Saturday, September 15, 2012

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की जन्मतिथि !

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
आज साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (15 सितंबर 1927 - 24 सितंबर 1983) की जन्मतिथि है। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
आश्रय
पेड़ों के साथ साथ
हिलता है सिर
यह मौसम अब नहीं
आएगा फिर
पहाड़
भय से मुक्त किया तुमने
पर आशंका से नहीं।
जाने कब पहाड़ यह
,
संतुलन बिगड़े
जा अतल में समाए
या फिर महाशून्य में
विलय हो जाए -
जिसे मैं अपनी छाती पर ढो रहा हूँ।
जिसके लिए निर्मल पारदर्शी जल
हो रहा हूँ।
पिछड़ा आदमी
जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था
,
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था
,
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था
,
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था
लेकिन जब गोली चली
तब सबसे पहले
वही मारा गया।
प्‍यार : एक छाता
विपदाएँ आते ही,
खुलकर तन जाता है
हटते ही
चुपचाप सिमट ढीला होता है
;
वर्षा से बचकर
कोने में कहीं टिका दो
,
प्‍यार एक छाता है
आश्रय देता है गीला होता है।
भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं
भेड़िए की आँखें सुर्ख़ हैं।
उसे तबतक घूरो
जब तक तुम्हारी आंखें
सुर्ख़ न हो जाएँ।
और तुम कर भी क्या सकते हो
जब वह तुम्हारे सामने हो
?
रिश्ते
खुद कपड़े पहने
दूसरे को कपड़े पहने देखना
खुद कपड़े पहने
दूसरे को कपड़े न पहने देखना
खुद कपड़े न पहने
दूसरे को कपड़े न पहने देखना
तीन अलग-अलग रिश्ते बनाना है
इनमें से
पहले से तुम्हें मन बहलाना है
दूसरे को खोजने जाना है
तीसरे के साथ मिलकर
क्रान्ति और सृजन का परचम उठाना है।
रिश्ते की खोज
मैंने तुम्हारे दुख से अपने को जोड़ा
और -
और अकेला हो गया।
मैंने तुम्हारे सुख से
अपने को जोड़ा
और -
और छोटा हो गया।
मैंने सुख-दुख से परे
अपने को तुम से जोड़ा
और -
और अर्थहीन हो गया।
चमक
चमक है पसीने की
कसी हुई मांसपेशियों पर
,
चमक है ख़्वाबों की
तनी हुई भृकुटी पर।
चमक सुर्ख
, तपे लोहे की घन में,
चमक बहते नाले की
शांत सोये वन में।
उसी चमक के सहारे मैं जिऊँगा
हर हादसे में आए ज़ख़्मों को सिऊँगा।
जड़ें
जड़ें कितनी गहरीं हैं
आँकोगी कैसे
?
फूल से
?
फल से
?
छाया से
?
उसका पता तो इसी से चलेगा
आकाश की कितनी
ऊँचाई हमने नापी है
,
धरती पर कितनी दूर तक
बाँहें पसारी हैं।
जलहीन, सूखी, पथरीली,
ज़मीन पर खड़ा रहकर भी
जो हरा है
उसी की जड़ें गहरी हैं
वही सर्वाधिक प्यार से भरा है।
जब भी
जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दीखने लगता है।
झपटता बाज
,
फन उठाए सांप
,
दो पैरों पर खड़ी
कांटों से नन्ही पत्तियां खाती बकरी
,
दबे पांव झाड़ियों में चलता चीता
,
डाल पर उलटा लटक
फल कुतरता तोता
,
या इन सबकी जगह
आदमी होता।
सुर्ख़ हथेलियाँ
पहली बार
मैंने देखा
भौंरे को कमल में
बदलते हुए
,
फिर कमल को बदलते
नीले जल में
,
फिर नीले जल को
असंख्य श्वेत पक्षियों में
,
फिर श्वेत पक्षियों को बदलते
सुर्ख़ आकाश में
,
फिर आकाश को बदलते
तुम्हारी हथेलियों में
,
और मेरी आँखें बन्द करते
इस तरह आँसुओं को
स्वप्न बनते -
पहली बार मैंने देखा।
एक सूनी नाव
एक सूनी नाव
तट पर लौट आई।
रोशनी राख-सी
जल में घुली
, बह गई,
बन्द अधरों से कथा
सिमटी नदी कह गई
,
रेत प्यासी
नयन भर लाई।
भींगते अवसाद से
हवा श्लथ हो गईं
हथेली की रेख काँपी
लहर-सी खो गई
मौन छाया
कहीं उतराई।
स्वर नहीं
,
चित्र भी बहकर
गए लग कहीं
,
स्याह पड़ते हुए जल में
रात खोयी-सी
उभर आई।
एक सूनी नाव
तट पर लौट आई।
कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है
,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।
शब्दों की खोज शुरू होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं।
हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है
,
कुछ भी ठीक से जान लेना
खुद से दुश्मनी ठान लेना है।
कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना
,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना।
आज पहली बार
आज पहली बार
थकी शीतल हवा ने
शीश मेरा उठा कर
चुपचाप अपनी गोद में रक्खा
,
और जलते हुए मस्तक पर
काँपता सा हाथ रख कर कहा-
"सुनो, मैं भी पराजित हूँ
सुनो
, मैं भी बहुत भटकी हूँ
सुनो
, मेरा भी नहीं कोई
सुनो
, मैं भी कहीं अटकी हूँ
पर न जाने क्यों
पराजय ने मुझे शीतल किया
और हर भटकाव ने गति दी
;
नहीं कोई था
इसी से सब हो गए मेरे
मैं स्वयं को बाँटती ही फिरी
किसी ने मुझको नहीं यति दी"
लगा मुझको उठा कर कोई खड़ा कर गया
और मेरे दर्द को मुझसे बड़ा कर गया।
आज पहली बार।
अंत में
अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूँ
एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो।
अन्यथा
इससे पूर्व कि
मेरा हर कथन
हर मंथन
हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए
,
उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ
जो मृत्यु है।
'वह बिना कहे मर गया'
यह अधिक गौरवशाली है
यह कहे जाने से --
'कि वह मरने के पहले
कुछ कह रहा था
जिसे किसी ने सुना नहीं।
'