![]() |
| मुनव्वर राना |
आज उर्दू के मशहूर शायर मुनव्वर राना (जन्म : 26 नवंबर 1952) की जन्मतिथि है। बीइंग पोएट की ओर से मुबारक़। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, बदन सराय, नीम के फूल, सब उसके लिए, घर अकेला हो गया, कहो ज़िल्ले इलाही से, बग़ैर नक़्शे का मकान, फिर कबीर, नए मौसम के फूल वग़ैरह इनकी किताबें हैं। इस मौक़े पर पेश हैं
कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
आँखों को इंतज़ार की भट्टी
पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया
आओ तुम्हें दिखाते हैं
अंजामे-ज़िंदगी
सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया
सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया
फिर भी न दूर हो सकी आँखों
से बेवगी
मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया
मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया
दुनिया क्या ख़बर इसे कहते
हैं शायरी
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया
अंदर की टूट -फूट छिपाने
के वास्ते
जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया
जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया
घर की ज़रूरतों के लिए
अपनी उम्र को
बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया
बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया
पिछला निशान जलने का मौजूद
था तो फिर
क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया
क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया
2.
इतनी तवील उम्र को जल्दी
से काटना
जैसे दवा की पन्नी को कैंची से काटना
जैसे दवा की पन्नी को कैंची से काटना
छत्ते से छेड़छाड़ की आदत
मुझे भी है
सीखा है मैंने शहद की मक्खी से काटना
सीखा है मैंने शहद की मक्खी से काटना
इन्सान क़त्ल करने के जैसा
तो ये भी है
अच्छे-भले शजर को कुल्हाड़ी से काटना
अच्छे-भले शजर को कुल्हाड़ी से काटना
पानी का जाल बुनता है
दरिया तो फिर बुने
तैराक जानता है हथेली से काटना
तैराक जानता है हथेली से काटना
रहता है दिन में रात के
होने का इंतज़ार
फिर रात को दवाओं की गोली से काटना
फिर रात को दवाओं की गोली से काटना
ये फ़न कोई फ़क़ीर सिखाएगा
आपको
हीरे को एक फूल की पत्ती से काटना
हीरे को एक फूल की पत्ती से काटना
मुमकिन है मैं दिखाई पड़ूँ
एक दिन तुम्हें
यादों का जाल ऊन की तीली से काटना
यादों का जाल ऊन की तीली से काटना
इक उम्र तक बज़ुर्गों के
पैरों मे बैठकर
पत्थर को मैंने सीखा है पानी से काटना
पत्थर को मैंने सीखा है पानी से काटना
3.
कई घरों को निगलने के बाद
आती है
मदद भी शहर के जलने के बाद आती है
मदद भी शहर के जलने के बाद आती है
न जाने कैसी महक आ रही है
बस्ती में
वही जो दूध उबलने के बाद आती है
वही जो दूध उबलने के बाद आती है
नदी पहाड़ों से मैदान में
तो आती है
मगर ये बर्फ़ पिघलने के बाद आती है
मगर ये बर्फ़ पिघलने के बाद आती है
वो नींद जो तेरी पलकों के
ख़्वाब बुनती है
यहाँ तो धूप निकलने के बाद आती है
यहाँ तो धूप निकलने के बाद आती है
ये झुग्गियाँ तो ग़रीबों
की ख़ानक़ाहें हैं
कलन्दरी यहाँ पलने के बाद आती है
कलन्दरी यहाँ पलने के बाद आती है
गुलाब ऎसे ही थोड़े गुलाब
होता है
ये बात काँटों पे चलने के बाद आती है
ये बात काँटों पे चलने के बाद आती है
शिकायतें तो हमें
मौसम-ए-बहार से है
खिज़ाँ तो फूलने-फलने के बाद आती है
खिज़ाँ तो फूलने-फलने के बाद आती है
4.
गले मिलने को आपस में
दुआएँ रोज़ आती हैं
अभी मस्ज़िद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
अभी मस्ज़िद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
अभी रोशन हैं चाहत के दीये
हम सबकी आँखों में
बुझाने के लिये पागल हवाएँ रोज़ आती हैं
बुझाने के लिये पागल हवाएँ रोज़ आती हैं
कोई मरता नहीं है,
हाँ मगर सब टूट जाते हैं
हमारे शहर में ऎसी वबाएँ रोज़ आती हैं
हमारे शहर में ऎसी वबाएँ रोज़ आती हैं
अभी दुनिया की चाहत ने मिरा
पीछा नहीं छोड़ा
अभी मुझको बुलाने दाश्ताएँ रोज़ आती हैं
अभी मुझको बुलाने दाश्ताएँ रोज़ आती हैं
ये सच है नफ़रतों की आग ने
सब कुछ जला डाला
मगर उम्मीद की ठंडी हवाएँ रोज़ आती हैं
मगर उम्मीद की ठंडी हवाएँ रोज़ आती हैं
5.
जब भी कश्ती मेरी सैलाब
में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
रोज़ मैं अपने लहू से उसे
ख़त लिखता हूँ
रोज़ उंगली मेरी तेज़ाब में आ जाती है
रोज़ उंगली मेरी तेज़ाब में आ जाती है
दिल की गलियों से तेरी याद
निकलती ही नहीं
सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है
सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है
रात भर जागते रहने का सिला
है शायद
तेरी तस्वीर-सी महताब में आ जाती है
तेरी तस्वीर-सी महताब में आ जाती है
एक कमरे में बसर करता है
सारा कुनबा
सारी दुनिया दिले- बेताब में आ जाती है
सारी दुनिया दिले- बेताब में आ जाती है
ज़िन्दगी तू भी भिखारिन की
रिदा ओढ़े हुए
कूचा-ए-रेशमो-किमख़्वाब में आ जाती है
कूचा-ए-रेशमो-किमख़्वाब में आ जाती है
दुख किसी का हो छलक उठती
हैं मेरी आँखें
सारी मिट्टी मिरे तालाब में आ जाती है
सारी मिट्टी मिरे तालाब में आ जाती है
6.
जहां तक हो सका हमने
तुम्हें परदा कराया है
मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है
मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है
चमक यूं ही नहीं आती है
खुद्दारी के चेहरे पर
अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है
अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है
बड़ी मुद्दत पे खायी हैं
खुशी से गालियाँ हमने
बड़ी मुद्दत पे उसने आज मुंह मीठा कराया है
बड़ी मुद्दत पे उसने आज मुंह मीठा कराया है
बिछड़ना उसकी ख्वाहिश थी न
मेरी आरजू लेकिन
जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है
जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है
कहीं परदेस की रंगीनियों
में खो नहीं जाना
किसी ने घर से चलते वक्त ये वादा कराया है
किसी ने घर से चलते वक्त ये वादा कराया है
खुदा महफूज रखे मेरे
बच्चों को सियासत से
ये वो औरत है जिसने उम्र भर पेशा कराया है
ये वो औरत है जिसने उम्र भर पेशा कराया है
7.
थकी-मांदी हुई बेचारियाँ
आराम करती हैं
न छेड़ो ज़ख़्म को बीमारियाँ आराम करती हैं
न छेड़ो ज़ख़्म को बीमारियाँ आराम करती हैं
सुलाकर अपने बच्चे को यही
हर माँ समझती है
कि उसकी गोद में किलकारियाँ आराम करती हैं
कि उसकी गोद में किलकारियाँ आराम करती हैं
किसी दिन ऎ समुन्दर झांक
मेरे दिल के सहरा में
न जाने कितनी ही तहदारियाँ आराम करती हैं
न जाने कितनी ही तहदारियाँ आराम करती हैं
अभी तक दिल में रोशन हैं
तुम्हारी याद के जुगनू
अभी इस राख में चिन्गारियाँ आराम करती हैं
अभी इस राख में चिन्गारियाँ आराम करती हैं
कहां रंगों की आमेज़िश की
ज़हमत आप करते हैं
लहू से खेलिये पिचकारियाँ आराम करती हैं
लहू से खेलिये पिचकारियाँ आराम करती हैं
8.
नुमाइश के लिए गुलकारियाँ
दोनों तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
मुलाक़ातों पे हँसते,
बोलते हैं, मुस्कराते हैं
तबीयत में मगर बेज़ारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
तबीयत में मगर बेज़ारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
खुले रखते हैं दरवाज़े
दिलों के रात-दिन दोनों
मगर सरहद पे पहरेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
मगर सरहद पे पहरेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
उसे हालात ने रोका मुझे
मेरे मसायल[ ने
वफ़ा की राह में दुश्वारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
वफ़ा की राह में दुश्वारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
मेरा दुश्मन मुझे तकता है,
मैं दुश्मन को तकता हूँ
कि हायल राह में किलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
कि हायल राह में किलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
मुझे घर भी बचाना है वतन
को भी बचाना है
मिरे कांधे पे ज़िम्मेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
मिरे कांधे पे ज़िम्मेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
9.
पैरों में मिरे दीद-ए-तर बांधे
हुए हैं
ज़ंजीर की सूरत मुझे घर बांधे हुए हैं
ज़ंजीर की सूरत मुझे घर बांधे हुए हैं
हर चेहरे में आता है नज़र
एक ही चेहरा
लगता है कोई मेरी नज़र बांधे हुए हैं
लगता है कोई मेरी नज़र बांधे हुए हैं
बिछड़ेंगे तो मर जायेंगे
हम दोनों बिछड़ कर
इक डोर में हमको यही डर बांधे हुए हैं
इक डोर में हमको यही डर बांधे हुए हैं
परवाज़ की ताक़त भी नहीं
बाक़ी है लेकिन
सय्याद अभी तक मिरे पर बांधे हुए हैं
सय्याद अभी तक मिरे पर बांधे हुए हैं
आँखें तो उसे घर से निकलने
नहीं देतीं
आंसू हैं कि सामाने-सफ़र बांधे हुए हैं
आंसू हैं कि सामाने-सफ़र बांधे हुए हैं
हम हैं कि कभी ज़ब्त का
दामन नहीं छोड़ा
दिल है कि धड़कने पर कमर बंधे हुए है
दिल है कि धड़कने पर कमर बंधे हुए है
10.
मेरी ख़्वाहिश है कि फिर
से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ
कम-से कम बच्चों के होठों
की हंसी की ख़ातिर
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
सोचता हूँ तो छलक उठती हैं
मेरी आँखें
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊँ
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊँ
चारागर तेरी महारथ पे
यक़ीं है लेकिन
क्या ज़रूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊँ
क्या ज़रूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊँ
बेसबब इश्क़ में मरना मुझे
मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊँ
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊँ
शायरी कुछ भी हो रुसवा
नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊँ
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊँ

Heere ko ek phool ki patti se kaatna, Irshad!! Usse bhi umda, Mehandi ne saara khoon hatheli pe rakh diya, behad khoobsoorat nazmein Rana ji ki, padhwane ke liye shukriya
ReplyDelete