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Monday, June 10, 2013

डॉ. सुनीता की कविताएँ

युवा कवयित्री डॉ. सुनीता की कविताएँ कहीं ग्रामीण अनुभवों की सुगंध में सराबोर हो जाती हैं, तो कहीं बचपन और बाद के दिनों के बीच उगे पेड़ों पर झूला डाल देती हैं। स्मृतियों के अनंत जंगल में भटकती हुई कवयित्री अपनी उम्र के टापू पर एक छोटा-सा संसार बुनती है, जिसमें समस्याएँ और समाधान दोनों समाहित हैं। प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ - त्रिपुरारि कुमार शर्मा

सृजक
स्वर-संधि और व्यंजन 
समाज के मूल सृजक हैं 
उनके अघोष और घोष में ही छिपे हैं 
देश-दुनिया के सारे रहस्य 
सघोष के मिलते ही 
मूल्य और वजन बढ़ जाते हैं 
जहाँ पर प्रकृति के प्राण और अल्पप्राण 
महाप्राण से मिलने को आतुर नज़र आते हैं 
व्याकुल तत्सम और उपसर्ग 
सहज ही हृदय शब्द में समा जाते हैं
ऐसे में तदभव सरीखे तमाम भाव 
और अभिव्यक्ति से भरे भौरें की तरह भाषाएँ 
बोल उठती हैं 
प्रत्यय के प्रगल्भ के निकले परसर्ग 
स्वर्ग जाने वालों के मन में एक नए बीज बो देते हैं 
समास के समरूप से अवगत होते हुए 
संवेदना से सराबोर सृजन के संसार 
समूह में हिलते-मिलते हुए शोर करते हैं 
समय का पहिया निरंतर घूमता है 
छंद के बंद जड़वादी, दकियानूसी दालानों को फलांगते हुए 
स्वछंद वातावरण में विचरण करने लगे हैं  
अनुगामी बनते हुए 
रस-अलंकार से सुसज्जित समूह ने 
आन्दोलन कर दिया 
पुरातन पीढ़ियों के संजोए धरोहरों को छोड़ दिया 
और नए सिरे से संस्कृति का निर्माण करना शुरू कर दिया 
जहाँ से क्षणिकाएं, हाइकू और फाईकू में तब्दील हुए 
समूल जहाँ में फैले विष सरीखे उपादानों से 
ऐसा लगा जैसे पृथ्वी को उपकृत कर दिया है
पोटली
घास-फूस के मखमली रास्ते से गुज़र रही हूँ 
सुदामा-सा तंदुल की छोटी पोटली लिए
जिसमें बंधे हैं— 
जीवन के कच्चे-पक्के अनुभवों के बीज 
इच्छाओं के अनोखे रंगों में सने सपने 
अतीत के कुछ कठोर निर्णय और निहोरे 
कान के बारीक कोनों में फुसफुसाते भौंरे से दादी के बोल 
ढोलकी के बजने की धुन 
और दुल्हन में तब्दील होती गुड़िया
आँगन के मुंडेर पर घोंसला बनाए गोरैया 
(नन्हीं आँखों से बूँदें टपकाते हुए,  
देखते हुए देहरी के पार) 
द्वार पर नीम के सघन पेड़ से लटकते झूले की यादें
साथ ही माँ से गलबहियां किए फूट-फूट कर रोने की ध्वनियाँ 
और बाबुल के स्नेह की करुण गठरियां 
उसी के संग भाई के विह्वल आँखों की लाल पुतलियाँ  
सब कुछ जब्त हैं 
दिल के एक पोटलीनुमा घर में...। 
अक्सर
हम अक्सर जिन मुद्दों से दूर भागते हैं 
वही मुद्दे, भस्मासुर की तरह 
दौड़ा-दौड़ाकर कर हमारा पीछा करते हैं  
हमें मजबूर कर देते हैं उसी के परिधि में घूमने को  
समाज, देश, दुनिया और जीवन के सन्दर्भ में 
युगों-युगों से हमारे मुख्य हिस्से हैं 
खेतों के डांड पर बैठ 
नील गगन को निहारना 
सब्ज़ी से लदे-फदे खेतों से मोथे को चुनना 
वहीं बैगन की डालियों में लगे 
गुलाब के फूल जैसे लटकते काँटों का चुभना 
पतझड़ का एहसास कराते परवल से मिलना 
और उन सबके बीच दुनिया के मुद्दों पर उलझना 
एक चक्र के भीतर घूमता हुआ मालूम पड़ता है
जंगलों में घुला ज़हर
जब-जब नौगढ़ के घने जंगल 
मेरी स्मृतियों में उगते हैं 
अचानक सतपुड़ा के जंगलों की याद हो उठती है 
जहाँ मैं ख़ुद को टहलते हुए पाती हूँ 
यह सोच रही होती हूँ कि 
ख़ूबसूरती को किसकी नज़र लग जाती है  
बरबस मन कह उठता है— 
दोनों जंगलों में कितनी समानताएँ हैं 
ये बिल्कुल सहोदर लगते हैं 
(एक ही पेट से पैदा हुए भाई-बहन)  
इन्हें नक्सल के नासूर ने नमकीन जल से भर दिया 
और वहां के लोगों की आँखों में उतर आया है
सागर का सारा का सारा खारा जल 
जहाँ वे ख़ौफ़ के साए में जिन्दा हैं 
किसी पिंजड़े में क़ैद परिंदे की तरह 
जो इंसानों के सामने आते ही सहमे जाते हैं
ज़रा-सी भनक लगते ही हो जाते हैं फुर्र
और आँखें देखती रह जातीं कि आख़िर क्या हुआ 
वे विवश हैं जीने को 
डर, भय, भूख और यातना के साए में 
बूंद-बूंद रिसती जा रही है ज़िंदगी 
किन्तु निवारण के रास्ते बंद-से लगते हैं 
कभी-कभी तपड़ उठता है मन  
पर इस आडम्बरी आवरण को कैसे खुरचें 
किस तरह से मासूम मौसम से बच्चों को 
ख़ुशी के तरन्नुम सुनाएँ 
चिड़ियों के दर्दीले चहकते स्वर को 
शबनमी रंगों में तब्दील करें   
कुछ भी तो नहीं सूझता है
घिर जाता है एक और भय का बादल 
और जंगलों में घुला ज़हर याद आता है  
हम अचानक उस बंदूक के आगे आ जाते हैं 
जिस पर हमारा नाम तो नहीं होता 
मगर हम उसके निशाने पर होते हैं 
कभी-कभी नस्तर की तरह चुभता 
और कभी फोड़े की तरह टभकता-सा 
लगता कि बस अब जी चुके 
जीवन के उस वसंत से मिलना हो चुका 
जिसे मैंने नहीं चुना था 
और औचक सपना टूटते ही 
सिर्फ़ इतना याद रहता है—
हम बिस्तर की सिलवटों के जंगल में भटक रहे थे!   
अक्षर
मैं एक भ्रूण हूँ! 
नारी के गर्भ में पलता बच्चा नहीं 
इंसान के उंगलियों के पोरों से खेलता हुआ 
एक मासूम हूँ 
आड़ी-टेड़ी रेखाओं में आकार पाता हूँ 
मन में मचलते भावों के साथ 
अभिव्यक्ति के अनूठे अंदाज में 
बयाँ होते हुनर की तरह पेश आता हूँ 
शब्दों में ढलकर अस्तित्व गढ़ते हुए 
संगठन के सौन्दर्य रचते हुए मैं आगे बढ़ता हूँ 
वाक्यों के औचित्य से अह्वान के फ़िजा बदलते हुए 
ऐसा लगता है जैसे मैं सार्थक हो गया 
किसी बड़े होते बच्चे तरह 
जो भविष्य निर्माण का आधार है 
वाक्यों के वितान में सजते हुए 
सफ़ेद पन्नों के काले रंगों में 
घुल-मिल कर सुसज्जित हो उठता हूँ 
किसी नई दुल्हन की तरह 
उसके पैरों में बजते पाज़ेब सरीखे 
मेरे सम्बोधन के मर्म महक उठते हैं 
जैसे रुनझुन करते वर्ण 
किताबों में तब्दील होकर 
सागर से गहरे गोते में परिवर्तित हो जाते हैं  
लोग जहाँ-जहाँ नज़र दौड़ाते हैं 
मेरे ही लहरों के अक्षर लहलहा रहे होते हैं 
उस तिरंगे की तरह 
जिसे गुलामी के प्रचीर के बाद 
फहराते हुए देखने का लोभ संवरण न कर सके।  
अपना कोई हिस्सा नहीं
औरत के आसमानी आँचल में छिपे हैं 
समय के सारे नर्म-गर्म इतिहास  
सिमटे हैं भूगोल के दृश्य-अदृश्य
और लिपटे हैं 
करोंड़ों भुजंगों-से भ्रम के बादल
पपड़ी छोड़ते मिट्टी के ढूहे 
फटती धरा के धर्म से विराट नियम-कानून 
साथ ही चल रहे हैं 
संघर्षों, विरोधों और विद्रोहों के कई रंग-ढंग और ढोंग भी 
शिलालेखों की तरह अमिट, अबूझ पहेलियाँ 
जिनके क़िस्से/कहानियों से सब कुछ पटा पड़ा है 
वर्णित करते किरदारों की भूमिका में खोए हुए 
स्त्री-अस्मिता के नाम पर 
देह के अनंत आकाश में निहारते तारे सरीखे भौरें भी 
भूखण्ड पर एक ऐसा बीज-सा है 
जिसे जब चाहे जैसे चाहे मरुस्थल में रोपा गया 
अनिच्छा के बावजूद बरहम फलती-फूलती रही 
उन सुनगुन को सूप में चावल के समान फटकारते हुए 
घुन से रेंगते कीड़ेनुमा कलुषित मानसिकता की संतानें भी
पुरातन चौखट के किसी अन्तःपुर में स्थापित 
भुड़की में बंद अरमानों के दिखावटी गहने भी  
दिल के अंधे दराज में बंद हैं 
उसके उस आँचल के कोने में 
एक छुटकी गाँठ लगी है 
उसे माँ ने किसी अंदेशे के डर से बाँध दी 
यह कहते हुए— 
“यही तेरा रक्षक आशियाना है 
क्योंकि तू धरणी है 
लेकिन तेरा अपना कोई हिस्सा नहीं है...”
पेट की आग
जब कभी पलट कर देखती हूँ 
बीते दिनों के आइने में अचानक 
(एकांत के किसी सघन पल में) 
ओजस्वी सूर्य के किरणों का पदापर्ण होता है 
करूणा में नहाए लोग
और उन दिनों की याद बरबस आ जाती है  
तम हरते धरा के धड़कते जुगुनूओं को लिए 
ऐसे में कुछ अबोले शब्द फूट पड़ते हैं 
यदि यादाश्त का आकाश झूठा नहीं है तो—  
क़िस्मत के मारे सारे चहक उठते हैं  
अर्से बाद आए उजाले को देखकर  
चमचम करते तारों से धरा के भविष्य मुस्कुराते हैं 
एक पल को रुक कर बोलते हैं— 
हमारे हिस्से की धूप भला कोई क्यों छीने? 
लाज में डूबे हुए लोग क्या उत्तर दें 
उलहना देते हुए निरुत्तर आकाश की ओर देखने लगे 
उस कण-कण को जोड़ते ‘शब्दसेतु’ के आगमन से 
उम्मीद के कई डोर बंध गए 
इसी पल में कोई हौले से बोला 
देखो वह कौन है आया 
हमारे हित चिंता में डूबा हुआ 
चाँदनी की फीकी रोशनी कुछ ऐसी ही लगी 
जैसे उस एक पल में निवाले की चिंता में खोए हुए 
फुटपाथ के लोग अचानक से कुलबुला उठे 
सन्नाटे को चीरते हुए 
धीरे-धीरे फुसफुसाने लगे 
उस बुदबुदाते माहौल में मन में कई सवाल उठे 
आख़िर यह सब कब तक है?
जब देखो दुरदुरा दिए गए 
अवसर के क्षण में क्षमा करते हुए बुलाए गए 
यह दुस्साहस करते हुए डर भी था लेकिन 
उदर भूख की अनवरत पीड़ा ने 
अनतः विद्रोह का रास्ता चुन लिया 
यह कहते हुए कि—
आश्वासन के गीतों से पेट की आग नहीं बुझती 
शायद विद्रोह के ज्वाला में ही कुछ हाथ लगे...!  
ठहरो
आज एक बार फिर
विगत स्मृतियों के पट खुले
जैसे बादलों से बिजली
चाँद से रौशनी
और तारों से टिमटिमाहट झाँकती है
ऐसा लगा कि लरकाइयों के दिन साक्षात् हो गए
दरवाज़े पर दस्तक देती
माँ के क़दमों की आहट ने दिल पर दस्तक दी
शोख़ भरी आवाज़ कानों से टकराए
झिड़खी के कठोर भाव भी छिपे थे
ठहरो
भींगो मत
रुक जाओ
सर्दी हो जाएगी
चिंता के बादल आस्मां से आँचल में उतर आए
माँ का झुर्रियों भरा चेहरा
परेशानी के बोझिल भावों से भर गया
सघन होती संवेदना में
डुबकी लगाने का आनंद ही कुछ और था
कौतुहल की बिजली
मन-मस्तिष्क में मचल उठी
पानी के धारों से मिलने को आतुर
वह बाहर आ जाना चाहती थी
लेकिन
बंदिशों के शब्दों को तोड़ने का साहस न हुआ
क्योंकि हम
खेतों में मेड बंधे पानी जैसे न थे
जो इधर-उधर फुटकर बह निकलते
इतनी भी हिम्मत न थी
ज़िन्दगी को ढहाकर
रेत में तब्दील होने की ख़्वाहिश
अक्सर ख़ुद को चौंका देती
इसी क्षण में
स्नेह से भरे पिता के शब्द
धीरे-धीरे बादलों की कड़कती बिजली में मिलते हुए
कड़क/तेज होते हुए सुनाई दिए
तीखा और झन्नाटेदार
इस एक स्वर ने
चुलबुले मन के भाव को ध्वस्त कर दिया
सपने बुनते, उड़ान भरते मन को
हक़ीक़त के ज़मीन पर पटक दिया
और बादल की बूँदें
ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से टकराते हुए
धरा पर आते-आते
निर्मोही मन से मिलते ही मैली हो गईं।

Monday, February 11, 2013

औरतों की इच्छाएँ बहुत दिनों में फलती हैं !

शुभा
हिंदी कविता में शुभा (जन्म: 1954) एक ऐसा नाम है, जो हिंदी के हर्ट-लैंड दिल्ली से दूर रोहतक में अपनी रचनात्मकता को आकार दे रही हैं। स्त्री-विमर्श के नाम पर परचम लहराने की बजाय वो मानती हैं कि समाज के सकारात्मक विकास के लिए स्त्री-पुरुष दोनों पहलुओं का होना समान रूप से आवश्यक है। पेशे से प्रोफ़ेसर शुभा सामाजिक कार्यकर्ता हैं और थिएटर से जुड़ी हैं। आप शुभा जी की कविताएँ रू-ब-रू होकर 15 फरवरी को शाम 6:30 बजे (स्थान: ऐटिक, 36 रीगल बिल्डिंग, क्नॉट प्लेस) सुन सकते हैं। फिलहाल प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
आदमखोर-1
एक स्त्री बात करने की कोशिश कर रही है
तुम उसका चेहरा अलग कर देते हो धड़ से
तुम उसकी छातियाँ अलग कर देते हो
तुम उसकी जांघें अलग कर देते हो
तुम एकांत में करते हो आहार
आदमखोर! तुम इसे हिंसा नहीं मानते
आदमखोर-2
आदमखोर उठा लेता है
छह साल की बच्ची
लहूलुहान कर देता है उसे
अपना लिंग पोंछता है
और घर पहुँच जाता है
मुँह हाथ धोता है और
खाना खाता है
रहता है बिल्कुल शरीफ़ आदमी की तरह
शरीफ़ आदमियों को भी लगता है
बिल्कुल शरीफ़ आदमी की तरह।
टूटना-1
एक और एक
दो नहीं होते
एक और एक ग्यारह नहीं होते
क्योंकि एक नहीं है
एक के टुकड़े हैं
जिनसे एक भी नहीं बनता
इसे टूटना कहते हैं
टूटना-2
हवा आधी है
आग आधी है
पानी आधा है
दुनिया आधी है
आधा-आधा है
बीच से टूटा है
यह संसार बीच से टूटा है
पेड़ों की उदासी
पेड़ों के पास ऐसी कोई भाषा नहीं थी
जिसके ज़रिये वे अपनी बात
इन्सानों तक पहुँचा सकें
शायद पेड़ बुरा मान गए किसी बात का
वे बीज कम उगाने लगे
और बीजों में उगने की इच्छा ख़त्म हो गई
बचे हुए पेड़ों की उदासी देखी जा सकती है
बूढ़ी औरत का एकान्त
बूढी औरत को
पानी भी रेत की तरह दिखाई देता है
कभी-कभी वह ठंडी साँस छोड़ती है
तो याद करती है
बचपन में उसे रेत
पानी की तरह दिखाई देती थी।
फिर भी
एक लम्बी दूरी
एक आधा काम
एक भ्रूण
ये सभी जगाते हैं कल्पना
कल्पना से
दूरी कम नहीं होती
काम पूरा नहीं होता
फिर भी
दिखाई पड़ती है हंसती हुई
एक बच्ची रास्ते पर
आता-जाता आदमी
चिड़िया गाती है
हवा पानी में घुल जाती है
धूप रेत में घुस जाती है
पेड़ छाया बनकर दौड़-भाग करते हैं
पानी पर काई फैलती है बड़ी शान से
टिड्डे उड़ान रोककर घास पर कूदने लगते हैं
ओछे दिल का आदमी बड़ी-बड़ी आँखें
बड़े-बड़े कान लिए आता-जाता रहता है
बिना कुछ देखे-बिना कुछ सुने
स्पर्श
एक चीज़ होती थी स्पर्श
लेकिन इसका अनुभव भुला दिया गया
मतलब स्पर्श जो एक चीज़ नहीं था
भुला दिया गया
अब यह बात कैसे बताई जाए
एक मेमना घास भूलकर
नदी पर आ गया
ज़रा सा आगे बढ़कर नदी ने उसे छुआ
और मेमने ने अपने कान हिलाए
औरतें
औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं
मिट्टी के चूल्हे
और झाँपी बनाती हैं
औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं
मिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैं
और मिट्टी की तरह गहन होती हैं
औरतें इच्छाएँ पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं
औरतों की इच्छाएँ
बहुत दिनों में फलती हैं
इच्छा
मैं चाहती हूँ कुछ अव्यवहारिक लोग
एक गोष्ठी करें
कि समस्याओं को कैसे बचाया जाए
उन्हें जन्म लेने दिया जाए
वे अपना पूरा कद पाएँ
वे खड़ी हों
और दिखाई दें
उनकी एक भाषा हो
और कोई उन्हें सुने
एकालाप
क्या नष्ट किया जा रहा है
यह दृश्य है जो खत्म हो रहा है
या मेरी नज़र
ये मेरी आवाज़ खत्म हो रही है
या गूंज पैदा करने वाले दबाव
आत्मजगत मिट रहा है या वस्तुजगत
कौन देख सकता है भला इस
मक्खी की भनभनाहट
इसकी बेचैन उड़ान
कौन तड़प सकता है
संवाद के लिए और उसके
बनने तक कौन कर सकता है
एकालाप।
प्रेमकथा-1
इच्छाएँ
एक क्षण में
पार करती हैं लम्बी दूरियाँ
फिर छटपटाती हैं अपनी कक्षा में
आँखें खुली रखती हैं
तब भी
प्रेमकथा-2
यहाँ प्रतिबद्धता का एक केन्द्र है
आत्मा का उत्खनन होता है
एक ही ओर दौड़ी जाती हैं इच्छाएँ
आत्मा का कोयला सारा
अपनी ही छुपी आग से दौड़ा जाता है
दुख और ख़ुशियाँ सब दौड़ती हैं अपनी दरी लपेटे
ज़मीन तोड़कर पानी बह जाता है एक ही दिशा में
उसी दिशा में दौड़ते हैं होशो-हवास
उस दिशा में खड़ा है एक विखंडन
उम्मीद की चादर में अपने को छिपाए।
प्रेमकथा-3
एक आदमी प्रतिद्वंद्विता की दौड़ से बाहर हो जाता है ख़ुद
दौड़ की लाईन देखता है एक फ़िल्मी दृश्य की तरह
उसके पार जैसे कुछ है जिसे देखता वह
अकेला नहीं होता
धारण करता है दुख और शोक चुपचाप
इच्छाओं को ज़बान पर नहीं लाता
कभी-कभी वह एक रहस्य की तरह नज़र आता है
वह हँसता भी है और खाना भी खाता है।
प्रेमकथा-4
यहाँ किसी को बांधकर यातना दी जा रही है
इच्छाओं के भ्रूण फेंके जा रहे हैं
ताज़ा ख़ून की गंध से हवा बोझिल है
एक चीख़ उठकर दौड़ती है
जैसे बाहर निकल भागना चाहती है
फिर डूब जाती है अंधेरे में
उसकी गूँज अटकी रहती है
हवा में धीमे-धीमे हिलती हुई
प्रेमकथा-5
कोई भागा है चप्पलें छोड़कर
घास रौंदी हुई है
टूटी हुई चूड़ियाँ चमक रही हैं
इधर कोई चीज़ घसीटे जाने के निशान हैं
यहाँ घास ख़ून में डूबी हुई है।
प्रेमकथा-6
रात के आख़िरी पहर में
एक औरत अकेली कमरे में बैठकर कुछ सोचती है
सफ़ेद लटों से घिरा अर्थपूर्ण है उसका चेहरा
एक मनुष्य रहता आया उसके अन्दर
उसी को प्रमाणित करने में ख़र्च हुई उम्र
अब अर्जित की है प्रेम करने की योग्यता
पर अवसर अब भी नदारद है
एक व्यंग्य है परिस्थिति में
उसी को बताती है उसकी पूरी आकृति।
अकलमंदी और मूर्खता
स्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुए
पुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है
इस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता है
पुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुए
स्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है
वैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि
स्त्रियों में भी मूर्खताएँ होती हैं और पुरुषों में भी
सच तो ये है
कि मूर्खों में अक्लमंद
और अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैं
मनुष्यता ऐसी ही होती है
फिर भी अगर स्त्रियों की
अक्लमंदी पहचाननी है तो
पुरुषों की मूर्खताओं पर कैमरा फ़ोकस करना होगा।
औरत की ज़रूरत
मुझे संरक्षण नहीं चाहिए
न पिता का न भाई का न माँ का
जो संरक्षण देते हुए मुझे
कुएँ में धकेलते हैं और
मेरे रोने पर तसल्ली देने आते हैं
हवाला देते हैं अपने प्रेम का
मुझे राज्य का संरक्षण भी नहीं चाहिए
जो एक रंगारंग कार्यक्रम में
मुझे डालता है और
भ्रष्ट करता है
मुझे चाहिए एक संगठन
जिसके पास तसल्ली न हो
जो एक रास्ता हो
कठोर लेकिन सादा
जो सच्चाई की तरह खुलते हुए
मुझे खड़ा कर दे मेरे रू-ब-रू
जहाँ आराम न हो लेकिन
जोख़िम अपनी ओर खींचते हों लगातार
जहाँ नतीजे तुरन्त न मिलें
लेकिन संघर्ष छिड़ते हों लम्बे
एक लम्बा रास्ता
एक गहरा जोख़िम
रास्ते की तरह खुलती
एक जटिल सच्चाई मुझे चाहिए।