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Wednesday, June 05, 2013

जयश्री रॉय की कविताएँ

जयश्री रॉय वर्तमान समय में एक महत्वपूर्ण कथाकार का नाम है। कम लोग यह जानते हैं कि उनकी पहली प्रकाशित किताब कविता-संग्रह है। कविता में उनकी दिलचस्पी आज भी 'पहला प्रेम' की तरह है। उनकी कहानियों की तरह ही उनकी कविताओं का अलग स्वर है। सबसे जुदा 'अंदाज़-ए-बयां' है। जैसे रास्ते पर चलते हुए अक्सर, अचानक, बेवजह हमारे पाँव ठहर जाते हैं, वैसे ही जयश्री की कविताओं से गुज़रते हुए हमारी धड़कनों का रुक जाना लाज़िम है। और यह रुकना जीवन से परे नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत है। एक नई उमंग की लिप्सा है, जहाँ दृश्य और अदृश्य का क्षितिज उभरने लगता है। ऐसे में कवि, कभी आसमान के कंधे पर हाथ रखकर एक दोस्त-सा मुस्काता है, तो कभी हवाओं को प्रेमिका समझ कर उसके गुलाबी कानों को चूम लेता है। और कविता...एक अनंत यात्रा की साक्षी हो जाती है। आईए पढ़ते हैं जयश्री रॉय की कुछ नई कविताएँ - त्रिपुरारि कुमार शर्मा

याद आती है अक्सर मुझे
मेरे मोहल्ले की वह साँवली-सी लड़की
तंग कोठरी में बंद 
जिसकी उदास आँखों में, सारा आकाश होता था
मगर सपनो का कही कोई रेश नही...
न जाने क्यों अनकहे ही मुझे,
उसकी चुप्पी सुनाई देती थी बहुत बार !
...जब वह गूंगी आँखों से,
संवाद करती थी हवा और धुप से
और अनायास ठिठककर,
आकाश में उड़ते किसी पतंग को,
निर्निमेष ताकने लगती थी...
तब पर तोलती परों की तरह लगती थीं उसकी पलके...
ऐसे में मुझे प्रतीत होता था,
उसके सारे रूमानी शब्द भीग गए हैं-
उसीके अंदर बहते किसी नमकीन नदी में...
इच्छा के किसी तरल-से क्षण में
मेरा मन करता था
आकाश के नील में हथेली डुबोकर 
उसका फीका-सा जीवन रंग दूँ और-छोर
और मुस्कान की एक सुनहरी तितली,
उसके उदास होंठों पर रख दूँ 
न जाने कितनी बार उसके लिए,
इन्द्रधनुष तोड़ लाया था
आषाढ की नीली संध्या से
मगर कभी उसे दे न सका
जेब में लिए फिरता रहा
उस क्षण की प्रतीक्षा में 
जब वह मेरी तरफ देखेगी
तब मैं थमाऊँगा उसे,
वे मुस्कराहट, गीत और स्वप्न 
जो आपने हिस्से से उसके लिए,
अबतक बचा रक्खे थे
मगर ऐसा हो न सका
वह अपने अँधेरे से निकलकर 
जिंदगी पर अपना हक् जताने कभी आ न सकी
और एक दिन नामालूम खो गयी
अपने सूनेपन में- आंहो और आंसुओं की विरासत लिए
ठीक जैसे हमारी लड़कियां,
खो जाती है अक्सर बचपन के आँगन से
ससुराल की जलती अंगीठी में
या फिर अपनी माँ की कोख से...
याद आती है अक्सर मुझे...
है न प्यार...
चाँद रात में,
मेरे ख्वाब में,
जो नूर उतर आता है...
गीली पलकों को सहलाकर
चमकीले फूल टाँक जाता है!
एक बहार का वादा,
सांझी खुशियाँ, 
उम्मीद थमा जाता है!
...वो तुम हो, है न प्यार?
हाँ, वो तुम ही तो हो...!
जब रो-रोकर
सिसकियाँ बंध जाती हैं,
आंसुओं के साथ
आँखें बह जाती हैं,
खर्च हो जाता है दु:ख सारा,
मन रीत जाता है...
इतना थक जाता है यकीन,
दुआ में हाथ उठ नहीं पाता है!
...इन यतीम पलों में 
हथेली में प्रार्थना,
मन में भगवान बसाकर,
धीरज की दे पूंजी,
जो आस्था बंधा जाता है,
वो तुम हो, है न प्यार?
हाँ, वो तुम ही तो हो...
उपालंभ मत दो
उपालंभ मत दो – 
हमारे संबंध के अनाम रह जाने का!
संबंध लहू और प्रेम से बनता है...
नाम:करण से पहले!
तुम जो चुप हो जाते हो...
बहुत कुछ कहने के लिए,
... वह मैं शब्द-शब्द पढ़ती हूँ...
पारदर्शी चेहरे की विलक्षणता में!
तुम्हारा-मेरा संबंध शब्दों का नहीं, 
स्पर्श का नहीं,
अनुभूतियों का है!
सुनो मेरी प्रेरणा!
तभी तो हमारी चुप्पी किसी तीसरे के बूझने की नहीं!
फिर,
जुलूस का नारा बननेवाला प्रेम
हमेशा प्रदर्शनकारियों का रहा है
और किसी प्रेमी की मांग 
कभी प्रेम नहीं बना!
मेरे-तुम्हारे बीच 
वही तो अबोला रह गया है,
जो पहली नज़र तुमने कहा था,
जो हर जन्म मैंने सुना था,
जो सर्जना के आदि में था,
जो सृजन के अंत में भी होगा,
जो सनातन है, सृष्टि का अकेला सच है!
अब पूरा जीवन एक नाम के नाम 
जी लेने के बाद उपालंभ मत दो...
हमारे सम्बन्धों के अनाम रह जाने का!
चाँद की बालियाँ
चाँद का गोटा उतारकर
किसने आसमान का दुपट्टा
ज़र्द कर दिया...
शाम की मेंहदी तो 
अभी-अभी महकी थी!
चिड़िया के घोंसले भी
कहाँ सो पाये थे!
सपनों की तो बस 
आहट भर आई थी...
आँखों की डिबिया से 
नींद का काजल चुराकर
न जाने क्यों 
रात की पलकें फीकी कर दी...
ये तो अभी-अभी कजराई थीं,
नीमख्वाबी से जागकर
अंगड़ाई भी न तोड़ पाई थीं...
चाँद की बालियाँ उतार लेंगे
बादल के घूँघट से निकले
जो आज...
शरारत की नटखट बच्ची बन
दूधिया मुस्कुराई थी!
खुशी के इस मंजर को 
फूंककर बुझा दिया,
रोशनी के पंख टूटकर 
जुगनू-से खो गए...
ये हवा न जाने 
किस दुश्मन की नज़र थी
तारों का झिलमिल टीका उतार
ये किसने सुहाग उजाड़ दिया!
साँझ की दुल्हन तो
अभी-अभी घर आई थी 
प्राची के आलता से
आँगन सजाई थी। 
समाधि
एक भव्य समाधि के पास
पूस की थरथराती रात में
ठंड से शून्य, भूख से बेहाल
एक अनाथ बच्चा खडा है,
उसे सोने के लिए सड़क का
बिस्तर चाहिए,
मगर ट्रैफिक अभी भी जारी है...
ज़मीन को निगलकर
आसमान में लपकती 
इमारतें अब सो रही हैं, 
अंदर गर्म कमरों में 
नीली रोशनी के तिलस्म में
सुंदर सपने तैर रहे हैं...
एक सपना कुनमुना रहा है
उसकी भी आँखों में 
मगर उसे आकार देने के लिए
कोई जगह नहीं है।
भीनी-भीनी सुगंध में डूबे
बगीचों की बेंचें खाली पड़ी हैं,
अंदर मगर सोना मना है,
हवलदार डंडा पटकते हुये
गुजर रहा है।
वह रूंआसा होकर
गांधी चौक की ओर देखता है
मगर, गांधी की लाठी 
देखकर डर जाता है।
सुभाष भी उसे दूर से 
हाथ उठाकर
चेतावनी दे देते हैं ,
अंबेडकर संविधान में 
उसे अधिकार दिलाने में 
व्यस्त हैं,
नेहरू विश्व समस्या पर चिंतित हैं,
अरविंद आकाश की ओर 
देख रहे हैं,
पटेल दिल्ली की हदें 
बढ़ाने में मशगूल हैं...
... मगर उसे इतना कुछ नहीं 
बस एक रोटी और बिस्तर चाहिए!
मगर जानता है, इतने बड़े लोग
ऐसे छोटे काम नहीं करते!
थककर वह फुटपाथ पर 
बैठ जाता है,
पास के कूड़ेदान में
कुछ खाने के लिए होगा ज़रूर
मगर उन आवारा कुत्तों से
लडने की अभी ताकत नहीं है!
पेट की आग में
घुटनों को सेंकते हुये 
वह चाँद को तोड़कर खाने की तरकीब
ढूँढता है,
पीठ बन गए पेट में 
अंतड़ियाँ चटक रही है।
ये कैसी अंगीठी है,
जो बिना ईधन जलती है!
किसी ने कहा था 
मुर्दे लोगों के लिए 
बनाई जाती हैं 
ये समाधियाँ...!
मां, बिस्तर और 
रोटी के गर्म, मुलायम
सपनों में डूबते हुये 
वह सोचता है – 
क्या वह मर नहीं सकता...?
कल रात का चाँद नीला था
आज की सुबह जाफरानी...
प्यार का हैंग ओवर कुछ 
ऐसा ही होता है...
वक्त की नब्ज़, रंगों की
लाजिक , मौसम का माने
बदल जाता है...
धूप के पश्मीने में
ठिठुरता है सूरज
वर्फ के लिबास में
पिघलती है रात!
कभी गुदगुदाते हैं कांटे
कभी चुभते हैं गुलाब...
देखें, आज का चाँद
किस रंग का होगा...
आस्मां से बरसेंगी बूँदें
या उतरेगी शराब...
दिन होगा कृष्ण सा सांवला
या राधा सी गोरी होगी रात...
कभी जी चाहता है
कभी जी चाहता है
ज़मीं के आखिरी सिरे पर खड़ी होकर
जहाँ से आसमान की हद शुरू होती है
और देहातीत सपनो की भी
वे शब्द बिखरा दूं एक-एककर 
हवा के पारदर्शी आँगन में
जो कभी तुम्हारे होने ने दिया था मुझे
लिली-से किसी ताज़े, चमकीले छन में
आंखुआते प्यार और
घृणा की बहती नीली नदी के बीच
किसी महफूज़ ज़मीं पर 
और कहूँ कविता की मसृण पंक्तियों से
उनके अर्थ में मुझे जीने दे थोड़ी देर 
कि इन लजीज शब्दों के गंध, स्वाद से
मन का शून्य अब भरता नहीं....
एक बदली...
एक बदली...
सेमल के फाहे सा
आकाश में,
बादल का एक टुकड़ा...
धूप की किरमिजी हथेलियों में,
गीला गीला,
अपने नेह से नम...
डोलता है देश-परदेश .
अभिशापित यछिनी बन.
क्या ढूँढता है...
सपनो में सेंध लगानी है उसे...
किसी के नयन में,
इंद्रधनु के बिम्ब बन
उतरना है...
प्रेम को बो देना है,
स्वप्न में,
जीवन में,
अंखुआना है,
हर नमक में,
अनुराग की मिठास...
मल्हार बनकर गूंजना है,
हिया के मरू में...
एक बीज को,
उसका जीवन, उसका
स्पंदन देना है....