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| विपिन चौधरी |
युवा कवि विपिन
चौधरी की रचनात्मकता एक ओर जहाँ समकालीन कविता को नया ‘डाइमेंशन’ देती है, वहीं दूसरी
ओर स्त्री की सोच में पोशीदा विशेष पहलू से भी परिचय कराती है। तेज़ बारिश में केले
के पत्तों पर गिरती हुई हल्की बूँदों की तरह उनकी कविताएँ ज़्यादा शोर तो नहीं
करतीं, मगर अपने अस्तित्व का पूरा-पूरा आभास ज़रूर करा देती हैं।
सच तो यह है कि कविता जब भी कोई ‘लक्षमण-रेखा’ लाँघना चाहती है और पारम्परिक दयार से बाहर झाँकने लगती है तो विपिन
चौधरी जैसे रचनाकारों का लेखन शुरू होता है। हम इन्हें पहले भी यहाँ
पढ़ चुके हैं। आईए पढ़ते हैं विपिन चौधरी की कुछ नई और कमसिन कविताएँ : बीइंग पोएट
कपास के फूल
दुनिया के सारे गुलाब
हमने प्रेमियों को थमा दिए
हमने प्रेमियों को थमा दिए
गुलमोहर
कठफोड़वों को
कठफोड़वों को
सफ़ेद फूल
मुर्दों की तसल्ली के लिए रख छोड़े
मुर्दों की तसल्ली के लिए रख छोड़े
गोलदावदी के फूलों ने
हमारी सर्दी का इलाज़ किया
हमारी सर्दी का इलाज़ किया
चीड़ की टहनियों से
कुर्सी मेज़ बना दिए
कुर्सी मेज़ बना दिए
सूरजमुखियों को इकट्ठा कर
तेल कारखाने भेज दिया
तेल कारखाने भेज दिया
कमल
लक्ष्मी के चरणों में चढ़ा दिए
लक्ष्मी के चरणों में चढ़ा दिए
हमारे सपनों के हिस्से
कपास के सफ़ेद फूल ही आए
और आँख खुली तो सिर्फ
फूल झड़ी टहनियाँ
और आँख खुली तो सिर्फ
फूल झड़ी टहनियाँ
एक साथ तीनों
प्रेम
आत्मा का झीना वस्त्र है
आत्मा का झीना वस्त्र है
खुशबू
हवा का मीठा परिचय है
सिरफिरी कन्या सी हवा
सिर के काढ़े हुये बालो को
मोरपंखी मुकुट बना कर खिलखिलाती है
हवा का मीठा परिचय है
सिरफिरी कन्या सी हवा
सिर के काढ़े हुये बालो को
मोरपंखी मुकुट बना कर खिलखिलाती है
जीवन
वह बैचनी है
जो दोपहर के भोजन के बाद
एक मीठे पान की तलाश में भटक रही है
वह बैचनी है
जो दोपहर के भोजन के बाद
एक मीठे पान की तलाश में भटक रही है
प्रेम,
खुशबू और जीवन
तीनों एक साथ
पार्क की बैंच पर एक साथ बैठते हैं
तो एक लापता दुनिया का पता मिलता है
तीनों एक साथ
पार्क की बैंच पर एक साथ बैठते हैं
तो एक लापता दुनिया का पता मिलता है
पुकार
दूर से आती एक पुकार
बिना किसी कांट-छांट के मेरे पास पहुँचती है
बिना किसी कांट-छांट के मेरे पास पहुँचती है
दोनों हाथों से उसे थामते
हुये
सफ़ेद-मुलायम खरगोश सा भान होता है
सफ़ेद-मुलायम खरगोश सा भान होता है
इस बेशकीमती पुकार के लिये
मेरे पास
कोमल सिरहाने की टेक है
और एक मधुर ग़ज़ल
कोमल सिरहाने की टेक है
और एक मधुर ग़ज़ल
दूर से आई हुई इस पुकार को
प्रेम की पहली नज़र की
तरह देख रही हूँ
प्रेम की पहली नज़र की
तरह देख रही हूँ
फिर से मिलने के
लिए
उसने बाज़ दफा कहा
अब हम नहीं मिलेंगे
अब हम नहीं मिलेंगे
हम दुबारा मिले
फिर कभी न मिलने की
हिम्मत जुटाते हुए
फिर कभी न मिलने की
हिम्मत जुटाते हुए
यह
पुराने जीवन को
नए सिरे से जीने जैसा था
जीवन में हर बार एक नई गांठ बांध
उसे खोल देना
खुद के एक वाजिब हिस्से को जानबूझ कर गुमा देना
फिर उसे ढूँढने की जुगत लगाना
यही दुनिया है
प्रेम की
उसकी पैरेहन की
उसकी छोटी खुशियाँ
और बड़े दुखों की
पुराने जीवन को
नए सिरे से जीने जैसा था
जीवन में हर बार एक नई गांठ बांध
उसे खोल देना
खुद के एक वाजिब हिस्से को जानबूझ कर गुमा देना
फिर उसे ढूँढने की जुगत लगाना
यही दुनिया है
प्रेम की
उसकी पैरेहन की
उसकी छोटी खुशियाँ
और बड़े दुखों की
एकांत
एकांत मेरा पल्लू पकड़ कर
इस कमरे में जम गया है
इस कमरे में जम गया है
अब यहीं पर बैठे-बैठे ही
मुझे देखनी होगी
कोहरे से लदी-फदी उदास सर्द शामों को ऊंचा शामियाना
मुझे देखनी होगी
कोहरे से लदी-फदी उदास सर्द शामों को ऊंचा शामियाना
दिन की फड़कती नब्ज़
को अपनी पलकों से थामना होगा
को अपनी पलकों से थामना होगा
आलथी-पलाथी बैठे हुये
कल्पनाओं के तीरों को
यहाँ-वहाँ छोड़ना होगा
मछली की तरह खुली आँखों
से रात के सारे पहरों को पार करना होगा
कल्पनाओं के तीरों को
यहाँ-वहाँ छोड़ना होगा
मछली की तरह खुली आँखों
से रात के सारे पहरों को पार करना होगा
तारों की आपसी टकराहटों को
उसी चुप्पी की गरिमा से महसूसना होगा
उसी चुप्पी की गरिमा से महसूसना होगा
अपने भीतर की अरबों-खरबों
कोशिकाओं के बंटवारे को महसूस करती हूँ
जैसे
चुपचाप अकेले-एकांत में
कोशिकाओं के बंटवारे को महसूस करती हूँ
जैसे
चुपचाप अकेले-एकांत में
दूरियां
मेरी गर्दन
तुम्हारे कंधे
प्रेम में बस
इतना फासला ही काफी है
तुम्हारे कंधे
प्रेम में बस
इतना फासला ही काफी है
हमारी नज़दीकियों का किस्सा
प्रेम के आँगन में उतरने के बाद
हर बार एक नया आकार ले बैठता है
हर बार इस नए किस्से की नोक-पल
दुरुस्त करनी पड़ती है
प्रेम के आँगन में उतरने के बाद
हर बार एक नया आकार ले बैठता है
हर बार इस नए किस्से की नोक-पल
दुरुस्त करनी पड़ती है
जब हमारे बीच की दूरियों
को फीता
नाप नहीं सका
तो फासलों का मीलों लम्बा सिद्धांत
सिरे से जूठा पड़ गया
नाप नहीं सका
तो फासलों का मीलों लम्बा सिद्धांत
सिरे से जूठा पड़ गया
जब दूरियों ने फासलों को
मापने की कोशिश की
तो प्रेम के पाँवों पड़ा
जूता छोटा पड़ने लगा
मापने की कोशिश की
तो प्रेम के पाँवों पड़ा
जूता छोटा पड़ने लगा
वैसे भी जीवन को
प्रेम में घोल देने से
कभी अच्छा ज़ायका नहीं बन पाया
वैसे ही जैसे
लम्बे अरसे से हमने सपनों का तिलिस्म जगाया
पर वहां से कोई राजकुमार प्रकट नहीं हुआ
एक प्रेत जरूर उतरा
जिसे ठीक से हमारी नाजुक गर्दन दबानी भी नहीं आयी
प्रेम में घोल देने से
कभी अच्छा ज़ायका नहीं बन पाया
वैसे ही जैसे
लम्बे अरसे से हमने सपनों का तिलिस्म जगाया
पर वहां से कोई राजकुमार प्रकट नहीं हुआ
एक प्रेत जरूर उतरा
जिसे ठीक से हमारी नाजुक गर्दन दबानी भी नहीं आयी
मेरा गीत
चिड़ियों के शकल में होगा
मैं अपने एकांत को
गर्म रेगिस्तान में रोप
दूर तक पसरे हुये रेत में बैठ
इंतज़ार करूंगी
गर्म रेगिस्तान में रोप
दूर तक पसरे हुये रेत में बैठ
इंतज़ार करूंगी
मेरा प्रेम
कविता की
शक्ल में होगा
कविता की
शक्ल में होगा
गीत
चिड़ियों की शकल में
चिड़ियों की शकल में
जीवन
मेरी दायीं कलाई के इर्द-गिर्द घूमेगा
जो देर तक तुम्हारे
पकड़े रहने की वजह से अभी भी रक्तिम आभा में है
मेरी दायीं कलाई के इर्द-गिर्द घूमेगा
जो देर तक तुम्हारे
पकड़े रहने की वजह से अभी भी रक्तिम आभा में है
तुम्हें आज बता ही दूँ कि
तुम्हारे चले जाने के बाद
मैं एक जिद्दी धुन में बदल जाती हूँ
और तुम्हारी स्मृति
एक घासलेटी आखेट में
तुम्हारे चले जाने के बाद
मैं एक जिद्दी धुन में बदल जाती हूँ
और तुम्हारी स्मृति
एक घासलेटी आखेट में
प्रेम में
चुप्पी
चुप्पी का कोई मसीहा नहीं
जैसे
और न ख़ुशी की कोई जमीन
और न ख़ुशी की कोई जमीन
एक जीवित अभिव्यक्ति की
तरह चुप्पी
अद्रश्य पुल पर सधे क़दमों से चलती हुयी
चुपचाप से अपना काम कर लौट जाती है
अद्रश्य पुल पर सधे क़दमों से चलती हुयी
चुपचाप से अपना काम कर लौट जाती है
आँखों में एक सितारा टूटने
और था
मन भीतर एकतारा बजने का सबब यही
चुप्पी रही थी
मन भीतर एकतारा बजने का सबब यही
चुप्पी रही थी
चुप्पी के पदचापों से जहां
पर भी गड्ढे पड़े
बस वहीं प्रेम का शीतल जल इकट्ठा हुआ
बस वहीं प्रेम का शीतल जल इकट्ठा हुआ
चुप्पी की मीठी घंटियाँ
इन्ही मांसल कानों से सुनी
इन्ही मांसल कानों से सुनी
जो एक ऊँची पहाड़ी चोटी से
कदम दर कदम धरती
मेरे कानों के ठीक नज़दीक आयी
कदम दर कदम धरती
मेरे कानों के ठीक नज़दीक आयी
क्योंकि चुप्पी के बाद
सिर्फ संगीत ही
प्रेम के नज़दीक आ सकता है
सिर्फ संगीत ही
प्रेम के नज़दीक आ सकता है
दुनिया से बाहर
प्रेम में पगी हुई
दो आत्माएँ
एक दुनिया में प्रवेश करती है
दो आत्माएँ
एक दुनिया में प्रवेश करती है
उस दुनिया में
जहां कुछ भी करीने से नहीं है
दुनिया के पायदान पर
पैर रखते ही
दोनों आत्माओं में
खींच-तान शुरू हो जाती है
जहां कुछ भी करीने से नहीं है
दुनिया के पायदान पर
पैर रखते ही
दोनों आत्माओं में
खींच-तान शुरू हो जाती है
पहले दोनों के कंधे से
कंधे भिड़ते हैं
फिर एक दूसरे के सिर से सिर टकराते हैं
एक वक़्त के बाद उनके भीतर के बर्तन
एक दूसरे के ऊपर ढहने लगते हैं
फिर एक दूसरे के सिर से सिर टकराते हैं
एक वक़्त के बाद उनके भीतर के बर्तन
एक दूसरे के ऊपर ढहने लगते हैं
कभी उनके बीच इतनी नजदीकी
थी की
दोनों तरफ से आती साँसो को
अलग-अलग पगडंडियाँ ना मिल सके
आज इस दुनिया में आकर
दो जन्मों जैसी दूरी
उनके बीच आ विराजी
दोनों तरफ से आती साँसो को
अलग-अलग पगडंडियाँ ना मिल सके
आज इस दुनिया में आकर
दो जन्मों जैसी दूरी
उनके बीच आ विराजी
जल्दी ही
दोनों आत्माएँ
हड़बड़ाते हुये इस पकी-पकाई दुनिया से
एक साथ ही बाहर लौट गई
दोनों आत्माएँ
हड़बड़ाते हुये इस पकी-पकाई दुनिया से
एक साथ ही बाहर लौट गई
बारीक ध्वनियों
का बैचननामा है कविता
एक लंबी बेचैनी से गुजरते
हुये
कई ध्वनियाँ चुपके से साथ हो लेती हैं
कई ध्वनियाँ चुपके से साथ हो लेती हैं
बाहर जो कुछ भी
अड्गम-सड्गम सुनाई देता है
उसे एक कोने में धकेलते हुये
उसे एक कोने में धकेलते हुये
सुबह मेरी और आईने के बीच
की मूक बातचीत
बगीचे को पानी की फुहारों का दर्शन करवाते हुये
पानी और पेड़-पत्तों के आस-पास बिखरी हुई
जो रंग-बिरंगी ध्वनियाँ थिरक रही होती हैं और
भूखी प्यासी
चिड़ियों को दाना-पानी
देते वक़्त
शुक्रिया की जो महीन आवाज़े वे भी और
बगीचे को पानी की फुहारों का दर्शन करवाते हुये
पानी और पेड़-पत्तों के आस-पास बिखरी हुई
जो रंग-बिरंगी ध्वनियाँ थिरक रही होती हैं और
भूखी प्यासी
चिड़ियों को दाना-पानी
देते वक़्त
शुक्रिया की जो महीन आवाज़े वे भी और
न जाने कितनी ही
ध्वनियों कविता में रूपांतरित हो
उकड़ू बैठ जाती हैं
ध्वनियों कविता में रूपांतरित हो
उकड़ू बैठ जाती हैं
एक सुंदर कविता
इन्हीं ध्वनियों का बैचैननामा ही तो है
इन्हीं ध्वनियों का बैचैननामा ही तो है

हमेशा की तरह बेहतरीन ...आपकी कविताओं में 'प्रेम का रंग'अलग तरह का होता है ...रूमानियत के साथ साथ जिन्दगी से भी मुकाबिल होता हुआ ..बधाई विपिन आपको
ReplyDeleteबेहद खूबसुरती से संजोये गये शब्दो से सुन्दर भाव की कविताये बहुत अच्छी लगी आपका आभार..............।
ReplyDelete'जीवन वह बैचनी है जो दोपहर के भोजन के बादएक मीठे पान की तलाश में भटक रही है '.
ReplyDelete'अपने भीतर की अरबों-खरबों कोशिकाओं के बंटवारे को महसूस करती हूँ जैसे चुपचाप अकेले-एकांत में'
आपकी पहले की कई कविताओं से ज़्यादा सजीव, सच्ची और संजीदा कविताएं..
लिखते रहिए..पढ़ाते रहिए...
bhavuk privesh ko ujagar karti kavitanyen....
ReplyDeleteबधाई विपिन जी, अच्छी कविताएं हैं... शुभकामनाएं।
ReplyDeleteइधर हर बार तुम चौंका रही हो विपिन..भाषा सधती जा रही है और कवितायें मानीखेज होती जा रही हैं. तुम्हारे संकलन की बेचैनी से प्रतीक्षा है.
ReplyDeleteकवितायेँ बहुत अच्छी हैं. भोगी हुई बेचैनी और चुप्पी को कविता में ट्रांसमिट करना बहुत बड़ा काम है
ReplyDeleteकवितायें इस पते तक ले आई हैं।
ReplyDeleteमैंने अपनी इस शाम को सुंदर बना लिया है, इस सुंदरता का माध्यम है बीईंग पोएट और सुंदर है वह मन जिसने ज़िंदगी की असली शक्ल पर अपनी उदारता का रंग फेरा है। मुझे कविताओं का सुघड़ होना जितना प्रिय है उतना ही इनका ट्रीटमेंट भी कि कविता अपने कथ्य के साथ आरोहण करती हैं।
बहुत शुक्रिया विपिन, बहुत शुक्रिया बीईंग पोएट
behad mulayam kavitayen.
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया विपिन, बहुत शुक्रिया बीईंग पोएट.....bipin jee ki kavitaye maine padi..kya rhythm hota ha..
ReplyDeleteBehad khoobsoorat kavitayein Vipin ji, sachmuch narm, narmdil, bahut pukhta baatein lekin, kahan adbhut, bahut shukriya
ReplyDelete