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| परवीन शाकिर |
आज उर्दू की मशहूर शायरा परवीन शाकिर (24 नवंबर 1952
- 26 दिसंबर 1994) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर
पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई
की
उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की
उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़
दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
वो कहीं भी गया लौटा तो
मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की
तेरा पहलू तेरे दिल की तरह
आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की
उस ने जलती हुई पेशानी पे
जो हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की
2.
अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ,
बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई
और बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई
काँप उठती हूँ मैं सोच कर
तन्हाई में
मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई
मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई
जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे
रेज़ा-रेज़ा
इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई
इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई
अब तो इस राह से वो शख़्स
गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई
कोई आहट,
कोई आवाज़, कोई छाप नहीं
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान है आए कोई
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान है आए कोई
3.
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ
था तेरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
बात वो आधी रात की रात वो
पूरे चाँद की
चाँद भी ऐन चेत का उस पे तेरा जमाल भी
चाँद भी ऐन चेत का उस पे तेरा जमाल भी
सब से नज़र बचा के वो मुझ
को ऐसे देखते
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी
दिल तो चमक सकेगा क्या फिर
भी तराश के देख लो
शीशागरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी
शीशागरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी
उस को न पा सके थे जब दिल
का अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिये बात थी कुछ मुहाल भी
अब जो पलट के देखिये बात थी कुछ मुहाल भी
मेरी तलब था एक शख़्स वो
जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी
शाम की नासमझ हवा पूछ रही
है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मेरा ख़याल भी
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मेरा ख़याल भी
उस के ही बाज़ूओं में और
उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी
4.
वो तो ख़ुशबू है हवाओं में
बिखर जायेगा
मसला फूल का है फूल किधर जायेगा
मसला फूल का है फूल किधर जायेगा
हम तो समझे थे के एक
ज़ख़्म है भर जायेगा
क्या ख़बर थी के रग-ए-जाँ में उतर जायेगा
क्या ख़बर थी के रग-ए-जाँ में उतर जायेगा
वो हवाओं की तरह ख़ानाबजाँ
फिरता है
एक झोंका है जो आयेगा गुज़र जायेगा
एक झोंका है जो आयेगा गुज़र जायेगा
वो जब आयेगा तो फिर उसकी
रफ़ाक़त के लिये
मौसम-ए-गुल मेरे आँगन में ठहर जायेगा
मौसम-ए-गुल मेरे आँगन में ठहर जायेगा
आख़िर वो भी कहीं रेत पे
बैठी होगी
तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जायेगा
तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जायेगा
5.
चाँद उस देस में निकला कि
नहीं
जाने वो आज भी सोया कि नहीं
जाने वो आज भी सोया कि नहीं
भीड़ में खोया हुआ बच्चा
था
उसने खुद को अभी ढूँढा कि नहीं
उसने खुद को अभी ढूँढा कि नहीं
मुझको तकमील समझने वाला
अपने मैयार में बदला कि नहीं
अपने मैयार में बदला कि नहीं
गुनगुनाते हुए लम्हों में
उसे
ध्यान मेरा कभी आया कि नहीं
ध्यान मेरा कभी आया कि नहीं
बंद कमरे में कभी मेरी तरह
शाम के वक़्त वो रोया कि नहीं
शाम के वक़्त वो रोया कि नहीं

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