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Saturday, June 15, 2013

पूनम शुक्ला की कविताएँ

हाल में एक कविता-संग्रह आया है— सूरज के बीज। कवि हैं— पूनम शुक्ला। संग्रह में शामिल कविताओं के साथ कुछ दूर सफ़र करने पर एहसास होता है कि चारों ओर एक ऐसी ऊर्जा अब भी मौजूद है, जो हमारे भीतर रचनात्मकता को आकार देने में जुटी है। कवि इस ‘सच’ से अच्छी तरह परिचित है और सहजता के साथ वर्णन करने में सक्षम भी है। जब चुप्पी अपना लिबास बार-बार बदलने लगती है, तो कविता का शब्दों के बीच समाहित होना उचित ही है। प्रस्तुत हैं पूनम शुक्ला की कविताएँ - त्रिपुरारि कुमार शर्मा

चुप्पी से गपशप
कितना शोर
कितनी आवाजें,
गाड़ियों की चिग्घाड़
आँधियों में
बजते किवाड़,
रोते, हँसते, चीखते
हर जगह लोग
दो-चार
टी० वी० पर बजते
कार्यक्रमों के
लम्बे हार
बस हर जगह
शोर गुल की मार
चाहूँ
कूद कर लूँ
इन सब को पार
चलूँ एकांत में
मौन में
करने गपशपप
कुछ चुप्पी से
जहाँ कुछ नहीं बोलता
बस बोलती है धड़कन
डोलती हैं शिराएँ
समतल भूमि पर
गिरते हैं
नई सोच के बीज
नई आशाओं की
उगती हैं कोंपलें
जो समझ सकती हैं
आस पास के
दीवारों की आवाज़
एक टुकड़ा आकाश के
नए साज़
कुछ पिछले
बिछड़े संगीत
कुछ नूतन
रंगीले नाज़।
ईप्सा
जल बादल बन
जगह–जगह
पहुँचाता है
जीवन का संदेश,
हवाएँ कभी तेज
कभी धीमी
बढ़ चलतीं हैं
जीवन को बाँटने
बीज अंकुरित हो
बढ़ चलता है
अपने लक्ष्य की तरफ
सूरज का उगना
डूब जाना
रात और दिन
सब कुछ
कितना नियंत्रित
कितना सटीक
समय चक्र के साथ
दीवार पर चलती घड़ी
समय को दर्शाती
गर्व से अपने हाथ हिलाती
ज्यों पूरा ब्रम्हांड हो
उसके आगे पीछे
पर दूसरे की खुराक पर
कब तक है गर्व
कब तक हिला पाएगी
अपने हाथ!
इस यान्त्रिक युग में
पानी होगी
एक असीम ऊर्जा
जिसकी थाह न हो
जिसका अन्त न हो
बहती रहे निरन्तर
धवल धार
जो हर बार कराए
खंदक पार।
मैं वक्त हूँ
मैं वक्त हूँ
जिसे तुम
घड़ियों में झाँकते हो
अपने ही ढंग से
मुझे आँकते हो
निकल जाने पर
बस ताकते हो।
जब मैं आता हूँ
तो कभी लोग
हँसते हैं
कभी रोते हैं,
कभी ऊँचाइयाँ पाते हैं
तो कभी
खुद को ढ़ोते हैं।
मैंने देखे हैं
कई युग
कई काल
कई सूरमा
कई ढ़ाल पकड़ना चाहा है मुझे
ज्ञानियों नें
रिषियों नें
आतताइयों ने
पर मैं धीरे से
सरक जाता हूँ
हथेली मे बंद
रेत की तरह
मैं वक्त हूँ।
पर मुझमें
और कुछ भी है-
जो मुझे दिल में
बसाते हैं
मैं उनके
दिलों के छेद
टाँकता हूँ
मैं जख्मों पर
लेप लगाता हूँ
मैं व्यथा को
धीरे-धीरे
काटता हूँ
खाइयों को
धीरे-धीरे
पाटता हूँ
दिलों की
खटास
बाँटता हूँ
मैं वक्त हूँ।
मित्र
गुलाब के फूल
खिले हैं गमलों में
काटों के बीच
धीरे से
मुस्कुराना हैं जानते
आज बारिश की बूँदों में
नहा कर हुए सराबोर
कुछ बूँदें अभी भी
पंखुड़ियों पर
हैं नाचतीं
पीली धूप भी है
छिटक आई
और बूँदों पर
नए रंग
नई आभा
छिटक कर
मेरी आँखों में
रोशनी भरतीं
ये जिन्दगी है
काँटों सी
और मैं हूँ एक गुलाब
काँटों पर बैठ कर
हँसना सिखा दिया
इस गुलाब ने
रोज सींचती हूँ
भाव के जल से
अपने मित्र को।
आस
एक कमरा है
थोड़ी घुटन भी
खिड़की खुली है
घुटन को महसूसती
थोड़ा दर किनारा
करने के प्रयास में
घुटन को
और फिर
एक पक्षी का
कलरव
रच जाता नया शब्द
शब्द ने तरंगित कर दी
एक ऊर्जा
घुटन का कम होना
आँखों की पुतलियों तक
अपनी प्रतिछाया बिखेरता
और एक आस
जो बैठी थी
कुंडली मारे
कहीं उदास
अनायास
अँगड़ाइयाँ लेती हुई
थोड़ा थरथराती हुई
सीधी होने के
प्रयास में
आँखें मलती हुई
है झाँकती
एक गली है सामने
सँकरी
जो चली जाती है
दूर
कहीं बहुत दूर
आस पहुँच गई है
वहीं कहीं किनारे
नए साज़
बटोरने के
प्रयास में।