Monday, February 11, 2013

औरतों की इच्छाएँ बहुत दिनों में फलती हैं !

शुभा
हिंदी कविता में शुभा (जन्म: 1954) एक ऐसा नाम है, जो हिंदी के हर्ट-लैंड दिल्ली से दूर रोहतक में अपनी रचनात्मकता को आकार दे रही हैं। स्त्री-विमर्श के नाम पर परचम लहराने की बजाय वो मानती हैं कि समाज के सकारात्मक विकास के लिए स्त्री-पुरुष दोनों पहलुओं का होना समान रूप से आवश्यक है। पेशे से प्रोफ़ेसर शुभा सामाजिक कार्यकर्ता हैं और थिएटर से जुड़ी हैं। आप शुभा जी की कविताएँ रू-ब-रू होकर 15 फरवरी को शाम 6:30 बजे (स्थान: ऐटिक, 36 रीगल बिल्डिंग, क्नॉट प्लेस) सुन सकते हैं। फिलहाल प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
आदमखोर-1
एक स्त्री बात करने की कोशिश कर रही है
तुम उसका चेहरा अलग कर देते हो धड़ से
तुम उसकी छातियाँ अलग कर देते हो
तुम उसकी जांघें अलग कर देते हो
तुम एकांत में करते हो आहार
आदमखोर! तुम इसे हिंसा नहीं मानते
आदमखोर-2
आदमखोर उठा लेता है
छह साल की बच्ची
लहूलुहान कर देता है उसे
अपना लिंग पोंछता है
और घर पहुँच जाता है
मुँह हाथ धोता है और
खाना खाता है
रहता है बिल्कुल शरीफ़ आदमी की तरह
शरीफ़ आदमियों को भी लगता है
बिल्कुल शरीफ़ आदमी की तरह।
टूटना-1
एक और एक
दो नहीं होते
एक और एक ग्यारह नहीं होते
क्योंकि एक नहीं है
एक के टुकड़े हैं
जिनसे एक भी नहीं बनता
इसे टूटना कहते हैं
टूटना-2
हवा आधी है
आग आधी है
पानी आधा है
दुनिया आधी है
आधा-आधा है
बीच से टूटा है
यह संसार बीच से टूटा है
पेड़ों की उदासी
पेड़ों के पास ऐसी कोई भाषा नहीं थी
जिसके ज़रिये वे अपनी बात
इन्सानों तक पहुँचा सकें
शायद पेड़ बुरा मान गए किसी बात का
वे बीज कम उगाने लगे
और बीजों में उगने की इच्छा ख़त्म हो गई
बचे हुए पेड़ों की उदासी देखी जा सकती है
बूढ़ी औरत का एकान्त
बूढी औरत को
पानी भी रेत की तरह दिखाई देता है
कभी-कभी वह ठंडी साँस छोड़ती है
तो याद करती है
बचपन में उसे रेत
पानी की तरह दिखाई देती थी।
फिर भी
एक लम्बी दूरी
एक आधा काम
एक भ्रूण
ये सभी जगाते हैं कल्पना
कल्पना से
दूरी कम नहीं होती
काम पूरा नहीं होता
फिर भी
दिखाई पड़ती है हंसती हुई
एक बच्ची रास्ते पर
आता-जाता आदमी
चिड़िया गाती है
हवा पानी में घुल जाती है
धूप रेत में घुस जाती है
पेड़ छाया बनकर दौड़-भाग करते हैं
पानी पर काई फैलती है बड़ी शान से
टिड्डे उड़ान रोककर घास पर कूदने लगते हैं
ओछे दिल का आदमी बड़ी-बड़ी आँखें
बड़े-बड़े कान लिए आता-जाता रहता है
बिना कुछ देखे-बिना कुछ सुने
स्पर्श
एक चीज़ होती थी स्पर्श
लेकिन इसका अनुभव भुला दिया गया
मतलब स्पर्श जो एक चीज़ नहीं था
भुला दिया गया
अब यह बात कैसे बताई जाए
एक मेमना घास भूलकर
नदी पर आ गया
ज़रा सा आगे बढ़कर नदी ने उसे छुआ
और मेमने ने अपने कान हिलाए
औरतें
औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं
मिट्टी के चूल्हे
और झाँपी बनाती हैं
औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं
मिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैं
और मिट्टी की तरह गहन होती हैं
औरतें इच्छाएँ पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं
औरतों की इच्छाएँ
बहुत दिनों में फलती हैं
इच्छा
मैं चाहती हूँ कुछ अव्यवहारिक लोग
एक गोष्ठी करें
कि समस्याओं को कैसे बचाया जाए
उन्हें जन्म लेने दिया जाए
वे अपना पूरा कद पाएँ
वे खड़ी हों
और दिखाई दें
उनकी एक भाषा हो
और कोई उन्हें सुने
एकालाप
क्या नष्ट किया जा रहा है
यह दृश्य है जो खत्म हो रहा है
या मेरी नज़र
ये मेरी आवाज़ खत्म हो रही है
या गूंज पैदा करने वाले दबाव
आत्मजगत मिट रहा है या वस्तुजगत
कौन देख सकता है भला इस
मक्खी की भनभनाहट
इसकी बेचैन उड़ान
कौन तड़प सकता है
संवाद के लिए और उसके
बनने तक कौन कर सकता है
एकालाप।
प्रेमकथा-1
इच्छाएँ
एक क्षण में
पार करती हैं लम्बी दूरियाँ
फिर छटपटाती हैं अपनी कक्षा में
आँखें खुली रखती हैं
तब भी
प्रेमकथा-2
यहाँ प्रतिबद्धता का एक केन्द्र है
आत्मा का उत्खनन होता है
एक ही ओर दौड़ी जाती हैं इच्छाएँ
आत्मा का कोयला सारा
अपनी ही छुपी आग से दौड़ा जाता है
दुख और ख़ुशियाँ सब दौड़ती हैं अपनी दरी लपेटे
ज़मीन तोड़कर पानी बह जाता है एक ही दिशा में
उसी दिशा में दौड़ते हैं होशो-हवास
उस दिशा में खड़ा है एक विखंडन
उम्मीद की चादर में अपने को छिपाए।
प्रेमकथा-3
एक आदमी प्रतिद्वंद्विता की दौड़ से बाहर हो जाता है ख़ुद
दौड़ की लाईन देखता है एक फ़िल्मी दृश्य की तरह
उसके पार जैसे कुछ है जिसे देखता वह
अकेला नहीं होता
धारण करता है दुख और शोक चुपचाप
इच्छाओं को ज़बान पर नहीं लाता
कभी-कभी वह एक रहस्य की तरह नज़र आता है
वह हँसता भी है और खाना भी खाता है।
प्रेमकथा-4
यहाँ किसी को बांधकर यातना दी जा रही है
इच्छाओं के भ्रूण फेंके जा रहे हैं
ताज़ा ख़ून की गंध से हवा बोझिल है
एक चीख़ उठकर दौड़ती है
जैसे बाहर निकल भागना चाहती है
फिर डूब जाती है अंधेरे में
उसकी गूँज अटकी रहती है
हवा में धीमे-धीमे हिलती हुई
प्रेमकथा-5
कोई भागा है चप्पलें छोड़कर
घास रौंदी हुई है
टूटी हुई चूड़ियाँ चमक रही हैं
इधर कोई चीज़ घसीटे जाने के निशान हैं
यहाँ घास ख़ून में डूबी हुई है।
प्रेमकथा-6
रात के आख़िरी पहर में
एक औरत अकेली कमरे में बैठकर कुछ सोचती है
सफ़ेद लटों से घिरा अर्थपूर्ण है उसका चेहरा
एक मनुष्य रहता आया उसके अन्दर
उसी को प्रमाणित करने में ख़र्च हुई उम्र
अब अर्जित की है प्रेम करने की योग्यता
पर अवसर अब भी नदारद है
एक व्यंग्य है परिस्थिति में
उसी को बताती है उसकी पूरी आकृति।
अकलमंदी और मूर्खता
स्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुए
पुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है
इस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता है
पुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुए
स्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है
वैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि
स्त्रियों में भी मूर्खताएँ होती हैं और पुरुषों में भी
सच तो ये है
कि मूर्खों में अक्लमंद
और अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैं
मनुष्यता ऐसी ही होती है
फिर भी अगर स्त्रियों की
अक्लमंदी पहचाननी है तो
पुरुषों की मूर्खताओं पर कैमरा फ़ोकस करना होगा।
औरत की ज़रूरत
मुझे संरक्षण नहीं चाहिए
न पिता का न भाई का न माँ का
जो संरक्षण देते हुए मुझे
कुएँ में धकेलते हैं और
मेरे रोने पर तसल्ली देने आते हैं
हवाला देते हैं अपने प्रेम का
मुझे राज्य का संरक्षण भी नहीं चाहिए
जो एक रंगारंग कार्यक्रम में
मुझे डालता है और
भ्रष्ट करता है
मुझे चाहिए एक संगठन
जिसके पास तसल्ली न हो
जो एक रास्ता हो
कठोर लेकिन सादा
जो सच्चाई की तरह खुलते हुए
मुझे खड़ा कर दे मेरे रू-ब-रू
जहाँ आराम न हो लेकिन
जोख़िम अपनी ओर खींचते हों लगातार
जहाँ नतीजे तुरन्त न मिलें
लेकिन संघर्ष छिड़ते हों लम्बे
एक लम्बा रास्ता
एक गहरा जोख़िम
रास्ते की तरह खुलती
एक जटिल सच्चाई मुझे चाहिए।