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Monday, November 05, 2012

आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?

पंडित नरेन्द्र शर्मा
आज प्रस्तुत हैं लोकप्रिय कवि और गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा (28 फरवरी 1913 - 11 फरवरी 1989) के गीत। लगभग 55 फ़िल्मों में 650 गीत और 'महाभारत' का पटकथा-लेखन और गीत-रचना करने वाले  पंडित नरेंद्र शर्मा ने 17 कविता-संग्रह और एक कहानी-संग्रह सहित कई अन्य पुस्तकों से भी साहित्य को समृद्ध किया। : बीइंग पोएट  
नैना दीवाने एक नहीं माने
हुए है पराये मन हार आये
मन का मरम जाने ना माने ना माने ना नैना दीवाने
जाना ना जाना मन ही ना जाना
चितवन का मन बनता निशाना
कैसा निशाना कैसा निशाना ,
मन ही पहचाने ना, माने ना माने ना नैना दीवाने
जीवन बेली करे अठखेली महके मन के बकुल
प्रीति फूल फूले झूला झूले, चहके बन बुलबुल,
महके मन के बकुल
मन क्या जाने, क्या होगा कल धार समय की बहती पलपल,
जीवन चँचल जीवन चँचल, दिन जाके फिर आने ना
माने ना माने ना नैना दीवाने
चलो हम दोनों चलें वहां
भरे जंगल के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।
जहां दिन भर महुआ पर झूल, रात को चू पड़ते हैं फूल,
बांस के झुरमुट में चुपचाप, जहां सोये नदियों के कूल;
हरे जंगल के बीचो बीच
,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।
विहंग मृग का ही जहां निवास, जहां अपने धरती आकाश,
प्रकृति का हो हर कोई दास, न हो पर इसका कुछ आभास,
खरे जंगल के के बीचो बीच
,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।
तुम भी बोलो, क्या दूँ रानी
पगली इन क्षीण बाहुओं में
कैसे यों कस कर रख लोगी
एक, एक एक क्षण को केवल थे मिले प्रणय के चपल श्वास
भोली हो, समझ लिया तुमने सब दिन को अब गुंथ गये पाश
स्वच्छंद सदा मै मारुत-सा
वश में तुम कैसे कर लोगी
लतिकाओं के नित तोड पाश उठते ईस उपवन के रसाल
ठुकरा चरणाश्रित लहरों को उड जाते मानस के मराल
फिर कहो, तुम्हारी मिलन रात
ही कैसे सब दिन की होगी
मै तो चिर-पथिक प्रवासी हू, था ईतना ही निवास मेरा
रोकर मत रोको राह, विवश यह पारद-पद जीवन मेरा
राका तो एक चरण रानी
पूनों थी, मावश भी होगी
जीवन भर कभी न भूलूँगा उपहार तुम्हारे वे मधुमय
वह प्रथम मिलन का प्रिय चुम्बन यह अश्रु-हार अब विदा समय
तुम भी बोलो, क्या दूँ रानी
सुधि लोगी, या सपने लोगी
सूरज डूब गया बल्ली भर
सूरज डूब गया बल्ली भर-
सागर के अथाह जल में।
एक बाँस भर उठ आया है-
चांद, ताड के जंगल में।
अगणित उंगली खोल, ताड के पत्र, चांदनी में डोले,
ऐसा लगा, ताड का जंगल सोया रजत-छत्र खोले
कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ
हो आया, आज एक पल में।
बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता,
बनता मन का मुकुर सिंधु, जो गरज-गरज कर कुछ कहता,
शशि बनकर मन चढा गगन पर,
रवि बन छिपा सिंधु तल में।
परिक्रमा कर रहा किसी की, मन बन चांद और सूरज,
सिंधु किसी का हृदय-दोल है, देह किसी की है भू-रज
मन को खेल खिलाता कोई,
निशि दिन के छाया-छल में।
नींद उचट जाती है
जब-तब नींद उचट जाती है
पर क्‍या नींद उचट जाने से
रात किसी की कट जाती है?
देख-देख दु:स्‍वप्‍न भयंकर, चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर;
पर भीतर के दु:स्‍वप्‍नों से अधिक भयावह है तम बाहर!
आती नहीं उषा, बस केवल
आने की आहट आती है!
देख अँधेरा नयन दूखते, दुश्चिंता में प्राण सूखते!
सन्‍नाटा गहरा हो जाता, जब-जब श्‍वन श्रृगाल भूँकते!
भीत भवना, भोर सुनहली
नयनों के न निकट लाती है!
मन होता है फिर सो जाऊँ, गहरी निद्रा में खो जाऊँ;
जब तक रात रहे धरती पर, चेतन से फिर जड़ हो जाऊँ!
उस करवट अकुलाहट थी, पर
नींद न इस करवट आती है!
करवट नहीं बदलता है तम, मन उतावलेपन में अक्षम!
जगते अपलक नयन बावले, थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम!
साँस आस में अटकी, मन को
आस रात भर भटकाती है!
जागृति नहीं अनिद्रा मेंरी, नहीं गई भव-निशा अँधेरी!
अंधकार केंद्रित धरती पर, देती रही ज्‍योति च‍कफेरी!
अंतर्यानों के आगे से
शिला न तम की हट पाती है!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
सत्य हो यदि, कल्प की भी कल्पना कर, धीर बांधूँ,
किन्तु कैसे व्यर्थ की आशा लिये, यह योग साधूँ!
जानता हूँ, अब न हम तुम मिल सकेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
आयेगा मधुमास फिर भी, आयेगी श्यामल घटा घिर,
आँख भर कर देख लो अब, मैं न आऊँगा कभी फिर!
प्राण तन से बिछुड़ कर कैसे रहेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
अब न रोना, व्यर्थ होगा, हर घड़ी आँसू बहाना,
आज से अपने वियोगी, हृदय को हँसना सिखाना,
अब न हँसने के लिये, हम तुम मिलेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
आज से हम तुम गिनेंगे एक ही नभ के सितारे
दूर होंगे पर सदा को, ज्यों नदी के दो किनारे
सिन्धुतट पर भी न दो जो मिल सकेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
तट नदी के, भग्न उर के, दो विभागों के सदृश हैं,
चीर जिनको, विश्व की गति बह रही है, वे विवश है!
आज अथइति पर न पथ में, मिल सकेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
यदि मुझे उस पार का भी मिलन का विश्वास होता,
सच कहूँगा, न मैं असहाय या निरुपाय होता,
किन्तु क्या अब स्वप्न में भी मिल सकेंगे?
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
आज तक हुआ सच स्वप्न, जिसने स्वप्न देखा?
कल्पना के मृदुल कर से मिटी किसकी भाग्यरेखा?
अब कहाँ सम्भव कि हम फिर मिल सकेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
आह! अन्तिम रात वह, बैठी रहीं तुम पास मेरे,
शीश कांधे पर धरे, घन कुन्तलों से गात घेरे,
क्षीण स्वर में कहा था, "अब कब मिलेंगे?"
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
"कब मिलेंगे", पूछ्ता मैं, विश्व से जब विरह कातर,
"कब मिलेंगे", गूँजते प्रतिध्वनिनिनादित व्योम सागर,
"कब मिलेंगे", प्रश्न उत्तर "कब मिलेंगे"!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?

Friday, October 12, 2012

निदा फ़ाज़ली की जन्मतिथि !

निदा फ़ाज़ली
आज मशहूर शायर और हिंदी सिनेमा के गीतकार मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली (जन्म : 12 अक्तूबर 1938) की जन्मतिथि है। आपको 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। प्रमुख काव्य-संग्रह आँखों भर आकाश, मौसम आते जाते हैं, खोया हुआ सा कुछ, लफ़्ज़ों के फूल, मोर नाच, आँख और ख़्वाब के दरमियाँ, सफ़र में धूप तो होगी हैं। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट  
1.
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं
मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं
मेरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी है
मुझे सम्भाल के रखना बिखर न जाऊँ मैं
मेरे मिज़ाज में बे-मानी उलझनें हैं बहुत
मुझे उधर से बुलाना जिधर न जाऊँ मैं
कहीं पुकार न ले गहरी वादियों का सबूत
किसी मक़ाम पे आकर ठहर न जाऊँ मैं
न जाने कौन से लम्हे की बद-दुआ है ये
क़रीब घर के रहूँ और घर न जाऊँ मैं
2.
ज़हानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिला
जिसे निगाह मिली उसको इंतज़ार मिला
वो कोई राह का पत्थर हो या हसीं मंज़र
जहाँ से रास्ता ठहरा वहीं मज़ार मिला
कोई पुकार रहा था खुली फ़िज़ाओं से
नज़र उठाई तो चारो तरफ़ हिसार मिला
हर एक साँस न जाने थी जुस्तजू किसकी
हर एक दयार मुसाफ़िर को बेदयार मिला
ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई
जो आदमी भी मिला बनके इश्तहार मिला
3.
चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए
सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए
मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए
कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब-ए-रवाँ से सुनिए
चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए
4.
देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ
होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ
साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ
फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ
धुँधली सी एक याद किसी क़ब्र का दिया
और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ
5.
बात कम कीजे ज़ेहानत को छुपाए रहिए
अजनबी शहर है ये, दोस्त बनाए रहिए
दुश्मनी लाख सही, ख़त्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाए रहिए
ये तो चेहरे की शबाहत हुई तक़दीर नहीं
इस पे कुछ रंग अभी और चढ़ाए रहिए
ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है
जिस जगह रहिए वहाँ मिलते मिलाते रहिए
कोई आवाज़ तो जंगल में दिखाए रस्ता
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजाए रहिए
6.
मुहब्बत में वफ़ादारी से बचिये
जहाँ तक हो अदाकारी से बचिये
हर एक सूरत भली लगती है कुछ दिन
लहू की शोबदाकारी से बचिये
शराफ़त आदमियत दर्द-मन्दी
बड़े शहरों में बीमारी से बचिये
ज़रूरी क्या हर एक महफ़िल में आना
तक़ल्लुफ़ की रवादारी से बचिये
बिना पैरों के सर चलते नहीं हैं
बुज़ुर्गों की समझदारी से बचिये
7.
जाने वालों से राब्ता रखना
दोस्तो रस्म-ए-फातिहा रखना
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की कुछ जगह रखना
मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए
अपने घर में कहीं खुदा रखना
जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तन्हाईयाँ बचा रखना
उमर करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना
8.
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समंदर मेरा
किससे पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ बरसों से
हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा
एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा
मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा
आईना देखके निकला था मैं घर से बाहर
आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा
9.
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही
दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही
चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें
ज़िन्दगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही
इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही
फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को
दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही
शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की फ़ुरसत
अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने-हँसाने से रही
10.
ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा भिकारी क्या
वो हर दीदार में ज़रदार है गोटा किनारी क्या
ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते
नदी के पानियों के सामने आरी कटारी क्या
उसी के चलने-फिरने, हंसने-रोने की हैं तस्वीरें
घटा क्या, चाँद क्या, संगीत क्या, बाद-ए-बहारी क्या
किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या
हमारा मीर जी से मुत्तफ़िक़ होना है नामुमकिन
उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का-भारी क्या

Monday, October 01, 2012

मजरूह सुल्तानपुरी की जन्मतिथि !

मजरूह सुल्तानपुरी
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार और शायर मजरूह सुल्तानपुरी (01 अक्तूबर 1919 - 24 मई 2000) की जन्मतिथि है। मजरूह ने चार दशक से भी ज्यादा लंबे सिने करियर में करीब 300 फ़िल्मों के लिए लगभग 4000 गीतों की रचना की। ख़ासकर फिर तीसरी मंजिल’, ‘बहारों के सपने’, ‘प्यार का मौसम’, ‘कारवां’, ‘यादों की बारात’, ‘हम किसी से कम नहींऔर जमाने को दिखाना हैफ़िल्मों के गीत ज़्यादा लोकप्रिय हैं। 1964 मे प्रदर्शित फ़िल्म दोस्तीका गीत चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’, के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फ़िल्मफेयर मिला। इसके अलावा, मजरूह सुल्तानपुरी को 1993 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह
इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम
हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह
वो तो हैं कहीं और मगर दिल के आस पास
फिरती है कोई शय निगाह-ए-यार की तरह
सीधी है राह-ए-शौक़ प यूँ ही कभी कभी
ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह
अब जा के कुछ खुला हुनर-ए-नाखून-ए-जुनून
ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह
'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह
2.
हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज़ियादा
चाक किए हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज़ियादा
चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है
एक मौसम था हमको रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज़ियादा
जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो
ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज़ियादा
हम भी हमेशा क़त्ल हुए और तुमने भी देखा दूर से लेकिन
ये न समझे हमको हुआ है जान का नुकसाँ तुमसे ज़ियादा
ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो 'मजरूह' मगर हम
कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज़ियादा
3.
मुझे सहल हो गईं मंजिलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गए
वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी जुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए
वही बात जो न वो कह सके मिरे शेर-ओ-नज़्मे आ गई
वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दहे-शराब में ढ़ल गए
तुझे चश्मे-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज्म है
तुझे तश्मे-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए
उन्हें कब के रास भी आ चुके तिरी बज़्मे-नाज़े के हादिसे
अब उठे कि तेरी नज़र फिरे जो गिरे थे गर के संभल गए
मिरे काम आ गई आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें
बढी इस क़दर मिरी मंजिलें कि क़दम के खार निकल गए
4.
मसर्रतों को ये अहले-हवस न खो देते
जो हर ख़ुशी में तेरे ग़म को भी समो देते
कहां वो शब कि तेरे गेसुओं के साए में
ख़याले-सुबह से आस्ती भिगो देते
बहाने और भी होते जो ज़िन्दगी के लिए
हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते
बचा लिया मुझे तूफां की मौज नें वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मेरा डुबो देते
जो देखते मेरी नज़रो पे बंदिशों के सितम
तो ये नज़ारे मेरी बेबसी पे रो देते
कभी तो यूं भी उमड़ते सरश्के-ग़म 'मजरूह'
कि मेरे ज़ख़्मे-तमन्ना के दाग़ धो देते
5.
निगाह-ए-साक़ी-ए-नामहरबाँ ये क्या जाने
कि टूट जाते हैं ख़ुद दिल के साथ पैमाने
मिली जब उनसे नज़र बस रहा था एक जहाँ
हटी निगाह तो चारों तरफ़ थे वीराने
हयात लग़्ज़िशे-पैहम का नाम है साक़ी
लबों से जाम लगा भी सकूँ ख़ुदा जाने
वो तक रहे थे हमीं हँस के पी गए आँसू
वो सुन रहे थे हमीं कह सके न अफ़साने
ये आग और नहीं दिल की आग है नादाँ
चिराग़ हो के न हो जल बुझेंगे परवाने
फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल न पूछिये मजरूह
शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने
6.
दुश्मनों की दोस्ती है अब अहले वतन के साथ
है अब खिजाँ चमन मे नए पैराहन के साथ
सर पर हवाए जुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बांकपन के साथ
किसने कहा कि टूट गया खंज़रे-फिरंग
सीने पे ज़ख़्मे-नौ भी है दाग़-ए-कुहन के साथ
झोंके जो लग रहे हैं नसीम-ए-बहार के
जुम्बिश में है क़फ़स भी असीर-ए-चमन के साथ
मजरूह क़ाफ़िले कि मेरे दास्ताँ ये है
रहबर ने मिल के लूट लिया राहजन के साथ
7.
जला के मशाल-ए-जान हम जुनूं सिफ़ात चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले
दयार-ए-शाम नहीं, मंजिल-ए-सहर भी नहीं
अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले
हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक
ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले
सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चिराग
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले
बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नकद-ए-वफ़ा
अगरचे लुटते हुए रहज़नों के हाथ चले
फिर आई फसल की मानिंद बर्ग-ऐ-आवारा
हमारे नाम गुलों के मुरासिलात चले
बुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ मजरूह
बगल में हम भी लिए एक सनम का हाथ चले
8.
ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी
दम के दम में अफ़साना थी मेरी तबाही भी
इल्तफ़ात समझूँ या बेरुख़ी कहूँ इस को
रह गई ख़लिश बन कर उसकी कमनिगाही भी
याद कर वो दिन जिस दिन तेरी सख़्तगीरी पर
अश्क भर के उठी थी मेरी बेगुनाही भी
शमा भी उजाला भी मैं ही अपनी महफ़िल का
मैं ही अपनी मंज़िल का राहबर भी राही भी
गुम्बदों से पलटी है अपनी ही सदा मजरूह
मस्जिदों में की जाके मैं ने दादख़्वाही भी

Thursday, August 30, 2012

गीतकार ‘शैलेंद्र’ की जन्मतिथि !

शंकरदास केसरीलाल 'शैलेन्द्र'
आज हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े गीतकार शंकरदास केसरीलाल 'शैलेन्द्र' (30 अगस्त 1923 - 14 दिसंबर 1966) की जन्मतिथि है। शैलेंद्र को 'ये मेरा दीवानापन है...' (यहूदी,1958), 'सब कुछ सीखा हमने...' (अनाडी,1959) और 'मै गाऊं तुम सो जाओ...' (ब्रह्मचारी,1968) के लिए बेहतरीन गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। 50 और 60 के में उन्होंने फ़िल्मों के लिए कई मशहूर गीत लिखे। फ़िल्मी गीतों के अलावा, इनकी 32 कविताओं का एकमात्र संग्रह है न्यौता और चुनौती,जो 1955 में प्रकाशित हुई थी। जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
नादान प्रेमिका से
तुमको अपनी नादानी पर
जीवन भर पछताना होगा!
मैं तो मन को समझा लूंगा
यह सोच कि पूजा था पत्थर--
पर तुम अपने रूठे मन को
बोलो तो, क्या उत्तर दोगी?
नत शिर चुप रह जाना होगा!
जीवन भर पछताना होगा!
मुझको जीवन के शत संघर्षों में
रत रह कर लड़ना है ;
तुमको भविष्य की क्या चिन्ता,
केवल अतीत ही पढ़ना है!
बीता दुख दोहराना होगा!
जीवन भर पछताना होगा!
यदि मैं कहूं
यदि मैं कहूं कि तुम बिन मानिनि
व्यर्थ ज़िन्दगी होगी मेरी,
नहीं हंसेगा चांद हमेशा
बनी रहेगी घनी अंधेरी--
बोलो, तुम विश्वास करोगी?
यदि मैं कहूं कि हे मायाविनि
तुमने तन में प्राण भरा है,
और तुम्हीं ने क्रूर मरण के
कुटिल करों से मुझे हरा है--
बोलो, तुम विश्वास करोगी?
यदि मैं कहूं कि तुम बिन स्वामिनि,
टूटेगा मन का इकतारा,
बिखर जाएंगे स्वप्न
सूख जाएगी मधु-गीतों की धारा--
बोलो, तुम विश्वास करोगी?
क्यों प्यार किया
जिसने छूकर मन का सितार,
कर झंकृत अनुपम प्रीत-गीत,
ख़ुद तोड़ दिया हर एक तार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
बरसा जीवन में ज्योतिधार,
जिसने बिखेर कर विविध रंग,
फिर ढाल दिया घन अंधकार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
मन को देकर निधियां हज़ार,
फिर छीन लिया जिसने सब कुछ,
कर दिया हीन चिर निराधार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
जिसने पहनाकर प्रेमहार,
बैठा मन के सिंहासन पर,
फिर स्वयं दिया सहसा उतार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता
राह कहती,देख तेरे पांव में कांटा न चुभ जाए
कहीं ठोकर न लग जाए;
चाह कहती, हाय अंतर की कली सुकुमार
बिन विकसे न कुम्हलाए;
मोह कहता, देख ये घरबार संगी और साथी
प्रियजनों का प्यार सब पीछे न छुट जाए!
किन्तु फिर कर्तव्य कहता ज़ोर से झकझोर
तन को और मन को,
चल, बढ़ा चल,
मोह कुछ, ' ज़िन्दगी का प्यार है कुछ और!
इन रुपहली साजिशों में कर्मठों का मन नहीं ठगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!
आह, कितने लोग मुर्दा चांदनी के
अधखुले दृग देख लुट जाते;
रात आंखों में गुज़रती,
और ये गुमराह प्रेमी वीर
ढलती रात के पहले न सो पाते!
जागता जब तरुण अरुण प्रभात
ये मुर्दे न उठ पाते!
शुभ्र दिन की धूप में चालाक शोषक गिद्ध
तन-मन नोच खा जाते!
समय कहता--
और ही कुछ और ये संसार होता
जागरण के गीत के संग लोक यदि जगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!
निंदिया
पास देख अनजान अतिथि को--
दबे पाँव दरवाज़े तक आ,
लौट गई निंदिया शर्मीली!
दिन भर रहता व्यस्त, भला फुर्सत ही कब है?
कब आएँ बचपन के बिछुड़े संगी-साथी,
बुला उन्हें लाता अतीत बस बीत बातचीत में जाती
शून्य रात की घड़ियाँ आधी
और झाँक खिड़की से जब तब
लौट-लौट जाती बचारी नींद लजीली!
रजनी घूम चुकी है, सूने जग का
थककर चूर भूल मंज़िल अब सोता है पंथी भी मग का
कब से मैं बाहें फैलाए जलती पलकें बिछा बुलाता
आजा निंदिया, अब तो आजा!
किन्तु न आती, रूठ गई है नींद हठीली!
जिस ओर करो संकेत मात्र
जिस ओर करो संकेत मात्र, उड़ चले विहग मेरे मन का,
जिस ओर बहाओ तुम स्वामी,बह चले श्रोत इस जीवन का!
तुम बने शरद के पूर्ण चांद, मैं बनी सिन्धु की लहर चपल,
मैं उठी गिरी पद चुम्बन को, आकुल व्याकुल असफल प्रतिपल,
जब-जब सोचा भर लूं तुमको अपने प्यासे भुज बन्धन में,
तुम दूर क्रूर तारक बन कर, मुस्काए निज नभ आंगन में,
आहें औ' फैली बाहें ही इतिहास बन गईं जीवन का!
जिस ओर करो संकेत मात्र!
तुम काया, मैं कुरूप छाया, हैं पास-पास पर दूर सदा,
छाया काया होंगी न एक, है ऎसा कुछ ये भाग्य बदा,
तुम पास बुलाओ दूर करो, तुम दूर करो लो बुला पास,
बस इसी तरह निस्सीम शून्य में डूब रही हैं शेष श्वास,
हे अदभुद, समझा दो रहस्य, आकर्षण और विकर्षण का!
जिस ओर करो संकेत मात्र!

Saturday, August 18, 2012

गुलज़ार की जन्मतिथि !

गुलज़ार
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार, कथाकार और फ़िल्मकार गुलज़ार (जन्म : 18 अगस्त 1934) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट

1.
कई पिंजरों का क़ैदी हूँ
कई पिंजरों में बसता हूँ
मुझे भाती हैं क़ैदें काटना
और अपनी मर्ज़ी से
चुनाव करते रहना
अपने पिंजरों का
मियादें तय नहीं करता मैं रिश्तों की
असीरी ढूँढ़ता रहता हूँ मैं
असीरी अच्छी लगती है

2.
शहर की बिजली गई
बंद कमरे में बहुत देर तक कुछ भी दिखाई न दिया
तुम गई थीं जिस दिन
उस रोज़ भी ऐसा ही हुआ था
और बहुत देर के बाद
आँखें तारीकी से मानूस हुईं तो
फिर से दरवाज़े का खाका-सा नज़र आया था

3.
टूटी-सी नींदें उठाना
जमा करना ख़्वाबों के टुकड़े
जो तकिए से गिरे हों,
करवटों की सिलवटों को खोलना
उनको पिरोना।

जिस्म की कच्ची दरारें ढूँढ़ना
टूटे फूटे लोग ले जाकर
सजा लेता हूँ अपने ताक़चों में
मैं कबाड़ी -
ख़ाली 
डिब्बों बोतलों में नज़्में भरके बेचता हूँ... 

Saturday, August 11, 2012

गोपाल सिंह नेपाली की जन्मतिथि !

गोपाल सिंह नेपाली
आज प्रसिद्ध कवि और हिंदी सिनेमा के गीतकार गोपाल सिंह नेपाली (11 अगस्त 1911 - 17 अप्रैल 1963) की जन्मतिथि है। उनका असली नाम गोपाल बहादुर सिंह था। चम्पारन जिले के बेतिया नामक स्थान पर कालीबाग दरबार के नेपाली महल में जन्म हुआ। प्रवेशिका तक शिक्षा प्राप्त की। कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। फ़िल्मों के लिए लगभग 400 गीत लिखे। मुख्य काव्य संग्रह हैं : उमंग (1933), पंछी (1934), रागिनी (1935), पंचमी (1942), नवीन (1944), नीलिमा (1945), हिमालय ने पुकारा (1963)। 1932 में 'प्रभात' और 'मुरली' नाम से क्रमशः हिन्दी और अंग्रेज़ी में हस्तलिखित पत्रिकाएँ भी निकालीं। मंचों के महत्वपूर्ण कवि। उन्हें गीतों का राजकुमार कहा गया। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
कुछ जीने का आनंद मिले
कुछ मरने का आनंद मिले
दुनिया के सूने आँगन में
, कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
वह मरघट का सन्नाटा तो रह-रह कर काटे जाता है
दुःख दर्द तबाही से दबकर
, मुफ़लिस का दिल चिल्लाता है
यह झूठा सन्नाटा टूटे
पापों का भरा घड़ा फूटे
तुम ज़ंजीरों की झनझन में
, कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
यह उपदेशों का संचित रस तो फीका-फीका लगता है
सुन धर्म-कर्म की ये बातें दिल में अंगार सुलगता है
चाहे यह दुनिया जल जाए
मानव का रूप बदल जाए
तुम आज जवानी के क्षण में
, कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
यह दुनिया सिर्फ सफलता का उत्साहित क्रीड़ा-कलरव है
यह जीवन केवल जीतों का मोहक मतवाला उत्सव है
तुम भी चेतो मेरे साथी
तुम भी जीतो मेरे साथी
संघर्षों के निष्ठुर रण में
, कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
जीवन की चंचल धारा में, जो धर्म बहे बह जाने दो
मरघट की राखों में लिपटी
, जो लाश रहे रह जाने दो
कुछ आँधी-अंधड़ आने दो
कुछ और बवंडर लाने दो
नवजीवन में नवयौवन में
, कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
जीवन तो वैसे सबका है, तुम जीवन का शृंगार बनो
इतिहास तुम्हारा राख बना
, तुम राखों में अंगार बनो
अय्याश जवानी होती है
गत-वयस कहानी होती है
तुम अपने सहज लड़कपन में
, कुछ ऐसा खेल रचो साथी!
दूर जाकर न कोई बिसारा करे
दूर जाकर न कोई बिसारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे,
यूँ बिछड़ कर न रतियाँ गुज़ारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
मन मिला तो जवानी रसम तोड़ दे, प्यार निभता न हो तो डगर छोड़ दे,
दर्द देकर न कोई बिसारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
खिल रही कलियाँ आप भी आइए, बोलिए या न बोले चले जाइए,
मुस्कुराकर न कोई किनारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
चाँद-सा हुस्न है तो गगन में बसे, फूल-सा रंग है तो चमन में हँसे,
चैन चोरी न कोई हमारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
हमें तकें न किसी की नयन खिड़कियाँ, तीर-तेवर सहें न सुनें झिड़कियाँ,
कनखियों से न कोई निहारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
लाख मुखड़े मिले और मेला लगा, रूप जिसका जँचा वो अकेला लगा,
रूप ऐसे न कोई सँवारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
रूप चाहे पहन नौलखा हार ले, अंग भर में सजा रेशमी तार ले,
फूल से लट न कोई सँवारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
पग महावर लगाकर नवेली रंगे, या कि मेंहदी रचाकर हथेली रंगे,
अंग भर में न मेंहदी उभारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
आप पर्दा करें तो किए जाइए, साथ अपनी बहारें लिए जाइए,
रोज़ घूँघट न कोई उतारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
एक दिन क्या मिले मन उड़ा ले गए, मुफ़्त में उम्र भर की जलन दे गए,
बात हमसे न कोई दुबारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ
तू चलती है पन्ने-पन्ने, मैं लोचन-लोचन बढ़ता हूँ
मै खुली क़लम का जादूगर, तू बंद क़िताब कहानी की
मैं हँसी-ख़ुशी का सौदागर, तू रात हसीन जवानी की
तू श्याम नयन से देखे तो, मैं नील गगन में उड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ।
तू मन के भाव मिलाती है, मेरी कविता के भावों से
मैं अपने भाव मिलाता हूँ, तेरी पलकों की छाँवों से
तू मेरी बात पकड़ती है, मैं तेरा मौन पकड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ।
तू पृष्ठ-पृष्ठ से खेल रही, मैं पृष्ठों से आगे-आगे
तू व्यर्थ अर्थ में उलझ रही, मेरी चुप्पी उत्तर माँगे
तू ढाल बनाती पुस्तक को, मैं अपने मन से लड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ।
तू छंदों के द्वारा जाने, मेरी उमंग के रंग-ढंग
मैं तेरी आँखों से देखूँ, अपने भविष्य का रूप-रंग
तू मन-मन मुझे बुलाती है, मैं नयना-नयना मुड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ।
मेरी कविता के दर्पण में, जो कुछ है तेरी परछाईं
कोने में मेरा नाम छपा, तू सारी पुस्तक में छाई
देवता समझती तू मुझको, मैं तेरे पैयां पड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ।
तेरी बातों की रिमझिम से, कानों में मिसरी घुलती है
मेरी तो पुस्तक बंद हुई, अब तेरी पुस्तक खुलती है
तू मेरे जीवन में आई, मैं जग से आज बिछड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ।
मेरे जीवन में फूल-फूल, तेरे मन में कलियाँ-कलियाँ
रेशमी शरम में सिमट चलीं, रंगीन रात की रंगरलियाँ
चंदा डूबे, सूरज डूबे, प्राणों से प्यार जकड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ।
बदनाम रहे बटमार
बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा
दो दिन के रैन बसेरे की, हर चीज़ चुराई जाती है
दीपक तो अपना जलता है, पर रात पराई होती है
गलियों से नैन चुरा लाए तस्वीर किसी के मुखड़े की
रह गए खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा।
शबनम-सा बचपन उतरा था, तारों की गुमसुम गलियों में
थी प्रीति-रीति की समझ नहीं, तो प्यार मिला था छलियों से
बचपन का संग जब छूटा तो नयनों से मिले सजल नयना
नादान नये दो नयनों को, नित नये बजारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा।
हर शाम गगन में चिपका दी, तारों के अक्षर की पाती
किसने लिक्खी, किसको लिक्खी, देखी तो पढ़ी नहीं जाती
कहते हैं यह तो किस्मत है धरती के रहनेवालों की
पर मेरी किस्मत को तो इन, ठंडे अंगारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा।
अब जाना कितना अंतर है, नज़रों के झुकने-झुकने में
हो जाती है कितनी दूरी, थोड़ा-सी रुकने-रुकने में
मुझ पर जग की जो नज़र झुकी वह ढाल बनी मेरे आगे
मैंने जब नज़र झुकाई तो, फिर मुझे हज़ारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को नौ लाख सितारों ने लूटा।
जुगनू से तारे बड़े लगे, तारों से सुंदर चाँद लगा
धरती पर जो देखा प्‍यारे चल रहे चाँद हर नज़र बचा
उड़ रही हवा के साथ नज़र, दर-से-दर, खिड़की से खिड़की
प्‍यारे मन को रंग बदल-बदल, रंगीन इशारों ने लूटा।
जग में दो ही जने मिले, इनमें रूपयों का नाता है
जाती है किस्‍मत बैठ जहाँ खोटा सिक्‍का चल जाता है
संगीत छिड़ा है सिक्‍कों का, फिर मीठी नींद नसीब कहाँ
नींदें तो लूटीं रूपयों ने, सपना झंकारों ने लूटा।
वन में रोने वाला पक्षी घर लौट शाम को आता है
जग से जानेवाला पक्षी घर लौट नहीं पर पाता है
ससुराल चली जब डोली तो बारात दुआरे तक आई
नैहर को लौटी डोली तो, बेदर्द कहारों ने लूटा।
दो प्राण मिले
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले।
भौंरों को देख उड़े भौरें, कलियों को देख हँसी कलियाँ,
कुंजों को देख निकुंज हिले, गलियों को देख बसी गलियाँ,
गुदगुदा मधुप को, फूलों को, किरणों ने कहा जवानी लो,
झोंकों से बिछुड़े झोंकों को, झरनों ने कहा, रवानी लो,
दो फूल मिले, खेले-झेले, वन की डाली पर झूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले।
इस जीवन के चौराहे पर, दो हृदय मिले भोले-भाले,
ऊँची नज़रों चुपचाप रहे, नीची नज़रों दोनों बोले,
दुनिया ने मुँह बिचका-बिचका, कोसा आज़ाद जवानी को,
दुनिया ने नयनों को देखा, देखा न नयन के पानी को,
दो प्राण मिले झूमे-घूमे, दुनिया की दुनिया भूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले।
तरुवर की ऊँची डाली पर, दो पंछी बैठे अनजाने,
दोनों का हृदय उछाल चले, जीवन के दर्द भरे गाने,
मधुरस तो भौरें पिए चले, मधु-गंध लिए चल दिया पवन,
पतझड़ आई ले गई उड़ा, वन-वन के सूखे पत्र-सुमन
दो पंछी मिले चमन में, पर चोंचों में लेकर शूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले।
नदियों में नदियाँ घुली-मिलीं, फिर दूर सिंधु की ओर चलीं,
धारों में लेकर ज्वार चलीं, ज्वारों में लेकर भौंर चलीं,
अचरज से देख जवानी यह, दुनिया तीरों पर खड़ी रही,
चलने वाले चल दिए और, दुनिया बेचारी पड़ी रही,
दो ज्वार मिले मझधारों में, हिलमिल सागर के कूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले।
हम अमर जवानी लिए चले, दुनिया ने माँगा केवल तन,
हम दिल की दौलत लुटा चले, दुनिया ने माँगा केवल धन,
तन की रक्षा को गढ़े नियम, बन गई नियम दुनिया ज्ञानी,
धन की रक्षा में बेचारी, बह गई स्वयं बनकर पानी,
धूलों में खेले हम जवान, फिर उड़ा-उड़ा कर धूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले।
मुसकुराती रही कामना
तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा
द्वार घर का पवन खटखटाता रहा
पास आते हुए तुम कहीं छुप गए
गीत हमको पपीहा रटाता रहा
तुम कहीं रह गये, हम कहीं रह गए, गुनगुनाती रही वेदना
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
तुम न आए, हमें ही बुलाना पड़ा
मंदिरों में सुबह-शाम जाना पड़ा
लाख बातें कहीं मूर्तियाँ चुप रहीं
बस तुम्हारे लिए सर झुकाता रहा
प्यार लेकिन वहाँ एकतरफ़ा रहा, लौट आती रही प्रार्थना
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
शाम को तुम सितारे सजाते चले
रात को मुँह सुबह का दिखाते चले
पर दिया प्यार का, काँपता रह गया
तुम बुझाते चले, हम जलाते चले
दुख यही है हमें तुम रहे सामने, पर न होता रहा सामना
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
किस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्‍नहार, लाती चोरों से छीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
मैं प्यासा भृंग जनम भर का
मैं प्यासा भृंग जनम भर का
फिर मेरी प्यास बुझाए क्या,
दुनिया का प्यार रसम भर का।
मैं प्यासा भृंग जनम भर का।।
चंदा का प्यार चकोरों तक
तारों का लोचन कोरों तक
पावस की प्रीति क्षणिक सीमित
बादल से लेकर भँवरों तक
मधु-ऋतु में हृदय लुटाऊँ तो,
कलियों का प्यार कसम भर का।
मैं प्यासा भृंग जनम भर का।।
महफ़िल में नज़रों की चोरी
पनघट का ढंग सीनाज़ोरी
गलियों में शीश झुकाऊँ तो,
यह, दो घूँटों की कमज़ोरी
ठुमरी ठुमके या ग़ज़ल छिड़े,
कोठे का प्यार रकम भर का।
मैं प्यासा भृंग जनम भर का।।
जाहिर में प्रीति भटकती है
परदे की प्रीति खटकती है
नयनों में रूप बसाओ तो
नियमों पर बात अटकती है
नियमों का आँचल पकड़ूँ तो,
घूँघट का प्यार शरम भर का।
मैं प्यासा भृंग जनम भर का।।
जीवन से है आदर्श बड़ा
पर दुनिया में अपकर्ष बड़ा
दो दिन जीने के लिए यहाँ
करना पड़ता संघर्ष बड़ा
संन्यासी बनकर विचरूँ तो
संतों का प्यार दिल भर का।
मैं प्यासा भृंग जनम भर का।।