंबनाएं रात और स्वप्न और स्त्री के अस्तित्व को ही ग्रसती नजर आ रही हैं। अनस्तित्वता के संकट से दो-चार होतीं वे अतीत की उस सकारात्मक विचार भूमि पर लौटती हैं जहां जाकर एक स्त्री एक पुरूष की तरह विचारों की अमरता का बोध अपने भीतर जाग्रत कर सकती है, जहां वह अपनी अनश्वरता व निरंतरता को पहचान सकती है-
'मैं स्वयं काम हूं स्वयं रति
अनश्वर स्त्री
संभव नहीं मृत्यु मेरी'।
अनश्वर स्त्री
संभव नहीं मृत्यु मेरी'।
यहां आप 'अहं ब्रम्हास्मि' की ध्वनि को महसूस कर सकते हैं।
रात, स्वप्न और स्त्री के रहस्यों से पार पाने की कोशिश में सविता सहज ढंग से उन्हीं निष्कर्षें तक पहुंचती नजर आती हैं जहां हमारे ख्यातिप्राप्त मनोवैज्ञानिक पहुंचे हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एडलर अपने अध्ययन के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि -' सपने आत्मवंचना को बल देते हैं और वे सोद्देश्य होते हैं...सपने व्यक्ति की स्मृति से ही अपना चुनाव करते हैं और श्रेष्ठता के उसके निजी ध्येय का पक्ष लेते हैं... सपने अक्सर हमें धोखा देते हैं क्योंकि वे अक्सर आसान हल की ओर इशारा कर रहे होते हैं। सविता सिंह भी स्वप्नों को लेकर शंका जाहिर करती हैं –
'क्या स्वप्न का भी होता है कोई मुखौटा
उसका चेहरा भी कहीं वहीं तो नहीं
जिसे वह छुपाए हुए है...।’
उसका चेहरा भी कहीं वहीं तो नहीं
जिसे वह छुपाए हुए है...।’
गुस्ताव जैनुक से बातें करते काफ्का कहते हैं – ‘ ... लेकिन क्या मनुष्य से बढकर कोई रहस्य है। कविता इसका अन्वेषण करती है। कविता हमेशा सत्यान्वेषण का अभियान है।‘ सत्यान्वेषण का यह अभियान सविता की कविताओं में भी बारहा दिखता है। इस सत्यान्वेषण के क्रम में वे जानती हैं और बताती हैं कि इस सत्यान्वेषण की भी सीमाएं हैं। उसी तरह कविता की भी सीमाएं हैं और जीवन की भी-
’कब किसी ने मुझे समझाया
भाषा ही संसार है
जिसे हम जितना जानते हैं
उतना नहीं भी
और इसके आगे का हर प्रयत्न
एक विफल उडान है मनुष्यता की।‘
भाषा ही संसार है
जिसे हम जितना जानते हैं
उतना नहीं भी
और इसके आगे का हर प्रयत्न
एक विफल उडान है मनुष्यता की।‘
काफ्का भी लिखते हैं –‘ ... कोई कितना भी जान ले, मनुष्य अपने पार नहीं जा सकता।‘
यूं तो प्रेम की रूढियों पर भी लिखा है सविता सिंह ने। पर प्रेम की विकलता को उसकी बहुस्तरीयता में जिस तरह दिखाती हैं सविता, वह अनोखा है। उस तडप में कैसे हम समय की तलवार को उसकी धार की तरफ से पकडते हैं और रक्त की धार से ही उसे कुंद करने की कोशिश करते अपने ही बहाए रक्त पर रीझते हैं। प्रेम की इस दुर्निवार बेचैनी को ‘बचा हुआ धीरज’ कविता में वे बिल्कुल् नये ढंग से अभिव्यक्त करती हैं –
‘तभी समा गयी फिर से एक अधीरता प्रेम पाने की
फिर से सबकुछ अस्त – व्यस्त हो गया
गर्क काले रंग में बादलों के
चांद की तरह उजागर हुई एक नयी तडप
धरती आसामान एक करती हुई।‘’
फिर से सबकुछ अस्त – व्यस्त हो गया
गर्क काले रंग में बादलों के
चांद की तरह उजागर हुई एक नयी तडप
धरती आसामान एक करती हुई।‘’
कुल मिलाकर सविता की कविताएं इस कठिन समय में अपनी अभिव्यक्ति की संभावनाओं को जानने और समय के पार उसके भाविष्य तक जाने का जरिया बनती हैं।