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Friday, August 09, 2013

मनोहर श्याम जोशी की जन्मतिथि !

आज आधुनिक हिन्दी साहित्य के श्रेष्ट गद्यकार मनोहर श्याम जोशी (09 अगस्त 1933 - 30 मार्च 2006) की जन्मतिथि है। वे व्यंग्यकार, पत्रकार, दूरदर्शन धारावाहिक लेखक, जनवादी-विचारक, फिल्म पट-कथा लेखक, उच्च कोटि के संपादक, कुशल प्रवक्ता तथा स्तंभ-लेखक भी थे। दूरदर्शन के प्रसिद्ध और लोकप्रिय धारावाहिकों- ' बुनियाद' 'नेताजी कहिन', 'मुंगेरी लाल के हसीं सपने', 'हम लोग' आदि के कारण वे भारत के घर-घर में प्रसिद्ध हो गए थे। वे रंग-कर्म के भी अच्छे जानकार थे । उन्होंने धारावाहिक और फिल्म लेखन से संबंधित 'पटकथा-लेखन' नामक पुस्तक की रचना की है। दिनमान' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के संपादक भी रहे। उन्होंने ‘कूर्मांचली’ के नाम से कविताएँ भी लिखी थीं। उनकी जन्मतिथि के अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ। 

रिश्ता
एक ही रिश्ता है जिसे मैं मानता हूं
कि सबके अपने सपने हैं
और फिर वे अपने हैं
जिनके कुछ अपने से सपने हैं.
मीनार पर
बहुत परिश्रम कर
एक ऊंची मीनार के शिखर पर पहुँच कर
बैठ कर पालथी मारे
मैं पूरे करने लगा अपने इरादे
हँसने लगा भभाकर
बावरी बेवकूफ दुनिया पर
पर तभी सर्र सर्र
हवा ने कहा मेरे कान पर मुँह धर
‘पगले तू इतने ऊंचे बैठा है
कि तेरी हँसी कोई नहीं सुनता है.’
यह क्षण
आंखें मिलाये हुए
बांहें उलझाये हुए
हम तुम लेटे हुए हैं दूब में
दूब में खिले हैं फूल धूप के
धूप में खिले हैं फूल रूप के
ऐसे ही लेटे रहें दूब में
आंखें मिलाये हुए, बांहें उलझाये हुए
अभी क्या? अभी तो यह कुछ भी नहीं
(लगता है लेटे हैं रोज की तरह यों ही)
पर कभी गाढ़े वक्त काम आएगी इसी क्षण की याद
क्षण का जीवन शुरु होता है क्षण के मर जाने के बाद.
कवि से
कवि यदि गाना हो तो कविता में मत गाओ
कविता दुःख सुख की अभिव्यक्ति नहीं है
और नहीं है सस्ता साधन मन की खाज मिटाने का वह
आप गुदगुदाने का
अपने तन को,
मन को बहलाने का,
या कल्पना रिझाने का.
निश्चय ही कविता
दुःख की या सुख की
अभिव्यक्ति नहीं है
कविता तो वह है जो, सुख-दुःख के आकर भर कर अंतर में
बह जाने के बाद
रहा करता है—
वह जो बच जाता है अपना.
कवि यदि वह बच पाया तो कह जाओ
कवि यदि गाना हो तो कविता में मत गाओ.
‘काफल पाको’
आओ सुनें चुपचाप चिड़िया का गान
‘काफल पाको त्वील नी चाखो’ की मधुर तान
सुनें उसे बस और कुछ न सुनें
कुछ न करें, बस सुनें सुनें
सुनते रहें चुपचाप.
न गिनें कि जंगल में देवदार कितने हैं?
कितने बांज? चीड़ कितने हैं?
न सुनें वायु का रुदन
झरनों की छल छल कल कल
पत्तों की सर सर खर खर
झींगुरों की झिंग झनन झनन
कुछ न करें बस लेटे रहें
पास पास घास पर
सुनते रहें चिड़ियों का गान
‘काफल पाको त्वील नी चाखो’ की मधुर तान 
जब तक अनायास ही
हमारे होंठों से प्यास किसी पिछले जीवन की न फूट पड़े
बन ‘काफल चाखो मील नी चाखो’ की मधुर तान

Wednesday, July 24, 2013

अमित कल्ला की रंग-जनित कविताएँ

जैसे एक अबोध शिशु ‘माँ’ शब्द से शुरुआत करते हुए शब्दकोष के सारे शब्दों को अपना लेता है, वैसे ही एक चित्रकार तीन प्रमुख रंगों (लाल, हरा और नीला) से शुरू कर दुनिया के तमाम रंगों को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेता है। फिर जब और जहाँ उसका मन होता है, वह उन रंगों का इन्द्रधनुष बनाता है और देखने-पढ़ने वाले, उन बिन बरसात के धरती पर उतरे इन्द्रधनुषों की माया के भीतर क़ैद हो जाते हैं। जिस घड़ी कवि-चित्रकार अमित कल्ला, चित्र उकेर रहे होते होंगे तब कविता ज़रूर उनकी कूची को ताकती होगी और जब वे शब्दों के संगत में होते होंगे तो हँसते-खेलते शोख रंग उनकी हथेलियों बीच  गुदगुदी कर बैठते होंगे। गौर करने की बात यह है कि जब हम अमित के चित्रों को  देख रहे होते हैं या उनकी कविता पढ़ रहे होते हैं, तो उनकी कविताएँ, शब्दों की एक रंगी चादर पर अनगिनत रंगो के छीटें की तरह लगती है और उनके चित्र-बिम्ब समंदर की गिरती-उठती लहरों की तरह कैनवस पर मचलते जान पड़ते हैं। रंगों और बिम्बों का यहीं घालमेल उनकी कविताओं का खूबसूरत वितान रचता है। इस बात का पुख्ता सबूत हैं अमित कल्ला की रंग-जनित ये छोटी-छोटी कविताएँ - विपिन चौधरी

DSC06292“उलटबाँसी”
ऐसा ही! मानो, 
हर  रोज़ का अनुभव हो 
असंभव नहीं जहाँ 
इस शिकायती मन को मनना 
कुछ देखना जो 
उसे कहीं ज्यादा भीतर ले जाये
जानता हूँ 
कितना कठिन होता है 
लम्बी यात्राओं के बाद 
पीछे को लौटना 
हज़ार कायाओं की छापों से मुक्त होकर 
देह का बीज और 
बीज का कोष में समां जाना
कितना कठिन 
उस सीखे को भुलाना 
सत्य के करीब होने के भय को मिटा देना 
और कभी 
स्वयं को उंडेलकर 
"उलटबाँसी" हो जाना
असंभव नहीं 
कठिन जरुर होता है 
संसार में 
पदार्थ और मृत्यु के 
अतिरिक्त भी कुछ देखना।
DSC06287करवट-करवट
किसी
औघड़ की
काली कमली ओढ़
अपनी ही देह में
अंतरध्यान हो
पल-पल
कैसा सहारा देती है
मौन
के उस
सुरमई
संतुलन को
करवट-करवट।
कोई खलील
कोई
खलील
अराक के
जंगलों में
पश्मीना ओढे
सत्यासत्य से
जूझते
इब्राहिम के
आगमन कि प्रतीक्षा करता है  
398724_10200104912935188_1498727230_nबैजनी छठा
बिखर जाती है
सजीली फुलवारी पर 
पलटकर
अंजान
बारूद के गंध सी।
साँची का सुनहरा सूरज
उत्सवी आवरणों से दूर 
स्तूपों के सायों में 
अपनी ही
शाखों के कन्धों पर
कश्तियाँ लादे
ब्रह्माण्ड के रहस्यों में
गोता लगाता है
अपने
घेरे को तोड़कर
निगलता है
कई मंज़र 
कहीं अधिक
गहरा
बिंदु-बिंदु
बनाता है
बिम्ब
वेदिका पर टिका  
ये
साँची का
सुनहरा सूरज।
sनिर्धारित निर्वासन
स्मृतियों की
खड़खड़ाहटों के पार
बूंद–बूंद
संवित विकल्प
कैसा वह
निर्धारित निर्वासन
स्वप्न से स्वप्न,
काया से काया,
भव से भव
एकाएक
मानों
किसी
टूटते तारे का पीछा करती
रेखा की पकड।
पार-अपार
बहते हैं रंग 
दिशाएं भी 
बहती हैं, 
स्मृतियाँ 
बूंद-बूंद 
उन्ही-सी
किन्ही अल्पविरामों के
नितांत,
पार-अपार।
DSC06057डूबते-डूबते
धीरे-धीरे
ख़त्म होने लगी आकांशा 
खुलने की, 
आवाजों के सहारे चलने 
और अपनी ह़ी चीजों को पाने की,
धीरे-धीरे 
ज्यादा करीब आने लगा हूँ  
सीखने लगा रुकना,
पहाड़ से उतरती 
नदी को देखना, 
धीरे-धीरे 
समाने लगा 
किन्ही निर्धारित शब्दों में 
जोगी होकर डूबते–डूबते
गृहस्थी के विश्वास को 
पाने लगा हूँ।
एक सूत्र
एक सूत्र है
उसके पास
मन की कतली से काता
शब्द सूत्र
मैं सुन पाता हूँ
अनुवादों से कहीं बेहतर
उसके स्वर
अपार जल सरीखे स्वर
थिर हो जाता
उसका सजग भागीदार बन
निश्चेष्ट ही
वह
परछाइयों-सा
कोमल सूत्र।
sकम जटिल
संसार में
बहुत कुछ है
जानने को
कम जटिल
कम आकस्मिक
चूके हुए
शिकारी
फिर एक नयी
कथाकथित छलांग लो
पहचान लो
इन हिरणों के रंग–ढंग
बे-फिक्र रहो
तुम्हारा जागना
निश्चित ही
आज
व्यापार नहीं है।
चन्द्रवदनी की ओर
तिनकों से 
नदी ने प्रवाह को 
रोकने की बात पर 
DSC06290झटपट 
कुछ गड़गड़ाती 
छायाएँ 
ढक लेती मुझे 
कौने-कौने से 
हजारों पैर
चले आते 
बे-परवाह 
भूख के अंदाजों को 
पीछे छोड़ 
चन्द्रवदनी की ओर 
जहाँ 
धूप, बादल, हवा 
चढाते-लुढ़कते हैं 
आजीवन। 

Thursday, July 18, 2013

सत्यान्वेषण का अभियान है कविता : कुमार मुकुल

हाल में वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह का नया कविता-संग्रह आया है—स्वप्न समय। इसकी समीक्षा की है कवि-लेखक-संपादक कुमार मुकुल ने। यह समीक्षा आगरा से प्रकाशित ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ में छपी है, वहीं से साभार।

गुस्‍ताव जैनुक की पुस्‍तक 'काफ्का के संस्‍मरण' में एक जगह काफ्का कहते हैं, 'सपने दूसरे किस्‍म का पलायन हैं, जिसके अंत में हमकें घूम-फिर कर अपने तात्‍कालिक सच में उतरना पड़ता है। स्‍टीवेंसन को अपने 'ट्रेजर आइलैंड' में और मुझे...
आगे जैनुक इसे पूरा करते हैं,  'आपको...यहां दफ्तर, या अल्‍साडेटर रिंग में स्थित मकान में'।
सविता सिंह के तीसरे कविता संकलन का नाम है 'स्‍वप्‍न समय'। क्‍या शीर्षक में समय के इस पलायनवादी स्‍वरूप की ओर इशारा करना चाहती हैं सविता। 'अप्रत्‍याशित' कविता में वे लिखती हैं–
'इस स्‍वप्‍न समय में
गिरती हैं कैसी वे इच्‍छाएं
अधूरी रहीं जो
वे नग्‍नताएं आत्‍मा की
तडपती रहीं जो वस्‍त्र के लिए
गिरती हैं कैसे वे मीनारें हीरों-मोतियों से जड़ीं...लगती थीं वे बनाई गई थीं अमर होने के लिए—
वे सच्‍चाईयां थी कितनी पस्‍त
किसी घायल पक्षी की तरह आ गिरती हैं
हमारे इस समय में...
एक काल-खण्‍ड सिमट रहा है
शुरू होने के लिए नये सिरे से
स्‍वप्‍न में देख रही हैं आंखें एक अप्रत्‍याशित दृश्‍य'।
'इस स्‍वप्‍न समय में' सविता अपूर्ण इच्‍छाओं को गिरता देखती हैं तो हीरे-मोतियों जड़ी मीनारों को भी गिरता देखती हैं। यहां वे इस स्‍वप्‍न यानी पलायनवादी समय के यथार्थ को अगर गिरता-बिखरता देखती हैं, तो सिमटते काल-खण्‍ड के नये सिरे से शुरू होने का स्‍वप्‍न भी देखती हैं।
काफ्का लिखते हैं कि यथार्थ यथास्थिति को बदलता है और सविता का स्‍वप्‍न उसी बदलाव का स्‍वप्‍न है। एक तरह से कह सकते हैं कि भविष्‍य का नया यथार्थ इस पलायनवादी समय में सविता के स्‍वप्‍नों के माध्‍यम से अपनी जमीन पाना चाहता है, नये सिरे से शुरू होना चाहता है।
'स्‍वप्‍न' और 'रात' शब्‍द का प्रयोग सविता की कविताओं में बारहा होता है। ये दोनों ही शब्‍द स्‍त्री के पर्याय हैं सविता के लिए। एक जगह वे लिखती हैं –
'क्‍या स्‍त्री सचमुच रात है जैसा मैं जानती हूँ 
या रात में स्‍वप्‍न है वह'। 
उनके भीतर एक सवाल भी है–
'क्‍या स्‍वप्‍न और स्‍त्री एक ही हैं'।
सविता की कविताएँ रात और स्‍वप्‍न की इस धुरी के आस-पास घूमती रहती हैं। रात और उसका रहस्‍य स्‍त्री को अस्तित्‍ववान करते हैं। अपने अंधेरों में ही बचाकर विकसित करती हैं वे भविष्‍य के जीवन को, सुबहों को। इस रहस्‍य की रक्षा के लिए नींद जरूरी है। सविता सिंह के एक संकलन का नाम ही है 'नींद थी और रात थी'। नींद और रात के इस रहस्‍य के नष्‍ट होते जाने को लेकर चिंतित हैं सविता। वे देखती हैं कि वर्तमान व्‍यवस्‍था का हमला सृष्टि के इस आदिम रचनात्‍मक रहस्‍य पर बढ़ता जा रहा है। उस आदिम रहस्‍य को उसकी समग्रता में जानने वाले आदिवासियों को और अन्‍य दलितों को यह व्‍यवस्‍था नष्‍ट कर देना चाहती है। 'अनिद्रा में' कविता में वे लिखती हैं –
‘कितने थोड़े भरे पेटों के लिए 
जंगल के जंगल कारतूस और बंदूकों से लैस अ ब 
रात भर जगे रहते हैं पेड 
कुछ बच नहीं पा रहा। 
ना मर्द, ना औरतें, ना बच्‍चे 
ना रात न उसका रहस्‍य'।
वे चिंतित हैं कि यह व्‍यवस्‍था भाविष्‍यप्रसूता अंधकार को ही नष्‍ट कर रही है। यहाँ 'स्‍वप्‍न बुलेट-सी बिंधी आंख' बन गए हैं और अनिद्रा और रहस्‍यहीनता में एक नया ही देश तैयार हो रहा है जिसमें मर्द-औरत-बच्‍चे-रात कुछ भी नहीं बचे पा रहे। वहां तथाकथित विकास की अंधा करती चौंधियाहट शेष रह जाती है।
इस नए देश के नागरिक चुप्‍पा किस्‍म के लोग हैं, जो बचे रहने को अपनी पथरीली अभिव्‍यक्ति से पाटते जा रहे भाषा को। यह पथराती भाषा अब कवयित्री का लिखना असंभव कर रही है। उसे लगता है कि—
'अब लिखना संभव नही 
अब शामिल होना होगा किसी गति में
कुछ बदल रहा है
किन्‍हीं जंगलों में चले जाना होगा
जहां जीवन टकरा रहा है मृत्‍यु से।'
यहां वर्तमान की विडंबनाओं से पार पाने को कवयित्री खुद को जीवन की उस गति में शामिल करना चाहती है जो मृत्‍यु से टकरा रही है। क्‍योंकि ये विडंबनाएं रात और स्‍वप्‍न और स्‍त्री के अस्तित्‍व को ही ग्रसती नजर आ रही हैं। अनस्तित्‍वता के संकट से दो-चार होतीं वे अतीत की उस सकारात्‍मक विचार भूमि पर लौटती हैं जहां जाकर एक स्‍त्री एक पुरूष की तरह विचारों की अमरता का बोध अपने भीतर जाग्रत कर सकती है, जहां वह अपनी अनश्‍वरता व निरंतरता को पहचान सकती है-
'मैं स्‍वयं काम हूं स्‍वयं रति
अनश्‍वर स्‍त्री
संभव नहीं मृत्‍यु मेरी'।
यहां आप 'अहं ब्रम्‍हास्मि' की ध्‍वनि को महसूस कर सकते हैं।
रात, स्‍वप्‍न और स्‍त्री के रहस्‍यों से पार पाने की कोशिश में सविता सहज ढंग से उन्‍हीं निष्‍कर्षें तक पहुंचती नजर आती हैं जहां हमारे ख्‍यातिप्राप्‍त मनोवैज्ञानिक पहुंचे हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एडलर अपने अध्‍ययन के पश्‍चात इस निष्‍कर्ष पर पहुंचते हैं कि -' सपने आत्‍मवंचना को बल देते हैं और वे सोद्देश्‍य होते हैं...सपने व्‍यक्ति की स्‍मृति से ही अपना चुनाव करते हैं और श्रेष्‍ठता के उसके निजी ध्‍येय का पक्ष लेते हैं... सपने अक्‍सर हमें धोखा देते हैं क्‍योंकि वे अक्‍सर आसान हल की ओर इशारा कर रहे होते हैं। सविता सिंह भी स्‍वप्‍नों को लेकर शंका जाहिर करती हैं –
'क्‍या स्‍वप्‍न का भी होता है कोई मुखौटा 
उसका चेहरा भी कहीं वहीं तो नहीं 
जिसे वह छुपाए हुए है...।’
गुस्‍ताव जैनुक से बातें करते काफ्का कहते हैं – ‘ ... लेकिन क्‍या मनुष्‍य से बढकर कोई रहस्‍य है। कविता इसका अन्‍वेषण करती है। कविता हमेशा सत्‍यान्‍वेषण का अभियान है।‘ सत्‍यान्‍वेषण का यह अभियान सविता की कविताओं में भी बारहा दिखता है। इस सत्‍यान्‍वेषण के क्रम में वे जानती हैं और बताती हैं कि इस सत्‍यान्‍वेषण की भी सीमाएं हैं। उसी तरह कविता की भी सीमाएं हैं और जीवन की भी-
’कब किसी ने मुझे समझाया
भाषा ही संसार है
जिसे हम जितना जानते हैं
उतना नहीं भी
और इसके आगे का हर प्रयत्‍न
एक विफल उडान है मनुष्‍यता की।‘
काफ्का भी लिखते हैं –‘ ... कोई कितना भी जान ले, मनुष्‍य अपने पार नहीं जा सकता।‘
यूं तो प्रेम की रूढियों पर भी लिखा है सविता सिंह ने। पर प्रेम की विकलता को उसकी बहुस्‍तरीयता में जिस तरह दिखाती हैं सविता, वह अनोखा है। उस तडप में कैसे हम समय की तलवार को उसकी धार की तरफ से पकडते हैं और रक्‍त की धार से ही उसे कुंद करने की कोशिश करते अपने ही बहाए रक्‍त पर रीझते हैं। प्रेम की इस दुर्निवार बेचैनी को ‘बचा हुआ धीरज’ कविता में वे बिल्‍कुल्‍ नये ढंग से अभिव्‍यक्‍त करती हैं –
‘तभी समा गयी फिर से एक अधीरता प्रेम पाने की
फिर से सबकुछ अस्‍त – व्‍यस्‍त हो गया
गर्क काले रंग में बादलों के
चांद की तरह उजागर हुई एक नयी तडप
धरती आसामान एक करती हुई।‘’
कुल‍ मिलाकर सविता की कविताएं इस कठिन समय में अपनी अभिव्‍यक्ति की संभावनाओं को जानने और समय के पार उसके भाविष्‍य तक जाने का जरिया बनती हैं।

Wednesday, July 17, 2013

कविता की मुलायम बेल, दार्शनिकता की सीधी-सपाट दीवार पर बमुश्किल ही चढ़ पाती है, पर एक कवि के रूप में समर्थ वशिष्ट ऐसा कर सकने में पूर्णत समर्थ जान पड़ते हैं। उनकी कविताओं में जीवन-दर्शन की बारीकियां दर्ज़ हैं, जो कविता के शब्दों में आसानी से चाशनी की तरह घुल-मिल जाती हैं। दर्शन के दैनंदिनी सिद्धांत जो सामान्यतः आज के दौर में एक ढेले की तरह सड़क के किनारे कर दिए गए हैं, उन्हीं नज़रंदाज़ कर दिए गए दार्शनिकता के सिद्धांतों को कवि समर्थ एक धातु की तरह इस्तेमाल कर सटीक समिक्ष्रण बनाते हैं, जो कविता की नर्म तासीर को यथावत बनाए रखता है। समर्थ की कविता गहरी समझ की कविता है, जो खरगोश की तरह सरपट न भाग कर एक कछुए की तरह इंतज़ार की आहटों को गुना करती हैं। आईए समर्थ वशिष्ट की इन कविताओं से रूबरू हुआ जाए - विपिन चौधरी

स्त्रियाँ
मैंने देखा है उन्हें
ऐन पगलाहट के क्षणों में भी
होश संभाले
चीख़ते-चिल्लाते
तानाशाह के क़दमों से
अपने मारे जा चुके बेटों को उठाते
विशाल सेनाएं कदमताल करतीं हैं
क्षितिज तक 
आती हैं उन दिशाओं से जिनके बारे कोई नहीं जानता
चिंता में डूबी उनकी आंखों से गुज़र जाती हैं
उनके पास सिर्फ़ एक तिहाई इतिहास है
और सारी की सारी अफ़वाहें
वो धूल भरा पंख है
किसी शक्तिशाली सिंहासन के मुकुट में लगा हुआ
किसी चमकते हुए दिन पति छोड़ जाता है
लौटकर आते हैं बेटे भिक्षुओं के भेस में
एक स्त्री ढूंढ़ती है अपनी नींद के पाँच घंटे
रात की मुर्दार शांति में सुबकती है मेरी मां
ऊंघते हुए मुझे कहानियां सुनाती है
मेरी बांहों में पिघलती एक स्त्री
मेरे शरीर के सब अंगों को
जोड़े रखती है एक साथ
हज़ारों साल से जारी है इंतज़ार
औरतें जो चली गईं
उनका बाक़ी नहीं कोई निशान
एक स्त्री के पास जाने को
कोई जगह नहीं होती।
शेष
मुझे याद नहीं रहते हैं चेहरे
इसकी आप ऐसे व्याख्या भी कर सकते हैं
कि मुझे भूल जाते हैं चेहरे
पर नहीं
मुझे याद नहीं रहते चेहरे
मुझे याद रहती हैं भवें, ओंठ
कलमों के कटाव भी
पर इस सभी से
एक मुक़्कमल चेहरा नहीं जोड़ पाता है
मेरा दिमाग़
गहरी नींद से तपककर उठाता है
मुझे जो दु:स्वप्न
उसमें झुका रहता है मुझपर
बिल्कुल सपाट चेहरे वाला कोई
फ़िल्में देखते भी अक़्सर
खूबसूरत चेहरों से ज़्यादा
इंतज़ार रहता है मुझे
पुष्ट नितंबों का
बहरहाल, हालत ये है कि
मुझे लगने लगा है
सैंकड़ों आंखों सी मेरी आंखों
और हज़ारों नाकों सी मेरी नाक
कोई भी सोच नहीं पाएगा
कोई एक साथ
कैसा लगूंगा स्मृतियों में मैं?
शायद याद रहे मेरी गेंद सी तोंद!
माँ
सिरहाने ’मीर’ के आहिस्ता बोलो...
सोचते-सोचते
नींद में प्रवेश कर गया होगा
उसका मस्तिष्क
जिव्हा के कसैलेपन को
आत्मसात करते
धीरे-धीरे
घुल रहें होंगे
रक्त प्रवाह में
दवाइयों के अवयव
गिर रही होगी
शर्करा।
कैसे कल्पित करूं
उसके डरावने सपनों के रंग
उनमें हाथ
थोड़ा गीला किए बगैर?
धीरे से छोड़ दूं
माथे पर एक चुंबन
इससे पहले कि
वो उठे
और पूछे वे प्रश्न
जिनके उत्तर 
वो जानती है
पर जानना नहीं चाहती।
जीना
वैसे नहीं
मेरे बच्चे
जैसे काठ की कोठरी में
क़ैद रहती है अखरोट की गिरी
तोड़े जाने का करती इंतज़ार
वैसे नहीं जैसे
बढ़ती जाती हैं कुछ मूर्ख नौकाएँ
रेडियो पर गूँज रहीं
तूफ़ान की चेतावनियों के बावजूद
रहना तरल
पेड़ की पत्तियों के बीच
टपकती बूंद के मानिंद
मिले जब किसी सीप की ओट
धड़कती, जीवित
कर लेना अपना एक घर सुदृढ़
लड़ना
कि सबको नहीं मिलता
यहाँ एक घर
अपनी धुन की सुनना
सूरज रखेगा तुम्हारे सर पर हाथ
गुरुत्व
पेट भर खा लेने के बाद
अलसा जाते हैं जैसे
हाथी भी चींटी भी
अपनी ही टांगों पर ढह जाने का
जोखि़म लिए चलता है जैसे
ट्रायनोसॉरस रेक्स
आखिरी चमक की कौंध में सिकुड़कर
बनता जाता है जैसे कोई रक्तदानव
ब्लैक होल
सिक्के से भारी होते हैं हम कहीं भीतर
हीलियम से हल्के ज़्यादातर।
जन्म लेता है एक शब्द
हौले-हौले जन्म लेता है
एक शब्द
जैसे जुड़ी हो उसके साथ
भरे-पूरे किरदारों वाली
कोई कथा
आप कहेंगे ज़मीन
तो मौजूद हो सकती है वहां
बख़्तरबंद सिपाहियों की पूरी कतार
भूमि पर चढ़ाई करती
यूंही नहीं कह सकते
आप किसी फल को आम
अपनी जिव्हा पर टपक आए
रस का आस्वादन किए बगैर
पीड़ा से बिलबिला उठेंगे आप
ततैया के दंश से
पर कुछ भी नहीं होगा वह
भिरड़ के लड़ने के दर्द के मुक़ाबले
बैंगलोर्ड हो जाएगा अमरीका में कोई
डूब जाएगी आर्नल्ड श्वाज़ेनेगर की छवि
प्लूटो के ग्रहत्व की तरह।
हौले-हौले जन्म लेता है एक शब्द
उसे गढ़ता है तीन साल का एक बच्चा
भूल जाता है, फिर करता है याद 
तीन बरस के अपने बच्चे से खेलता हुआ।
नदी सा बन जाता है कभी कोई शब्द
जैसमीन के फूल की सफ़ेदी में
जुड़ जाता है क्रांति का रंग
हौले-हौले यूं बना कोई शब्द
जब देता है शब्दकोश पर दस्तक
तो चौंक जाती है अचानक भाषा
कि अरे, देखा ही नहीं मैंने
आते हुए दबे-पांव तुम्हें!
इराक़, एक प्रार्थना
मेरी
     धूसर-हरी 
                ज़मीन पर
वज्रपात
        गड़गड़ाहट
                      चुप्पी
                            रक्त
मेरी
    धूसर-हरी
              ज़मीन पर
पास्ता, कैचॅप
             भागम-भाग
                        निंदनीय
                                 मेज़ के सलीक़े
मेरी अंजुरी में
              रौशनी
रौशनी
        छूता हूँ मैं
रौशनी
      ये मेरा संसार
रौशनी
      तुम धूल में मिला देती हो
                                     मुझे
जैसे कोई नन्हा दानव
                            सीख रहा हो 
                                          अपने त्रिशूल का उपयोग
प्रभु मेरे!
      धृष्टताओं के
                   रंगों के
                         अग्नि के
जैसे 
    कोई चायवाला
                उबालता है अपना दूध
                                        बारम्बार
जैसे
   जंग खाया 
            कोई कवि
                    जोड़ता है शब्द
भरो
    मेरे घाव
           पूरे करो
                   मोटापे में देखे ख़्वाब
लौट आओ
दो जय
       दो पराजय
दो जीवन
       दो मृत्यु
विद्रोह
जब एक क्षण मक्की के दाने की तरह फूटता है 
तब ही हमें अपनी उंगलियाँ गिनना सूझता है
मरणासन्न नेता रैलियों में पेसमेकर संभालते हैं
अर्थशास्त्री की नपी-तुली आवाज़ 
टीवी से करती है अचरज 
धरती पर कहाँ जीने की कीमत धरती है?
कविता तक अपनी सहिष्णुता का अस्त्र खो बैठती है 
सर्दियों के ओले भूल जाते हैं कब लौटना है घर —
कहीं कोई जिस पर हमें सदा विश्वास था 
हमारी प्रार्थनाओं से फेर लेता है मुँह
और तब हमारी जड़ें मांगती हैं जुंबिश 
ध्येय खोजती बाज़ुएँ खुलती जाती हैं 
और हर नारा एक ही भाषा बोलता है —
अब उठें भाई!
इससे पहले कि साँझ का आखिरी दरवाज़ा 
भन्नाया जाए हम पर
कितनी तकनीकी, स्वामीनाथन
कितनी तकनीकी, स्वामीनाथन
कि ग्रीष्म से झुलसी सड़क पर
चलते तुम्हारे पांव
पाएँ कुछ आराम
सत्तर पार की इस उम्र में
सुबह जब तुम लौटाओ
किसी परेड में तैनात
सिपाही सी कड़क मेरी कमीज़ें
विस्मय से भरीं तुम्हारी आंखें
समझें मेरे लैपटॉप की टिमटिमाती बत्तियां
फोन के छुअन से चलने का विज्ञान
मन करता है स्वामीनाथन
करूं तुमसे बहुत सी बातें
पूछूं तुम्हारे पोतों के नाम
जानूं तुम्हारे महानायकों के
काले चश्मे पहनने का रहस्य
तुम जानते भी हो स्वामीनाथन
पहली दुनिया में गिना जाने वाला है
भारत
कितनी तकनीकी
कि हमें मिल जाए चार शब्दों की एक भाषा
जिसमें बतिया पाएं सिर्फ़ एक बार खुलकर
तमिल की छंटी क्यारियों
और हिन्दी के सुघड़ स्तनों
से परे
नवगीत
खाली हो टंकी जब सूखे हों नल
शॉवर में रहता है थोड़ा सा जल
ऐसे ही जाता है जीवन निकल
जगमग उजालों से लगता है डर
घर लौटूं, तकिए पे रखूं जो सर
राहत कि जैसे हो गर्मी में ज्वर
दिनभर निकलते ही रहते हैं काम
खाली सी आंखों में दुनिया तमाम
इंसान होने के सब ताम-झाम
चिल्लाती सुबहों में फैले उजास
जागूं मैं ज्यूं ही इक कविता उदास
जम्हाई लेती सी आ बैठे पास।